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बीसीसीआई के 'शाह' रहे सौरव गांगुली को अब क्यों मिल रही है मात?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ये सब कर्मों का फल है...
ये है उन तमाम ट्वीट्स और मीम्स का हासिल है जो सौरव गांगुली की बीसीसीआई से विदाई की रिपोर्ट्स आने के बाद किए जा रहे हैं.
सोशल मीडिया पर इस पूरे एपिसोड को विराट कोहली की वनडे कप्तानी जाने से जोड़कर देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि गांगुली को उनके ही कर्मों का फल मिला है.
लेकिन क्या आपको लगता है कि ये कहानी इतनी सीधी, सरल और सपाट है.
राजनीति की एंट्री
बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में सौरव गांगुली की शुरुआत से ही राजनीति इस कहानी के केंद्र में रही है.
और अब जब उनकी बीसीसीआई से विदाई की ख़बरें आ रही हैं, तो एक बार फिर राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हो गई है.
कांग्रेस से लेकर टीएमसी ने इस मामले पर बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया है.
टीएमसी सांसद शांतनु सेन ने ट्वीट करके लिखा है, "ये बदले की राजनीति का एक उदाहरण है. अमित शाह के बेटे जय शाह को सेक्रेटरी बनाए रखा जा सकता है, लेकिन सौरव गांगुली को नहीं. क्या इसकी वजह ये है कि वह ममता बनर्जी के प्रदेश से आते हैं. या ये बीजेपी में शामिल न होने की वजह से किया गया?."
टीएमसी के साथ-साथ पश्चिम बंगाल से आने वाले कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी गांगुली की विदाई पर सवाल उठाए हैं.
इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में अधीर रंजन चौधरी ने कहा है- सिर्फ़ जय शाह को प्रोजेक्ट करने के लिए बीजेपी सौरव गांगुली को नीचे गिरा रही है. उनके क़द और व्यक्तित्व की वजह से जय शाह की चमक फीकी पड़ गई थी. इसी वजह से उन्हें इस तरह निकाला जा रहा है. गांगुली सिर्फ़ बंगाल ही नहीं, इस देश का गौरव हैं."
सीपीएम लीडर सुजन चक्रवर्ती ने भी इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि सौरव गांगुली इस पद के स्वाभाविक दावेदार थे.
उन्होंने कहा है, "वह पूर्व भारतीय कप्तान हैं और उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम का नेतृत्व किया है. अब जय शाह सेक्रेटरी बने रहेंगे, लेकिन सौरव को बाहर कर दिया गया है. ये स्वीकार्य नहीं है. बंगाल में टीएमसी और देश में बीजेपी ने हमेशा खेलकूद से जुड़ी संस्थाओं में हस्तक्षेप करने की कोशिश की है."
बीजेपी की ओर से दिलीप घोष ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा है कि टीएमसी के लोग हर चीज़ में सिर्फ़ राजनीति करते हैं.
उन्होंने कहा, "बंगाल एक समय खेल में सबसे आगे था. आज बंगाल खेल में कहाँ है? फुटबॉल या क्रिकेट में?...कहाँ है...जहाँ सौरव जैसा खिलाड़ी हमें मिला है. वो बंगाल क्रिकेट कहाँ है आज. बंगाल के कितने क्रिकेटर नेशनल टीम में हैं. कितने फुटबॉलर नेशनल टीम हैं. बंगाल फुटबॉल का क्या हाल है. दूसरे खेलों का तो छोड़ ही दीजिए. ममता बनर्जी के परिवार वाले हर जगह चौधरी बनकर बैठे हैं."
गांगुली ने क्या कहा?
बीसीसीआई के अध्यक्ष पद से अगले हफ़्ते विदाई होने की रिपोर्ट के बीच सौरव गांगुली का बयान भी आया है.
एक कार्यक्रम में सौरव गांगुली ने कहा है कि कोई इंसान न तो हमेशा खेल सकता है और न ही हमेशा प्रशासन का काम संभाल सकता है.
गांगुली ने कहा, ''मैं बंगाल क्रिकेट संघ का पांच साल तक अध्यक्ष रहा. बीसीसीआई का भी कई साल अध्यक्ष रहा. इन सभी कार्यकाल के बाद आपको इसे छोड़ना और आगे बढ़ना ही होगा.''
उन्होंने कहा, ''एक प्रशासक के रूप में, आपको बहुत सारे काम करने होते हैं और टीम के लिए चीज़ें बेहतर बनानी होती हैं. लंबे समय तक खेलने के बाद मैंने इसे समझा है.''
''प्रशासक के अपने कार्यकाल को मैंने हमेशा ख़ूब इन्ज्वॉय किया है. आप हमेशा न खेल सकते हैं और न ही हमेशा प्रशासक रह सकते हैं.''
हालाँकि सौरव गांगुली ने क्रिकेटर की भूमिका को प्रशासक की तुलना में कठिन बताया है.
सौरव गांगुली और एन श्रीनिवासन
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और वायरल मीम्स से परे हटकर देखें, तो इस कहानी में एक दिलचस्प किरदार नज़र आता है जिसने हाल ही में गांगुली के प्रदर्शन पर सवाल उठाए हैं.
ये शख़्स हैं चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक एन श्रीनिवासन.
इस समय भारतीय क्रिकेट में एन श्रीनिवासन का जो क़द है, वो कभी जगमोहन डालमिया और शरद पवार का हुआ करता था.
बीसीसीआई के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दखल से पहले तक श्रीनिवासन ही बीसीसीआई के अध्यक्ष थे. यही नहीं, आईपीएल से लेकर आईसीसी में उनका दबदबा कायम था.
