गाँव की सत्ता से एनबीए वाले सतनाम का सफ़र

सतनाम

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    • Author, वंदना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पंजाब के बरनाला ज़िला का छोटा सा गाँव है बल्लो के, आबादी करीब 2200. काफ़ी पिछड़े हुए इस गाँव का बहुतों ने पहले नाम भी नहीं सुना होगा. लेकिन यहाँ के रहने वाले सतनाम सिंह ने ये पक्का कर दिया है कि उन्हें और उनके गाँव को कोई अब हल्के में नहीं ले.

जब से सतनाम अमरीका की मशहूर नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन यानी एनबीए ड्राफ़्ट में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने हैं, गाँव में उनकी ही चर्चा है.

19 साल और सात फ़ुट दो इंच के सतनाम पिछले पाँच साल से अमरीका में रहते हैं. सतनाम की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी जानने के लिए हमने उन्हें अमरीका फ़ोन किया, बधाइयों के तांते के बीच उनके पास रात को ही बात करने की फुरसत थी यानी भारत में सुबह के कोई छह बजे.

अपनी भारी भरकम आवाज़ में सतनाम ने बताया कि आज भले ही लोग उन्हें चैंपियन समझते हैं लेकिन बचपन में उन्हें ये खेल कतई पसंद नहीं था.

सतनाम का परिवार खेती-किसानी करता आया है. लंबी कद काठी और डील डौल सतनाम को विरासत में मिली. पिता बलबीर सिंह भामरा का कद करीब- करीब सतनाम जितना है, दादा और दादी का कद करीब 6 फ़ुट 9 इंच था.

पसंद नहीं था बास्केटबॉल

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सतनाम के पिता बताते हैं कि उनका बचपन बहुत गरीबी और बिन माँ के बीता था और वो कभी चाहकर भी स्पोर्ट्स में नहीं जा सके.

लेकिन सतनाम थोड़ा बड़े हुए तो परिवार के एक दोस्त ने सतनाम की कद काठी देखकर पिता बलवीर को बोला कि इसे खेती में न डालकर स्पोर्ट्स में डालो. बस वहीं से शुरू हुआ सतनाम का सफ़र और वे गाँव से लुधियाना बास्केटबॉल एकेडेमी जाकर बास्केटबॉल सीखने लगे.

सतनाम बताते हैं, "मुझे बास्केटबॉल पसंद नहीं था. मैंने सोचा कि मैं नहीं खेलूंगा. लुधियाना से हर हफ्ते मैं गाँव भाग आता. एक दिन मैंने जगदीप बैंस का खेल देखा. मैं उन्हें इंडिया का सबसे तगड़ा प्लेयर मानता हूँ. उनका गेम देखा तो लगा मुझे ऐसा ही प्लेयर बनना है. 2010 तक मैं भारत में खेलता रहा. पंजाब टीम, नेशनल, इंटरनेशनल भी खेला. एक दिन मुझे बताया गया कि अमरीका से कुछ कोच आए हैं जो चार लड़के-लड़कियों का चयन करना चाहते हैं. सबने कहा सतनाम को कोशिश करनी चाहिए. मुझे आईएमजी की ओर से स्कॉलरशिप मिला जिसके बाद मैं 2010 में अमरीका आ गया."

कभी लुधियाना से हर हफ़्ते गाँव भाग जाने वाले सतनाम को अमरीका में आए दिन नई-नई दिक्कतें झेलनी पड़ी. 14 साल के लड़के के लिए बेगाने मुल्क़ में रहना इतना आसान नहीं था.

नहीं आती थी अंग्रेज़ी

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पुराने दिनों की परेशानियों पर हँसते हुए सतनाम बताते हैं, "मुझे सब कुछ अलग सा लगता था. जब मैं अमरीका आया था तो खाना अजीबोगरीब लगा. तीन-चार दिन बाद मैंने जो मिल रहा था वही खाना शुरू कर दिया क्योंकि यहां मम्मी तो बैठी नहीं थी जो मनपसंद खाना लाकर देती. मुझे यह भी अहसास हो गया कि मैं वापस घर नहीं जा सकता था. यहीं रहना पड़ेगा और मन लगाकर खेलना होगा."

