कुलदीप यादव अच्छा खेलकर भी टीम से बाहर क्यों रहते हैं?

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- Author, चंद्रशेखर लूथरा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
किसी भी खिलाड़ी को अपने करियर में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है.
लेकिन किसी भी खेल में, किसी खिलाड़ी के लिए नेशनल टीम से बाहर होने की चुनौती बहुत बड़ी होती है. बाहर जाकर टीम में वापस आना आसान नहीं होता.
बात जब भारतीय क्रिकेट टीम की हो तो ये चुनौती कहीं बड़ी हो जाती है. बांग्लादेश के ख़िलाफ़ पहले टेस्ट में 188 रनों की जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले कुलदीप यादव की कहानी कुछ ऐसी ही है.
इस टेस्ट से क़रीब 22 महीने पहले उन्होंने अपना आख़िरी टेस्ट मैच खेला था. लगभग दो साल के बाद वापसी करते हुए उन्होंने आठ विकेट चटकाए.
इसके अलावा उन्होंने भारत की पहली पारी में 40 रनों का अहम योगदान भी दिया था. इन रनों की अहमियत तब बढ़ जाती है, जब स्कोरबोर्ड पर यह नज़र आता है कि इस पारी में केएल राहुल, शुभमन गिल और विराट कोहली जैसे बल्लेबाज़ नाकाम रहे. बाएं हाथ के आम स्पिनरों से अलग अंदाज़ में गेंदबाज़ी करने वाले कुलदीप यादव ने भारत की ओर से अब तक कुल 8 टेस्ट मैच खेले हैं. इन 8 टेस्ट मैचों की 14 पारियों में पाँच बार उन्होंने चार या चार से ज़्यादा विकेट चटकाए हैं. टेस्ट मैचों में हर छह ओवरों में उन्होंने विकेट निकाला है.
एक ओर तो उनके ये आंकड़े हैं लेकिन दूसरी ओर सच्चाई ये है कि इन आठ टेस्ट मैचों को खेलने में उन्हें साढ़े पांच साल से भी ज़्यादा का वक़्त लगा है.
आठ टेस्ट मैचों के लिए उन्होंने भारत की ओर से सात टेस्ट सिरीज़ में हिस्सा लिया है. उन्होंने जितने मेडन ओवर फेंके हैं, उससे ज़्यादा विकेट लिए हैं.
आठ टेस्ट में उन्होंने 34 विकेट चटकाए हैं. कुलदीप ने चट्टोग्राम टेस्ट में एक बार फिर यह दिखाया कि उनकी कामयाबी में उनकी गेंदों में विविधता के साथ तेजी शामिल है.
बाएं हाथ के चाइनामैन गेंदबाज़ ने पहली पारी में 40 रन देकर पांच विकेट चटकाए थे. यह उनके करियर में सबसे बेहतर प्रदर्शन तो है ही, बांग्लादेशी पिचों पर किसी भी भारतीय स्पिनर का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है.

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एक्स्ट्रा स्पिनर के तौर पर याद आते हैं कुलदीप
कुलदीप यादव के करियर में अब तक की सबसे मुश्किल यही है कि उन्हें टीम में तब चुना जाता है, जब टीम को एक्स्ट्रा स्पिनर यानी तीसरे स्पिनर की ज़रूरत होती है.
ऐसे में कुलदीप को टीम प्रबंधन से निराशा हो सकती है और वे ये भी मान सकते हैं कि उन्हें उपयुक्त मौक़े नहीं मिल रहे हैं.
लेकिन मौजूदा समय में टेस्ट कप्तान या टीम प्रबंधन के सामने रविचंद्रन अश्विन और रविंद्र जडेजा के रहते हुए उन्हें तरजीह देना संभव नहीं दिख रहा है. लेकिन कुलदीप की ख़ासियत ये है कि वे एक सामान्य स्पिनर नहीं है. उनकी चाइनामैन शैली उन्हें ख़ास बनाती है.
टी-20 क्रिकेट और सफ़ेद गेंद के दौर में इस कला को सीखना किसी भी गेंदबाज़ के लिए मुश्किल है.
कुलदीप यादव की इस ख़ासियत के मायने क्या हैं, इसे समझने के लिए स्पिन गेंदबाज़ी के जादूगर शेन वॉर्न के उस बयान को याद करना होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें कुलदीप की गेंदबाज़ी देखना पसंद है. कुलदीप यादव ने टेस्ट में शानदार डेब्यू किया था. 2017 में धर्मशाला में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टेस्ट की पहली पारी में उन्होंने चार विकेट चटकाए थे.
इसके बाद अगले छह टेस्ट के लिए उन्हें चार साल लगे. इस दौरान सिडनी टेस्ट में पाँच विकेट झटकने का कारनामा भी शामिल था, 2019 की इस सिरीज़ में भारत ऑस्ट्रेलिया में पहली बार टेस्ट सिरीज़ जीतने में कायमाब हुआ था. इसके कुछ साल बाद यही टीम जब बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी पर कब्ज़ा बरक़रार रखने के लिए ऑस्ट्रेलियाई ज़मी पर पहुंची तो 2019 की टीम के सभी खिलाड़ियों को मैच में खेलने का मौक़ा मिला, सिवाए कुलदीप यादव के. वनडे क्रिकेट में भी अब तक उनकी किस्मत कुछ ऐसी ही रही है. यक़ीन करना भले मुश्किल हो लेकिन वनडे क्रिकेट में दो-दो हैट्रिक जमाने के बाद भी वनडे टीम में उनकी जगह पक्की नहीं है.
यह स्थिति तब है जब यजुवेंद्र चहल के साथ उनकी जोड़ी के सामने विपक्षी बल्लेबाज़ टिक नहीं पाते हैं. लेकिन मौजूदा स्थिति में इन दोनों का टीम में एक साथ खेलना लगभग नामुमकिन ही है.

