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'हॉकी में फिक्सिंग आरोपों को गंभीरता से लें' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
28 जनवरी 1996. बार्सिलोना के कातलान स्पोर्ट्स क्लब में भारत और मलेशिया के बीच गोलरहित ड्रा मुक़ाबले के बाद कनाडा के कोच शियाज़ विरजी रो रहे थे. वजह, उन्हें शक था कि इस मुक़ाबले का फ़ैसला मैदान से बाहर तय किया गया था. अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ यानी एफ़आईएच, भारत और मलेशिया से वास्ता रखने वाले लोग चुप्पी लगाए उन्हें देख रहे थे. किसी ने भी उनके पास जाकर ये जानने की कोशिश नहीं की कि किस तरह से एशियाई देशों ने एक उत्तर अमरीकी देश को 1996 के अटलांटा ओलंपिक खेलों की पुरुष हॉकी स्पर्धा से बाहर कर दिया था. इस गोलरहित ड्रॉ के कारण मलेशिया आठ देशों के इस क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में कनाडा से एक अंक अधिक लेकर शीर्ष पांच में पहुँच गया. मलेशिया को गोल औसत के आधार पर पछाड़ने के लिए कनाडा को बड़ी जीत की ज़रूरत थी और वह कमज़ोर बेलारूस को 7-1 से शिकस्त देने में कामयाब भी रहा. लेकिन भारत के ख़िलाफ़ ड्रा मुक़ाबले से मलेशिया को मिले एक अंक की टीस कोच विरजी के मन में इस कदर थी कि उन्होंने आरोप लगा डाला कि “पूरे मुक़ाबले के दौरान भारत कभी जीत के लिए नहीं खेला.” फिक्सिंग की छाया सिर्का 2008. मलेशिया हॉकी महासंघ ने कुआलालंपुर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि मई के आख़िर में हुए सुल्तान अज़लान शाह टूर्नामेंट में उनकी राष्ट्रीय टीम के कुछ खिलाड़ियों ने ‘जानबूझकर’ कमतर प्रदर्शन किया था.
इस मुक़ाबले में जीत के बाद भारतीय टीम फ़ाइनल में पहुंची थी, हालाँकि ख़िताबी मुक़ाबले में अर्जेंटीना के हाथों उसे शिकस्त झेलनी पड़ी थी. बदकिस्मती से ये पहली बार नहीं है जब दोनों टीमों पर मैदान पर सांठगांठ करने के आरोप लगे हैं. पहली बार ऐसी कानाफूसी तब हुई थी जब मलेशिया को 1975 विश्व कप की मेज़बानी दी गई और भारत इस ख़िताब को जीतने में सफल रहा. संयोग ही है कि इस टूर्नामेंट में यह भारत की अब तक की इकलौती सफलता है. उस दौरान ये आरोप लगा कि भारत ने इस शर्त पर मलेशिया को मेज़बानी देने का समर्थन किया था कि बदले में वह 1980 के विश्व कप की मेज़बानी के लिए भारत का समर्थन करेगा. मलेशियाई खिलाड़ियों पर लगे ताज़ा आरोप भी विरजी के संदेह को सही ठहराते हैं. विरजी वर्ष 2000 में सिडनी ओलंपिक खेलों के बाद कनाडा के राष्ट्रीय कोच के पद से हट गए थे. भारत और मलेशिया के बीच मैदान और मैदान से बाहर ‘सांठगांठ’ के विरजी के आरोपों की अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ ज़्यादा देर तक अनदेखी नहीं कर सकता. ख़ासकर तब अगर मलेशियाई पुलिस खिलाड़ियों की मिलीभगत के कुछ विश्वसनीय सबूत पेश कर दे. बुरा दौर भारत के बीजिंग ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई न कर पाने के कारण अंतरराष्ट्रीय हॉकी यूं भी बुरे दौर से गुज़र रही है और ओलंपिक में इस स्पर्धा को लेकर ही सवाल उठाए जाने लगे हैं.
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की अगले साल डेनमार्क के कोपेनहेगेन में बैठक होगी जिसमें वर्ष 2016 के ओलंपिक मेज़बान का फैसला तो होगा ही, साथ ही ओलंपिक में शामिल स्पर्धाओं पर भी चर्चा होगी. माना जा रहा है कि समिति की बैठक में हॉकी पर भी रायशुमारी हो सकती है. ओलंपिक की वर्ष 2012 की मेज़बानी के लिए सिंगापुर में हुई बैठक के दौरान भी हॉकी किसी तरह अपना स्थान ओलंपिक में बनाए रखने में सफल हुई थी. अब भारत बीजिंग ओलंपिक में नहीं खेल रहा है, ऐसे में हॉकी की की मार्केटिंग को लेकर गहरे सवाल उठ रहे हैं. रही-सही कसर घूस और भ्रष्टाचार के आरोपों ने पूरी कर दी है. अभी समय है कि अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ भ्रष्टाचार के ताज़ा आरोपों की गंभीरता से जाँच करे वरना न सिर्फ़ यह ओलंपिक खेलों से बाहर हो जाएगा, बल्कि इसके अस्तित्व को बचाना भी मुश्किल हो जाएगा. |
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