क्यों सोशल मीडिया पर अपने यौन उत्पीड़न पर लिख रही हैं औरतें?

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    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

काम की जगह पर एक औरत के मना करने के बावजूद कोई मर्द उसे छूने की कोशिश करे, यौन संबंध बनाने की मांग करे या सेक्शुअल भाषा का इस्तेमाल कर टिप्पणियां करे तो उसे क्या करना चाहिए?

सोशल मीडिया पर उसका नाम जारी करना चाहिए या क़ानून के मुताबिक, यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए तय 'इंटर्नल कम्प्लेंट्स कमेटी' में इसकी शिकायत करनी चाहिए?

ये सवाल इसलिए उठा है क्योंकि एक व़क़ील, राया सरकार ने विश्वविद्यालयों में पढ़ रही औरतों से अपील कर कहा कि अगर उन्होंने कभी यौन उत्पीड़न का सामना किया है तो उन्हें बताएं.

औरतों द्वारा भेजे गए निजी संदेशों के आधार पर राया सरकार ने, औरतों की पहचान बताए बिना, फ़ेसबुक पर 68 प्रोफ़ेसर के नाम जारी किए. इनमें से ज़्यादातर भारतीय हैं और जाने-माने विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं.

नाम जारी करने से पहले इनकी सहमति नहीं ली गई है, इनके ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की कोई जानकारी नहीं दी गई है और उन आरोपों की कोई संस्थागत या क़ानूनी जांच नहीं की गई है.

वक़ील ने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा है कि उनका मक़सद इन प्रोफ़ेसरों के बारे में लिखकर उनके अन्य छात्रों को ख़तरे से आगाह करना है.

एक पोस्ट में ये भी लिखा है कि उन्हें उम्मीद से कहीं ज़्यादा संदेश आ रहे हैं और उनकी कोशिश है कि वो प्रोफ़ेसर का नाम जारी करने के अलावा हर मामले में औरत को सलाह दें कि वो क़ानूनी प्रक्रिया की भी मदद ले सकती हैं या नहीं?

अलग-अलग राय

ये तरीका सही है या ग़लत, इसपर राय बंटी हुई है.

लेकिन बहस के केंद्र में मुद्दा ये है कि शिकायत करनेवाली इतनी सारी औरतों को यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बने क़ानून और जांच कमेटी के पास जाने में क्या परेशानी पेश आती है? उस प्रक्रिया में क्या कमी है?

मर्द और औरत हाथ पकड़े हुए

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व़क़ील को अपनी शिकायत भेजनेवाली एक महिला, सोनल केलॉग ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें क़ानूनी प्रक्रिया पर कोई भरोसा नहीं.

उनके मुताबिक एक छात्र को अपने वरिष्ठ प्रोफ़ेसर जैसे रसूख़वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ शिकायत करने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है. उसके बाद भी जांच समिति में उसी का बोलबाता होता है और संस्थान का रवैया मदद का नहीं होता.

उनके और उनकी दोस्त की यौन उत्पीड़न की शिकायत एक ही व्यक्ति के ख़िलाफ़ थी जिसकी उन्होंने गुजरात विश्वविद्यालय के वाइस चांस्लर को शिकायत की थी लेकिन उसपर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

वो मानती हैं कि सोशल मीडिया पर इस तरह नाम जारी करने का ग़लत इस्तेमाल किया जा सकता है पर कहती हैं, "सार्वजनिक तरीके से बेइज़्ज़त करने से अन्य औरतों को बल मिलता है, जो कोई भी उस आदमी से परेशान हो या किसी और आदमी से परेशान हो, साथ ही इस मुद्दे पर बातचीत तो शुरू होती है."

पर मौजूदा क़ानून में क्या ख़ामियां हैं? या उसके लागू किए जाने में क्या अड़चनें आती हैं?

काम की जगह पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए क़ानून महिला आंदोलन की कई दशकों की मेहनत का नतीजा है.

1997 से पहले काम की जगह पर होनेवाले यौन उत्पीड़न के लिए कोई विशेष क़ानून नहीं था.

एक केस पर फ़ैसला सुनाते व़क्त सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में इसके लिए पहली बार निर्देश जारी किए जिन्हें 2013 में बाक़ायदा क़ानून की शक़्ल दी गई.

