ख़तरनाक इमारतों में गुजर रही दिल्ली, मुंबई, कोलकाता की कई ज़िंदगी

मुंबई

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गुरुवार को मुंबई के भायखला इलाक़े में एक बहुमंजिली इमारत के गिरने से 31 लोगों की मौत हो गई. इस दुर्घटना ने एक बार फिर मुंबई की जर्ज़र इमारतों की समस्या को सामने ला दिया है. ये इमारत काफ़ी पुरानी थी और इसमें कथित तौर पर अवैध रूप से दो अतिरिक्त मंज़िलें बनाई गई थीं, जो भारी बारिश का दबाव सह नहीं सकी.

जर्जर इमारतों की समस्या से मुंबई ही नहीं, बल्कि देश के कई अन्य महानगर भी जूझ रहे हैं.

बीबीसी ने राजधानी दिल्ली, आर्थिक राजधानी मुंबई और देश की पुरानी राजधानी कोलकाता में इस तरह की इमारतों का जायज़ा लिया. पेश है एक विस्तृत रिपोर्ट.

मुंबई के भिंडी बाज़ार इलाके की एक जर्जर इमारत

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इमेज कैप्शन, मुंबई के भिंडी बाज़ार इलाके की एक जर्जर इमारत

मुंबई के हालात

बृहन मुंबई म्युनिसिपल कार्पोरेशन (बीएमसी) ने भी सैकड़ों पुरानी इमारतों को ख़तरनाक घोषित कर रखा है, लेकिन इन सभी को खाली नहीं कराया जा सका है.

मुंबई से बीबीसी संवाददाता मयूरेश कोण्णूर के अनुसार बीएमसी ने ऐसी इमारतों की तीन श्रेणियां बनाई हैं. पहली श्रेणी सी 1 है, जिसमें ऐसी इमारतें आती हैं जिनमें रहना ख़तरनाक है और जिन्हें तुरंत खाली करा देने की ज़रूरत है.

सी2 श्रेणी की इमारतों में ढांचागत सुधार की ज़रूरत है जबकि सी3 श्रेणी में थोड़ी मरम्मत की ज़रूरत होती है.

बीएमसी की वेबसाइट पर छपे आंकड़े के अनुसार, शहर में 617 इमारतों को सी1 श्रेणी में बेहद ख़तरनाक घोषित किया गया है, जिनमें 112 को खाली करा लिया गया है. जबकि 138 इमारतों के बिजली पानी काट दिए गए हैं.

25 इमारतों को ढहा दिया गया है जबकि बाक़ी 112 इमारतों पर मुक़दमे चल रहे हैं.

मुंबई

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सबसे ख़तरनाक श्रेणी की अधिकांश इमारतें बहुत पुरानी हैं और वहां किरायेदारों के अदालत में मुक़दमे चल रहे हैं. प्रशासन भी इन्हें खाली करवाने में देरी करता है.

वर्ली इलाक़े में गोमाता नगर में 12 साल पहले झुग्गियों से लोगों को हटाकर ट्रांज़िट कैंप के रूप में बनाई गई 10 इमारतों में बसाया गया. 2013 में इन्हें सी1 कैटेगरी में डाल दिया गया.

10 में से छह इमारतों के लोगों को नए घर मिल गए हैं लेकिन अभी भी चार इमारतों में लोग रहे हैं.

सी1 कैटेगरी की इमारतें न केवल बारिश में बल्कि भूकंप में भी ज़ोखिम भरी हैं.

दिल्ली

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राजधानी दिल्ली की स्थिति

राजधानी दिल्ली में इसी साल नगर निगम के एक ताज़ा सर्वे में क़रीब 150 इमारतों को ख़स्ताहाल घोषित किया गया था, जिनमें 14 इमारतों को ख़तरनाक की श्रेणी में रखा गया.

आम तौर पर बारिश के मौसम में ये इमारतें जानलेवा साबित होती रही हैं.

बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी के अनुसार राजधानी दिल्ली में एमसीडी की तरफ से हर साल मॉनसून से पहले सर्वे कराया जाता है. उत्तर डीएमसी के पीआरओ योगेंद्र सिंह मान ने बीबीसी को बताया, अगर कोई मकान मरम्मत की श्रेणी में है तो इसके लिए उसे नोटिस भेजा जाता है. अगर ज़्यादा जर्जर हालत में मकान है तो उसे गिरा देने के आदेश दिए जाते हैं.

उत्तर एमसीडी में जिन मकानों को ख़तरनाक श्रेणी में डाला गया है उनमें सबसे अधिक सदर-पहाड़गंज के 8 मकान हैं, वहीं करोलबाग के 2, नरेला क्षेत्र में खेड़ा कलां गांव के लगभग 91 इमारतों को ख़तरनाक घोषित किया गया है.

सदर-पहाड़गंज के मानकपुरा में एक-दो मकान तो पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं.

दिल्ली

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मानकपुरा निवासी रमेश बेरवा ने बताया कि यहां के अधिकतर मकान 70 से 80 साल पुराने हैं. इन मकानों में अधिकतर मज़दूरी करने वाले लोग रहते हैं. इनके लिए कहीं और अपना ठिकाना तलाशना बहुत मुश्किल है.

उन्होंने कहा, "तीन से चार मंज़िला मकानों में 35 से 40 लोग रहते हैं. सभी दिहाड़ी मज़दूर हैं. नोटिस के बारे में जानकारी होने के बावजूद वे यहां रह रहे हैं. इन्हीं मकानों में हुए कई हादसों में लोगों ने अपनी जान भी गंवाई है."

मानकपुरा निवासी रोशनलाल ने बताया कि करीब 6 साल पहले जुलाई में उनकी बहन की मौत घर की छत गिरने से हो गई थी.

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट में प्रोफेसर और सिविल इंजीनियर चंदन कहते हैं कि दिल्ली में अधिकतर मकान बिना किसी प्लानिंग के बना दिए जाते हैं. ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड ने नेशनल बिल्डिंग कोड में कुछ मानक तय किए हैं, लेकिन इनका प्रयोग बहुत कम होता है.

कोलकाता की जर्जर इमारत

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कोलकाता में 2000 ख़तरनाक इमारतें

बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली के अनुसार कोलकाता म्युनिसपल कॉरपोरेशन के मुताबित कोलकाता में करीब दो हज़ार ऐसी इमारतें हैं जिन्हें ख़तरनाक श्रेणी में रखा गया है.

अधिकारियों के मुताबिक इनमें से करीब 100 बेहद जर्जर हालत में हैं जिन्हें तुंरत गिराए जाने की ज़रूरत है.

सेंट्रल कोलकाता के इंडियन मिरर स्ट्रीट पर पवन लाल शॉ की पैतृक इमारत उन दो हज़ार ख़तरनाक इमारतों में शामिल नहीं थीं लेकिन कुछ हफ़्ते पहले ही यह गिर गई.

शॉ ने उस दुर्घटना में अपनी एक भांजी को खो चुके हैं.

शॉ ने बीबीसी से कहा, "दादाजी के ख़रीदे इस मक़ान में चार पीढ़ियां यहां रह रही थीं. मैं इसके बगल वाले मक़ान में चला गया था लेकिन मेरी भतीजी का परिवार यहीं रह रहा था. उन्होंने इसका बहुत बढ़िया रख रखाव कर रखा था जिसे आप खुद देख सकते हैं. कुछ साल पहले ही इसे पेंट किया गया था. हमें अभी यह नहीं पता कि ये कैसे गिर गई."

दुर्घटना के बाद से नगरपालिका ने यहां एक साइनबोर्ड पर "सावधान, ख़तरनाक इमारत" लिख कर लगा दिया है.

टूटी इमारत के पास ही कई और पुरानी इमारतें हैं जिनमें से एक बीते जमाने की बॉलीवुड अभिनेत्री नरगिस दत्त के मामा एक मकान भी शामिल है.