लेकिन मामला इतना आसान नहीं था, ख़ासकर अगर अमरीका में अंग्रेज़ी बोलनी न आती हो. सतनाम ने बताया कि पहले तो कुछ समय वो सिर्फ़ पंजाबी ही बोलते रहे लेकिन फिर स्कूल जाकर इंग्लिश सीखी.

गाँव की सत्ता से एनबीए के सतनाम सिंह के सफ़र की छोटी सी झलक मुझे इस वाक्य में नज़र आई.

जिस दौरान फ़ोन पर मेरी उनसे बात हो रही थी उसी दौरान सतनाम के कुछ अमरीकी दोस्त घर पर आए हुए थे. मेरी बात बीच में रोककर सतनाम ने दोस्तों से विदा ली और बोला, "थैंक यू गाएज़, सी यू टूमॉरो". और फिर मुझसे ‘सॉरी फॉर थैट’ बोलकर बातों का सिलसिला आगे बढ़ा दिया.

चोरी छिपे खाना खाते थे

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दिखने में लंबे चौड़े और भारी भरकम आवाज़ वाले सतनाम की बहन सरबजोत ने उन्हें अलग रूप में देखा है.

बचपन की यादें बांटती हुई सरबजोत ने बताया, "हम साथ-साथ स्कूल जाते थे. वो बहुत नरम मिजाज़ और भोले थे. पढ़ाई में कम ही मन लगता था. हाँ उन्हें स्कूल में भूख बहुत लगती थी. स्कूल में खाना खाने के लिए बस लंच ब्रेक मिलता था. लेकिन मैं उन्हें चोरी-चोरी क्लास में खाना देती थी."

सतनाम बताते हैं, "मैं बड़ा हूँ और खेती में मदद करने की ज़िम्मेदारी अकसर बड़े बेटे के कंधों पर आती है. लेकिन मेरे भाई और बहन ने कहा कि भैया आप आगे बढ़िए घर-परिवार हम देख लेंगे. मेरे भाई बहन ने मेरी बहुत मदद की है."

ग़रीबी में जीवन काटने वाले पिता बेटे की कामयाबी को अपनी कामयाबी मानते हैं. वो बड़े मान से कहते हैं, "इस सफलता में मेरा भी खून पसीना मिला है."

सतनाम के परिवार ने गाँव में कई छोटे-मोटे काम किए, भाई आटा चक्की चलाने में गाँव में पिता की मदद करता आया है, तभी सतनाम बास्केटबॉल के मैदान पर ऊंची छलांगे लगा पाते हैं.

लेकिन भारत में खिलाड़ियों की समस्याओं को सतनाम भूले नहीं हैं. वे कहते हैं, "खिलाड़ियों को अच्छी डाइट, अच्छा मैदान नहीं मिलता. खाना अच्छा नहीं मिलेगा तो वो बाहर खाएंगे, बीमार होंगे फिर घर जाएंगे जिससे उनकी प्रैक्टिस ख़राब होगी. इसलिए उन्हें शुरू में ही बेहतर सुविधाएँ मिलनी चाहिए."

दूर है मंज़िल

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अभी हर ओर सतनाम की कामयाबी का जश्न है लेकिन सतनाम का सपना क्या है? तपाक से वे जवाब देते हैं, "मेरा जो सपना था मैं उसके अंदर घुस गया हूँ. अब बस अच्छा खेलना है और कुछ करके दिखाना है ताकि लोग देखें कि कोई इंडिया का प्लेयर आया है. उम्मीद है मेरे आने से अमरीका में दूसरे भारतीयों के लिए दरवाज़े खुलेंगे."

लेकिन एनबीए में अभी सतनाम की शुरुआत भर है. अभी दो हफ़्ते बाद वे वहाँ समर लीग में खेलेंगे और उनके प्रदर्शन के आधार पर ये तय होगा कि क्या वे एनबीए में खेलने वाले पहले भारतीय बनेंगे या नहीं.

सतनाम के परिवार ने अब तक बहुत सीमित संसाधनों में गाँव में जीवन बसर किया है. उन्हें उम्मीद है कि एनबीए से सतनाम न केवल नाम रौशन करेगा बल्कि परिवार को भी गुरबत से निकालेगा.

और हाँ 22 नंबर का जूता पहनने के लिए कोई सतनाम को चिढ़ाएगा नहीं.

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