क़ानून के तहत यौन उत्पीड़न की शिकायत किए जाने पर संस्था की ज़िम्मेदारी है कि वो एक शिकायत कमेटी का गठन करे जिसकी अध्यक्षता एक महिला करे, उसकी आधी से ज़्यादा सदस्य महिलाएं हों और उसमें यौन शोषण के मुद्दे पर काम कर रही किसी बाहरी ग़ैर-सरकारी संस्था की एक प्रतिनिधि भी शामिल हो.

मर्द और औरत बात करते हुए

ऐसी कई कमेटी पर यौन शोषण के मुद्दे पर काम कर रही किसी बाहरी प्रतिनिधि के तौर पर रहीं फ़ेमिनिस्ट लक्ष्मी मूर्ति के मुताबिक ये क़ानून बहुत अहम् है क्योंकि ये औरतों को अपने काम की जगह पर बने रहते हुए कुछ सज़ा दिलाने का उपाय देता है.

यानी ये जेल और पुलिस के कड़े रास्ते से अलग न्याय के लिए एक बीच का रास्ता खोलता है.

वो बताती हैं, "इन मामलों में अक़्सर औरत पुलिस या जेल का रास्ता नहीं तलाश रही होती, बल्कि चाहती है कि संस्था के स्तर पर आरोपी के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई हो, किसी तरह का जुर्माना तय हो और चेतावनी दी जाए."

पर इस प्रक्रिया में संस्था का यही प्रभुत्व परेशानी भी पैदा कर सकता है. जांच समिति का गठन संस्था की ज़िम्मेदारी है और उसके सदस्य भी वही चुनती है.

समितियां सिर्फ़ ढकोसला

ऐसी ही एक समिति में अपनी शिकायत ले जानेवाली पत्रकार एस. अकिला आरोप लगाती हैं कि ऐसी समितियां सिर्फ़ एक ढकोसला होती हैं और उत्पीड़न करनेवाले को बचाने की मंशा से गठित की जाती हैं.

एस. अकिला के मामले में समिति का फ़ैसला उनके हक़ में नहीं आया था और उनके वरिष्ठ सहकर्मी को निर्दोष पाया गया था.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि, "वो इतना ताक़तवर था कि मेरे साथ काम करनेवाली औरतों ने ही उसका साथ दिया, ऐसी स्थिति में अगर सोशल मीडिया के इस्तेमाल से नाम बाहर आए तो कम से कम ये और लोगों के लिए चेतावनी का काम तो करेगा."

हर समिति पक्षपात करे ये कतई ज़रूरी नहीं पर लक्ष्मी मानती हैं कि उनके अनुभव में समिति ज़्यादा कारगर रही हैं जब शिकायत एक ही ओहदे या पद वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ की गई हैं ना कि किसी रसूख़वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़.

चेहरा छुपाती औरत

इस सबके बावजूद वो मानती हैं कि सोशल मीडिया पर नाम जारी करना भी कोई उपाय नहीं है.

ये पहली बार नहीं है कि किसी ने इंटरनेट पर अपनी आपबीती ज़ाहिर की हो. साल 2013 में एक औरत ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज के ख़िलाफ़ (बिना उनका नाम लिए) यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए एक ब्लॉग लिखा था.

उसने भी जांच समिति का रास्ता नहीं अपनाया था. हालांकि वो मुद्दा फिर मीडिया की नज़र में आया और वरिष्ठ व़क़ील इंदिरा जयसिंग ने उसके बारे में लिखा.

एक जांच समिति भी गठित हुई और उसमें जस्टिस एके गांगुली को उत्पीड़न का दोषी भी पाया गया.

सामने आना और शिकायत करना एक अहम शुरुआत है. सोनल केलॉग बाल यौन शोषण की सर्वाइवर हैं. और अपनी जैसी और औरतों को बल देने और ख़ुलकर बोलने के लिए प्रोत्साहित करने को एक वेबसाइट चलाती है.

तो क्या इंटरनेट किसी तरह के न्याय की शुरुआत हो सकती है? या इसके साथ बहुत ख़तरे जुड़े हैं? और न्याय के लिए रास्ता क़ानून प्रक्रिया से ही निकलना चाहिए?

बहस जारी है पर इतना तो तय है कि जिन औरतों ने (अपनी पहचान छुपाकर) सोशल मीडिया पर लोगों के नाम दिए हैं उन्हें अब जवाबी क़ानूनी प्रक्रिया का सामना भी करना पड़ सकता है.

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