दफ़्तरों में यौन उत्पीड़न से कैसे लड़ें महिलाएं?

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- Author, अफ़रोदिति पिना
- पदनाम, वरिष्ठ प्राध्यापिका, केंट विश्वविद्यालय
पूरी दुनिया में कामकाजी महिलाएं यौन उत्पीड़न की शिकार हो रही हैं. हाल ही में हॉलीवुड में फ़िल्म निर्माता हार्वी वाइनस्टीन को लेकर बहुत से कलाकारों ने आवाज़ उठाई. इसके बाद भारत में भी बहुत सी अभिनेत्रियों ने यौन उत्पीड़न की बात कही. हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया.
इस मामले के सामने आने के बाद पूरी दुनिया में महिलाओं ने #MeToo हैशटैग के ज़रिए आपबीती सुनाई और यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई.
दफ़्तरों और कामकाजी जगहों पर यौन उत्पीड़न कोई नई बात नहीं. नई बात ये है कि अब इसके ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से आवाज़ उठाई जा रही है. लोग खुलकर इस मसले पर बात कर रहे हैं.
पहले जहां महिलाएं इसे नियति मानकर सिर झुकाकर मंज़ूर कर लेती थीं. वहीं, अब वो इसका विरोध कर रही हैं. इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं.

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अनकहे इशारे, ग़लत नीयत से छूना
दफ़्तरों में यौन उत्पीड़न सेक्स क्राइम यानी यौन अपराध के दर्जे में आता है. कुछ कही बातें, कुछ अनकहे इशारे, ग़लत नीयत से किसी को छूना यौन उत्पीड़न माना जाता है. ये बलात्कार जैसा ही है.
आम तौर पर कामकाजी महिलाओं को सेक्स के बदले में फ़ायदा पहुंचाने का वादा किया जाता है. ऑफ़िस में बड़े अफ़सर अपनी मातहत महिलाओं को फ़ायदा पहुंचाने का वादा कर के उनका यौन शोषण करते हैं.
हार्वी वाइनस्टीन के मामले में ऐसा ही हुआ था. हालांकि ऐसे मामले कुल यौन शोषण का महज़ 3 से 16 फ़ीसदी हिस्सा होते हैं.
दफ़्तर में बलात्कार के मामले तो और भी कम होते हैं. कुल यौन शोषण के मामलों का महज़ एक से 6 फ़ीसदी.
यौन उत्पीड़न का मतलब है, बेहूदा जुमलेबाज़ी, बार-बार मिलने की गुज़ारिश, किसी लड़की के शरीर की बनावट के बारे में टिप्पणी, घूरना, सीटी बजाना और बेहूदा इशारेबाज़ी.

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गंभीरता से ली जाएं शिकायतें
कुल यौन उत्पीड़न के मामलों का 55 प्रतिशत यही बर्ताव होता है.
यौन उत्पीड़न पर आधिकारिक रिपोर्ट पूरी सच्चाई नहीं बताती हैं. दफ़्तर में छोटे कर्मचारी अक्सर इसके शिकार होते हैं. वो पीड़ित होने के बावजूद ख़ामोशी अख़्तियार करना बेहतर समझते हैं.
कई बार तो उनकी शिकायतें भी अनसुनी कर दी जाती हैं. यौन उत्पीड़न से लड़ाई की पहली शर्त है कि शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए.
बार-बार बुरा बर्ताव भी दफ़्तर का माहौल ख़राब करता है. पीड़ित युवती के काम पर असर डालता है. उसकी सेहत पर भी यौन उत्पीड़न का बुरा असर पड़ता है.
यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाएं अक्सर डिप्रेशन और सदमे की शिकार हो जाती हैं. इसका असर उनके करियर, उनकी तरक़्क़ी पर भी पड़ता है. उनकी बुरी हालत से साथी कर्मचारी भी प्रभावित होते हैं.