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शानदार वापसी
लेकिन इन तमाम मुश्किलों को कुलदीप ने बेहद पॉजिटिव सोच के साथ लिया है. उन्हें जब भी मौक़ा मिलता है, वे कहीं ज़्यादा मजबूत, कहीं ज़्यादा घातक गेंदबाज़ के तौर पर सामने आते हैं. मानसिक और शारीरिक दोनों लिहाज से. यही उन्होंने 22 महीने के बाद बांग्लादेश के ख़िलाफ़ टेस्ट में मिले मौके पर भी दोहराया है. पहली पारी में 16 ओवरों की गेंदबाज़ी में 40 रन देकर उन्होंने पांच विकेट झटके, जो उनके करियर का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है. बांग्लादेशी पिच पर ऐसा प्रदर्शन ना तो अनिल कुंबले ही कर सके थे और ना ही रविचंद्रन अश्विन.
इसके बाद भारतीय पारी को 400 रन के पार पहुंचाने में बल्ले से 40 रनों का योगदान दिया. दूसरी पारी में उन्होंने तीन विकेट झटके. पूरे मैच में 113 रन देकर आठ विकेट लेने वाले कुलदीप को प्लेयर ऑफ़ द मैच आंका गया. उन्होंने कप्तान केएल राहुल और मुख्य कोच राहुल द्रविड़ के भरोसे को सही साबित किया.

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टेस्ट मैचों में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बाद सीमित ओवर वाले मुक़ाबलों में उनकी गेंदबाज़ी में गिरावट भी देखने को मिली है. कई मौकों पर वे एकदम सामान्य गेंदबाज़ नज़र आए हैं. ऐसा आईपीएल के दौरान भी दिखा है, जब कोलकाता नाइटराइडर्स के लिए भी वे प्रभावी साबित नहीं हुए हैं.
दरअसल, यह किसी दुश्चक्र की भांति उनके साथ चल रहा है. उनकी गेंदों की गति बहुत धीमी होती है और इसी वजह से वे सफेद गेंद वाले मुक़ाबलों में जगह नहीं बना पाते हैं. इसके बाद जब भी वे अपने गेंद की गति तेज़ करने की कोशिश करते हैं, वे उतने कारगर नहीं साबित होते. यही वजह है कि टीम में होने के बाद भी उन्हें बेंच पर बैठना होता है. कुलदीप को इन सबके एहसास है लिहाज वे लगातार अपनी गेंदबाज़ी को सुधारने में भी जुटे हैं.
यह बांग्लादेश के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच में साफ़ नज़र आया है. उनका दायां हाथ कहीं ज़्यादा सीधा रह रहा है, उनका पिछला पैर क्रीज़ के समानांतर दिखता है और बायां हाथ कान के कहीं ज़्यादा क़रीब से गेंद डालता दिखा है.

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बारी का इंतज़ार करना होगा
बांग्लादेश के ख़िलाफ़ आठ विकेटों में दो विकेट बेहद ख़ास रहे, इसमें कुलदीप यादव ने हवा में गेंद को नचाया और बल्लेबाज़ के सामने कोई मौक़ा नहीं था.
84 रनों पर खेल रहे साक़िब अल हसन को उन्होंने पहले तो क्रीज़ से बाहर खेलने पर मज़बूर किया. फिर गेंद उनके लेग स्टंप की ओर टप्पा खाकर उनका ऑफ़ स्टंप ले उड़ी. इससे पहले पहली पारी में मुशफिकुर रहीम उनकी फ़्लाइट को ठीक से नहीं भांप पाए. वे आगे नहीं निकले और विकेट के सामने एलबीडब्ल्यू हो गए. इसके अलावा नुरुल हसन को अपनी तेज़ टर्न से छकाते हुए कुलदीप ने उन्होंने शार्ट लेग पर लपकवाया. 28 साल के कुलदीप यादव की गेंदों पर कहीं ज़्यादा विविधता दिखी और तेज़ी भी. क्रिकेट विश्लेषक लगातार यह कहते आए हैं कि कुलदीप बल्लेबाज़ों को तो छका लते हैं लेकिन पिच पर उनकी गति बहुत धीमी है, अब ऐसा लग रहा है कि उन्होंने गेंद में गति बढ़ाई है. लेकिन इन सबके बाद भी, कुलदीप यादव जैसे असाधारण क्षमता वाले गेंदबाज़ को धैर्य के साथ अपनी बारी का इंतज़ार करना होगा. लेकिन ऐसे वक्त में टीम के कप्तान का साथ उनके भरोसे को बनाए रख सकता है. अतीत में, अजीत वाडेकर और टाइगर पटौदी जैसे कप्तानों ने चार चार स्पिनरों पर भरोसा किया, जो बाद में मैच विजेता साबित हुए. हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि उनकी ये वापसी लंबे समय के लिए होगी, याद रखने लायक होगी. कुलदीप यादव की कोशिश भी यही होगी. कमियों को दूर करने के बाद आगे की राह वैसे भी आसान हो जाती है.
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