लेकिन साल 2013 में स्पॉट फिक्सिंग स्कैंडल में अपने दामाद के फँसने के बाद उन्हें अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.
हालाँकि, इससे उनके भारतीय क्रिकेट में दबदबे में कमी नहीं आई.
अमित शाह कैंप
बीसीसीआई के इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई पर अक्सर क़द्दावर राजनेताओं और व्यापारियों का दबदबा रहा है.
एनसीपी प्रमुख शरद पवार और डालमिया समूह के जगमोहन डालमिया इसके दो सबसे बड़े उदाहरण हैं.
वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैग़जीन इस बात की तस्दीक करते हुए बीबीसी से कहते हैं, "बीसीसीआई में हमेशा से राजनीति हावी रही है. शुरू में नौकरशाह और व्यापारी हावी रहे. और पिछले 20-25 सालों से राजनेता हावी रहे हैं. और सत्तारूढ़ दल का दबदबा ज़्यादा रहता है. अब तक सत्ता पक्ष और विपक्ष के बड़े नेता बीसीसीआई को चलाया करते थे. लेकिन बीजेपी ने सत्ता में आने के बाद बीसीसीआई पर पूरी तरह शिकंजा कस लिया है.''
उन्होंने कहा- अभी जिन लोगों ने नामांकन भरा है उनमें से एक उपाध्यक्ष का पद छोड़कर ज़्यादातर पदों पर बीजेपी के लोग हैं. अमित शाह के लड़के जय शाह ने सचिव पद के लिए नामांकन भरा है. वहीं, अनुराग ठाकुर के भाई अरुण धूमल ने आईपीएल चेयरमैन के पद के लिए नामांकन भरा है.
उपाध्यक्ष के पद पर राजीव शुक्ला नामांकन भर रहे हैं.
वहीं, बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए 1983 का वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम के सदस्य रोजर बिन्नी ने नामांकन भरा है.
रोजर बिन्नी का अध्यक्ष बनना
रोजर बिन्नी का अध्यक्ष पद पर नामांकन इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है क्योंकि वो उस क्षेत्र से आते हैं, जहाँ एन श्रीनिवासन का दबदबा है.
और बिन्नी ने बीसीसीआई अध्यक्ष पद से पहले कर्नाटक क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरा था. इसे सौरव गांगुली के लिए ख़तरे की घंटी के रूप में देखा गया था.
यही नहीं, एन श्रीनिवासन ने हाल ही में सौरव गांगुली के अध्यक्ष के रूप में प्रदर्शन पर सवाल उठाए हैं.
प्रदीप मैग़जीन कहते हैं, "प्रदर्शन अच्छा या ख़राब होने का तो कोई मतलब ही नहीं है. इस आधार पर तो सेक्रेटरी भी जाना चाहिए. अध्यक्ष कोई फ़ैसला अकेले थोड़े ही लेता है. बोर्ड के अहम फ़ैसलों में अमित शाह की ख़ास भूमिका रही है. ऐसे में ये तो कहने वाली बात है. मैं ये नहीं कह रहा हूं कि उनका प्रदर्शन अच्छा रहा है. लेकिन ये कहने की बात है. वो (एन श्रीनिवासन) अपना आदमी चाहते थे, पिछली बार आया नहीं, इस बार आ गया है. गांगुली कम से कम हां में हां मिलाने वाले शख़्स नहीं थे. रोजर बिन्नी अच्छे खिलाड़ी रह चुके होंगे. लेकिन उस ग्रुप के यस मैन ही होंगे."
बता दें कि साल 2019 में सौरव गांगुली के अध्यक्ष बनने से पहले तक ये माना जा रहा था कि बृजेश पटेल बीसीसीआई के अध्यक्ष बनेंगे.
लेकिन अमित शाह और सौरव गांगुली की मुलाक़ात के बाद बाजी पलट गई और सौरव गांगुली बीसीसीआई के अध्यक्ष बन गए. और बृजेश पटेल आईपीएल के चेयरमैन बनाए गए.
इसके बाद कयास लगाए जाते रहे कि सौरव गांगुली बीजेपी में शामिल होकर ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ सकते हैं.
लेकिन ये आख़िरकार कयास ही रहे और गांगुली ने बीजेपी और टीएमसी में किसी के साथ जाने का फ़ैसला नहीं किया.
क्या राजनीति के शिकार हुए गांगुली?
इस कहानी का सबसे अहम सवाल ये है कि क्या सौरव गांगुली बीसीसीआई की राजनीति का शिकार हुए हैं.
प्रदीप मैगज़ीन बताते हैं, "इस घटनाक्रम को समझना बहुत आसान है. सौरव गांगुली, अमित शाह कैंप के समर्थन से अध्यक्ष बने थे. अब उनके पास वो समर्थन नहीं है. इसकी वजह भी स्पष्ट है. सौरव गांगुली एक यस मैन नहीं हैं. और पिछले दो सालों से उनके रिश्ते अमित शाह और जय शाह से अच्छे नहीं रहे हैं. कई फ़ैसलों को लेकर मतभेद स्पष्ट नज़र आए. कोहली का एपिसोड एक उदाहरण है."
"रही बात बीसीसीआई की राजनीति का शिकार बनने की तो ये बात सही नहीं है. क्योंकि वह ख़ुद राजनीति की वजह से बोर्ड के अध्यक्ष बने थे और अब उसी राजनीति की वजह से बाहर जा रहे हैं. ये शतरंज जैसा है, उस वक़्त आपने शह दे दी थी और आज आपको मात मिली है."
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