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कैसे निपटें यौन उत्पीड़न से?
महिलाएं यौन उत्पीड़न से निपटने के कई तरीक़े अपनाती हैं. ये सामने वाले के बर्ताव और मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है.
पहले तो वो उत्पीड़न करने का विरोध करती हैं. उससे दूरी बनाती हैं. अपने दोस्तों, सहयोगियों और रिश्तेदारों से इस बारे में बात करती हैं. वो सीधे-सीधे आरोपी को चुनौती देती हैं. या फिर तंग आकर उसकी शिकायत करती हैं.
सबसे ज़्यादा महिलाएं दूरी बनाने का तरीक़ा अपनाती हैं. हालांकि ये ज़्यादा कारगर नहीं होता. क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में आरोपी और हमलावर हो जाता है.
बेहतर तरीक़ा है कि यौन उत्पीड़न करने वाले का सामना किया जाए. उसकी शिकायत की जाए.
असल में महिला कर्मचारी यौन उत्पीड़न से कैसे निपटेंगी, ये बात बहुत कुछ दफ़्तर के माहौल पर निर्भर करती है.

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कैसे बढ़ा हार्वी का हौसला?
अगर महिला को ये लगेगा कि आरोपी की शिकायत से उसके करियर पर असर पड़ेगा, तो वो ख़ामोश रहना और दूरी बनाना बेहतर समझती हैं.
अगर मामला बहुत गंभीर हो जाता है, तो ही वो शिकायत करती हैं. इससे भी पहले वो देखती हैं कि पहले की शिकायतों में दफ़्तर की तरफ़ से क्या क़दम उठाए गए.
हार्वी वाइनस्टीन के मामले में ये बात सामने आई कि उसका बर्ताव सब को मालूम था. अक्सर उसके दफ़्तर के लोग यौन उत्पीड़न की घटनाओं से आंखें मूंदे रहते थे.
यानी वो भी कहीं न कहीं हार्वी के जुर्म में साझीदार थे. उनकी ख़ामोशी ने हार्वी के बर्ताव को हवा दी. उसका हौसला बढ़ाया.
दफ़्तरों में ऐसा माहौल होने पर महिलाएं ख़ामोशी से सब बर्दाश्त करती हैं.

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ट्रेनिंग की ज़रूरत
वैसे भी अलग-अलग महिलाओं के लिए यौन उत्पीड़न का दर्जा अलग होता है. कोई छोटी सी बात पर भी बिफर सकता है. किसी के बर्दाश्त करने की हद ज़्यादा होती है. या उसे ये समझने में वक़्त लगता है कि उसका उत्पीड़न हो रहा है.
सबसे ज़रूरी बात ये है कि इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को डर न लगे. वो खुलकर अपनी बात कह सकें. वो ये बता सकें कि किसी का भद्दा मज़ाक़ उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं आया. किसी का भद्दा कमेंट बुरा लगा.
दफ़्तर के दूसरे लोगों को भी इस बात की आवाज़ उठाने वालों का समर्थन करना चाहिए.
ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम दफ़्तर का माहौल काम करने लायक़ बनाएं. जिसमें लोग सम्मान के साथ काम कर सकें. उनके मानवाधिकारों का हनन न हो. कर्मचारियों को इसके लिए वक़्त-वक़्त पर ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.

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#MeToo
आज कल आप सोशल मीडिया के ज़रिए भी दफ़्तर में यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकते हैं. उन लोगों से अपनी तकलीफ़ साझा कर सकते हैं, जो उसके शिकार हुए.
जैसे कि #MeToo अभियान में बहुत से लोगों ने अपनी आवाज़ बुलंद की और तजुर्बा साझा किया.
सोशल मीडिया पर ऐसे अभियान दूसरों को सुनने के लिए भी होते हैं और अपना बुरा तजुर्बा बताने के लिए भी. ये हमें सबक़ भी देते हैं. आप पीड़ितों के साथ हमदर्दी महसूस करते हैं. ख़ुद को उनके क़रीब पाते हैं.
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