लवलीना बोरगोहाईं: भारत की चैंपियन बॉक्सर जिन्हें मोहम्मद अली की कहानी से मिली प्रेरणा

लवलीना

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    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत की चैंपियन बॉक्सर लवलीना बोरगोहाईं ने विमेन वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप के 75 किलो वर्ग में ऑस्ट्रेलिया की केटलिन पारकर को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है.

लवलीना ने इस चैंपियनशिप में भारत को चौथा गोल्ड दिलाया. इनके पहले निख़त ज़रीन, नीतू घनघस और स्वीटी बूरा भी भारत की झोली में गोल्ड मेडल डाल चुकी हैं.

लवलीना बीबीसी की ओर से दिए जाने वाले 'बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयर पुरस्कार' की दावेदार रही हैं. वो पुरस्कार के तीसरे संस्करण की नॉमिनी रह चुकी हैं.

इससे पहले लवलीना विश्व चैंपियनशिप में भी दो बार कांस्य पदक जीत चुकी हैं. उन्होंने टोक्यो ओलंपिक में भी कांस्य पदक जीता था.

लवलीना बोरगोहाईं टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने वाली इकलौती भारतीय मुक्केबाज थीं. उन्होंने तमाम दिग्गज मुक्केबाजों के बीच कांस्य पदक जीता, यह और भी मायने रखता है.

भारतीय दल में मैरीकॉम और अमित पंघाल की मौजूदगी की वजह से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी. पर लवलीना के कांस्य पदक ने किसी तरह से भारत की इज्जत बचाई थी.

लवलीना को ओलंपिक फाइनल में भाग लेने का भरोसा था लेकिन वह सेमीफाइनल मुकाबले में विश्व चैंपियन बुसेनाज के हाथों हार गई थीं. सही मायनों में वह अपनी विपक्षी का ढंग से सामना ही नहीं कर पाई और 5-0 से हारकर कांस्य पदक से संतोष करने को मजबूर हो गई.

ओलंपिक में पदक जीतना हर खिलाड़ी का सपना होता है और मुक्केबाज भी इससे भिन्न नहीं हैं. ओलंपिक में पदक जीतने की वजह से लवलीना देश की स्टार बन गईं. लौटने पर जगह-जगह सम्मान होने से वह कहीं ना कहीं दिशा भटकने लगी थीं.

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उतार-चढ़ाव का दौर

लवलीना ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने से रातों-रात मिली प्रसिद्धि को सही मायनों में पचा नहीं सकीं. इसका ही परिणाम था कि वह 2022 के इस्तांबुल विश्व चैंपियनशिप में एकदम फ्लॉप हो गई थीं.

उनकी यहां दूसरे राउंड में ही चुनौती टूट गई. कॉमनवेल्थ गेम्स के मुकाबलों को आमतौर पर आसान माना जाता है. इस कारण उनसे बर्मिंघम में स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीद की जा रही थी, पर वह क्वार्टर फाइनल से आगे अपनी चुनौती को नहीं बढ़ा सकीं.

सफलता को पूजा जाता है और सफलता हासिल नहीं करने वालों की आलोचना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है.

इन खराब प्रदर्शनों के बाद यह कहा जाने लगा कि उनकी संभावनाएं खत्म हो गई हैं. इस बीच, इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोसिएशन ने लवलीना के 69 किलो वर्ग को 2024 के पेरिस ओलंपिक में खत्म करके उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं. अब उनके पास 75 किलो वर्ग में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.

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मानसिक मजबूती से करियर को उड़ान

लवलीना कहती हैं कि ओलंपिक के बाद तमाम उतार चढ़ावों का सामना करना पड़ा. ऊंचे वजन वर्ग में जाने से भी दिक्कतें बढीं. पर वह यह बात समझ गई कि उनकी असफलताएं की वजह मनोवैज्ञानिक ज्यादा है. इस पर काम करने से 75 किलो वर्ग में उनकी एकदम से किस्मत बदल गई.

लवलीना के शुरुआती करियर को आकार देने वाले साई कोच पादुम बोरो ने एक बार कहा था कि लवलीना में बेहतरीन मुक्केबाज बनने की क्षमता थी. हमने तो सिर्फ उसका मार्गदर्शन किया है.

शुरुआत में उसका शांत दिमाग ही उसकी सबसे बड़ी मजबूती थी. वह कभी तनाव में नहीं रहती थी और उसमें कभी हार नहीं मानने का जज्बा था और यह खूबी उसकी मानसिक मजबूती को दर्शाती है. अपनी इस मानसिक मजबूती से ही ओलंपिक के बाद की मुश्किलों से वह पार पाने में सफल हुई हैं.