कोलकाता की ख़तरनाक इमारत

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कोलकाता की इन जर्जर और ख़तरनाक इमारतों के साथ बड़ी समस्या ये है कि इनके मरम्मत की ज़िम्मेदारी संभालने वाला कोई भी नहीं है.

अधिकांश पुरानी इमारतों पर, ज़्यादातर परिवार के भीतर या बाहर, स्वामित्व के मुद्दे पर मुक़दमे चल रहे हैं.

कुछ इमारतों को रियल स्टेट डेवलपर्स ने ख़रीद लिया है और उनमें कई सालों से रहने वालों और किरायदारों के साथ मुआवज़े को लेकर मामला चल रहा है.

ऐसी ही एक इमारत वो हैं जिसमें एंड्रयू मंडल का परिवार कई पीढ़ियों से रह रहा था.

मंडल ने बीबीसी से कहा, "हमारी इमारत को 2009 में ख़तरनाक घोषित कर दिया गया था. हम कमरे के अंदर मरम्मत का काम कराते रहते थे. लेकिन इसका बाहरी हिस्सा बिल्कुल टूट फूट गया था. एक रियल स्टेट डेवलपर ने इसे 2014 में ख़रीद लिया लेकिन वो हमें उचित मुआवज़ा नहीं दे रहा. हम इसी जगह के आसपास अपना कारोबार करते हैं, हम कम मुआवज़े की रक़म के साथ कैसे जाते. इसलिए हम यहां रहने को मज़बूर हैं."

बीबीसी ने रियल स्टेट डेवलपर पंकज शॉ से उनकी बात जानने के लिए संपर्क किया.

उन्होंने कहा, "अधिकांश पुराने किराएदारों ने अपनी संपत्ति छोड़ दी है, और वो मुआवज़े की रक़म से संतुष्ट हैं. केवल कुछ ही यहां रह रहे हैं, जिनके कुछ अप्रत्यक्ष वजहें हैं.

बीबीसी ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस ख़तरनाक इमारत को क्यों ख़रीदा.

तो पंकज शॉ ने कहा, "देखिए हम डेवलपर हैं और शहर के बीचों बीच ज़मीन मिलना मुश्किल है. इसलिए हम ख़तरनाक इमारतें ख़रीदते हैं और उसमें रहने वालों को इसके लिए अच्छा पैकेज देते हैं. मैंने ऐसी कई प्रॉपर्टी ख़रीदी हैं लेकिन इसका मुझे एक अलग ही अनुभव मिला. और अब अगर ये इमारत गिर गई तो चूंकि मैंने इसे ख़रीदा है इसलिए मुझे ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा."

जर्जर इमारत

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लेनिन सरानी (लेनिन के नाम पर एक सड़क) पर एक इमारत 1848 में बनी थी. यह इमारत इस शहर के बनने की गवाह रही है. इस इमारत ने ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान भारत की राजधानी बनने से लेकर दंगे और राजनीतिक रैलियों समेत क्या नहीं देखा!

फिर भी आज ये ऐतिहासिक इमारत की सूची में नहीं है और यहां एक नई इमारत बनाने के लिए इसे बेचा और गिराया जा सकता है- क्योंकि ये किसी ऐतिहासिक व्यक्ति से जुड़ी नहीं है और न ही एंड्रयू मंडल के पूर्वजों में से कोई बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्ति था.

बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली ने वास्तुविद मनीष चक्रवर्ती से बात की, जो जर्जर इमारतों की मरम्मत के विशेषज्ञ हैं.

उन्होंने कहा, "पुराना ढांचा होने की वजह से ये इमारतें लंबे समय तक टिकाऊ और लचीली रही हैं. और भविष्य में इन इमारतों को बनाए रखने के लिए एक रणनीति अपनाने की ज़रूरत है जिसके तहत इनकी पूरी तरह मरम्मत की जानी चाहिए. ये कहीं बढ़िया विकल्प है न कि इन्हें गिराया जाना. डेवलपर्स तो निश्चित रूप से इस अवसर का फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे जो इसे एक बेतरतीब शहर बना देगा."

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