मिडिलवेट में आने के बाद वह पहले गुजरात राष्ट्रीय खेलों में उतरीं और यहां स्वर्ण पदक जीतने से उनका खुद में भरोसा बढ़ गया. इसके बाद एशियाई चैंपियनशिप के स्वर्ण पदक ने फिर से ओलंपिक वाला जज़्बा बना दिया.

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लवलीना का सफलता से नाता है पुराना

किसी भी मुक्केबाज़ का सपना ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतना होता है. लवलीना ने विश्व चैंपियनशिप में पदक 2018 में ही पा लिया था.

वह एक साल बाद फिर विश्व चैंपियनशिप में भाग लेने को उतरीं पर वह इस बार भी अपने पदक का रंग बदलने में कामयाब नहीं हो सकीं और उन्हें कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा है.

लवलीना अब विश्व चैंपियनशिप में पदक का रंग बदलने में कामयाब हो गई हैं. इससे लगता है कि वह यदि इसी तरह आगे बढ़ती रहीं तो अगले साल पेरिस में होने वाले ओलंपिक खेलों में भी पदक का रंग बदलने में कामयाब हो जाएंगीं.

मुश्किलों में बीता बचपन

असम के गोलाघाट जिले में दो अक्टूबर 1997 को जन्मीं लवलीना के घर की हालत ऐसी नहीं थी कि वह इस स्तर की मुक्केबाज बनतीं. पिता टिकने छोटे व्यापारी थे और हर माह 13000 रुपये कमाते थे. पर इतना जरूर था कि वह बेटी के सपने को साकार करने में हरसंभव मदद देने को तैयार थे.

लवलीना की दो बड़ी बहनें लीचा और लीमा हैं. यह दोनों ही किक बॉक्सिंग में भाग लेतीं थीं. इनको देखकर वह भी शुरुआत में ही किक बॉक्सिंग में भाग लेने लगीं. स्कूल से साई सेंटर में भी उनका इस खेल के लिए ही चयन हुआ था.

लेकिन वहां कोच पादुम बोरो ने उनकी सही प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बॉक्सिंग अपनाने की सलाह दी और इस सलाह ने ही आज देशवासियों को ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जिताने वाली मुक्केबाज दिला दी है.

सही मायनों में लवलीना की हिम्मत और जज़्बा का ही कमाल है कि असम के छोटे से शहर से निकली लड़की आज दुनियाभर में भारतीय तिरंगा फहरा रही है.

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मोहम्मद अली की कहानी ने दिखाई राह

पिता टिकने एक बार अपनी बेटी के लिए मिठाई लेकर आए. यह मिठाई एक अखबार में लिपटी हुई थी. लवलीना ने मिठाई खाने के बाद अखबार को देखा तो उसमें महान मुक्केबाज मोहम्मद अली की कहानी छपी हुई थी.

लवलीना ने बहुत चाव के साथ इस कहानी को पढ़ा. उनके मन में यह घर कर गया कि उन्हें भी एक ऐसा मुक्केबाज़ बनना है, जो देश का नाम रोशन करे. उसकी यह लगन आज उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाने में सफल हो गई है.

लवलीना भले ही प्री क्वार्टर फाइनल में मैक्सिको की वानेशा के खिलाफ बहुत दमदार प्रदर्शन नहीं कर सकी थीं. लेकिन इसके बाद क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल में उनके प्रदर्शन को देखकर उनके अंदर का चैंपियन दिखने लगा. वह बहुत ही मजबूत डिफेंस करने वाली मुक्केबाज़ बन गई हैं. जोरदार पंच और जैब तो वो पहले भी लगाती थीं.

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रविवार को उनके करियर में एक और सितारा जुड़ गया, जब उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की केटलिन पारकर को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है.

दोनों खिलाड़ियों के बीच कांटे की टक्कर थी. लवलीना ने पहला राउंड लवलीना ने 3-2 के अंतर से जीता. दूसरा राउंड केटलिन ने जीता. तीसरे और आखिरी राउंड में दोनों के बीच कांटे की टक्कर रही और अंत में मैच का नतीजा रिव्यू के लिए गया.

रिव्यू के दौरान सभी जज ने मिलकर लवलीना को विजेता घोषित किया. इसके साथ ही इस चैंपियनशिप में देश को चौथा गोल्ड मेडल मिल गया.

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