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स्मृति मंधाना की तूफ़ानी बल्लेबाज़ी का राहुल द्रविड़ से कनेक्शन
- Author, विधांशु कुमार
- पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
स्मृति मंधाना की आतिशी पारी की बदौलत भारत ने इंग्लैंड को दूसरे टी20 अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले में 8 विकेट से हरा दिया है. इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 6 विकेट पर 142 रन बनाए थे, जवाब में भारत ने जीत का लक्ष्य 20 गेंदें शेष रहते 2 विकेट पर 146 रन बनाकर हासिल कर लिया.
स्मृति मंधाना ने 53 गेंदों पर 79 रनों की तेज़ तर्रार पारी खेली, जिसमें 13 चौके शामिल हैं.
अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित स्मृति मंधाना आज वर्ल्ड क्रिकेट में एक बड़ा नाम है.
लेकिन मुंबई की गलियों से खेलते हुए भारत की कप्तानी करने तक का सफ़र उनके लिए आसान नहीं रहा. उनके क्रिकेट करियर के कुछ अनूठे पहलुओं पर डालते हैं एक नज़र.
कैसे बनी लेफ़्ट हैंड बल्लेबाज़
स्मृति का जन्म मुंबई में हुआ था जब वो 4 साल की थी तब उनकी रूचि क्रिकेट में जागी और उन्होंने अपने बड़े भाई श्रवन मंधाना के साथ घर में ही क्रिकेट खेलना शुरु किया.
स्मृति की गिनती आज दुनिया के स्टाइलिश लेफ़्ट हैंड बैटर्स में होती है लेकिन स्मृति का दायाँ हाथ ज़्यादा मज़बूत और हावी है. उनके दाएं हाथ के बल्लेबाज़ बनने की कहानी भी दिलचस्प है.
दरअसल स्मृति के पिता थोड़ा बहुत क्रिकेट खेलते थे और दाएं हाथ से बैटिंग करते थे. लेकिन घर पर वो जब अपने बेटे श्रवन के साथ खेलते तो बैटिंग बाएं हाथ से करते.
कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में स्मृति ने बताया कि उनके भाई को लगता था कि बैटिंग बाएं हाथ से ही करते हैं और उन्होंने भी लेफ़्ट हैंड स्टांस लिया और ऐसे ही बैटिंग करने लगे. उन दोनों को देखकर स्मृति ने भी बल्ला बाएं हाथ से ही पकड़ा और लगातार प्रैक्टिस के बाद आज इस मुकाम पर पहुँची हैं.
मां से मदद
स्मृति का जन्म एक मारवाड़ी परिवार में हुआ जहां आमतौर पर पारंपरिक मूल्यों को तरजीह दी जाती है.
स्मृति कहती हैं कि उनके आसपास के लोग और परिवारजन भी चाहते थे कि स्मृति पारंपरिक तरीके से ही रहे लेकिन उनकी मां चाहती थी कि भाई की तरह स्मृति भी कोई खेल खेले. शुरू में उनका मन स्मृति को टेनिस की ट्रेनिंग दिलवाने का था लेकिन स्मृति की क्रिकेट में रुचि को देखकर उन्हें भी क्रिकेट की कोचिंग करवाई गई.
स्मृति अपने भाई के साथ ग्राउंड पर जाती और पूरे समय उनकी बैटिंग के बाद स्मृति के पास 10-15 गेंदें खेलने का मौका मिलता. धीरे-धीरे जब स्मृति का खेल निखरा तो उन्हें पूरी प्रैक्टिस का अवसर भी मिलने लगा. स्मृति ने जल्दी तरक्की की और मात्र 11 साल में वो महाराष्ट्र की अंडर 19 टीम में आ गईं.
लेकिन उनके कुनबे के लोग शिकायत करते थे कि लड़की होकर क्रिकेट खेलती है, पूरा दिन धूप में रहने से रंग काला पड़ गया तो शादी कौन करेगा. ऐसी बेतुकी शिकायतों पर उनकी मां स्मिता हिम्मत बढ़ातीं और कहतीं कि आप अपने खेल पर ध्यान दो, ऐसे लोगों को मैं देख लूंगी. स्मृति ने भी हार नहीं मानी और अपना पहला प्यार क्रिकेट को पूरे लगन से समय दिया.
द्रविड़ का बल्ला बना स्मृति का लकी बैट
17 साल की स्मृति ने फर्स्ट क्लास वनडे गेम में दोहरा शतक लगाया. वेस्ट ज़ोन के अंडर-19 टूर्नामेंट में उन्होंने 32 चौके लगाते हुए 138 गेंदों पर 200 रन बनाए और 224 पर वो नाबाद रही.
ये एक रिकॉर्ड शतक था क्योंकि इससे पहले किसी भारतीय महिला क्रिकेटर ने वनडे मैच में दोहरा शतक नहीं लगाया था.
अपने फॉर्म के साथ स्मृति ने इस शतक का श्रेय राहुल द्रविड़ को दिया. दरअसल कुछ साल पहले स्मृति के भाई की मुलाक़ात राहुल द्रविड़ से हुई.
एक सच्चे फ़ैन की तरह उन्होंने द्रविड़ से उनका कोई एक बैट मांगा. द्रविड़ ने भी निराश नहीं किया और किट में से एक बैट उन्हें दे दिया. भाई श्रवन ने ऑटोग्राफ लेते हुए उस बैट पर बहन स्मृति का नाम लिखवाया. जब स्मृति को ये गिफ़्ट मिला तो वो बहुत खुश हुई. लेकिन स्मृति ने ये भी देखा की बैट कितना शानदार था.
उन्होंने कहा, 'वाह क्या ज़बरदस्त बैलेंस है बैट में, मैं इससे ही खेलूंगी.' स्मृति ने उसी बैट से खेलना शुरु किया और खूब रन बनाए जिसमें वो दोहरा शतक भी शामिल था. हद तो तब हो गई जब स्मृति सभी पारी इसी बैट से खेलने लगी. बाद में उनके पिता ने समझाया कि अब बैट बदल लो, पुराना हो गया है. आज वो बैट स्मृति के शो-केस में सजा हुआ है.
चोट ने बदला नज़रिया
स्मृति की ख्याति देश के साथ विदेशों में भी फैलने लगी और उन्हें विदेशी लोगों से भी खेलने के ऑफ़र आने लगे. 2016-17 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के वीमेंस बिग बैश लीग में ब्रिसबेन हीट की तरफ से खेलने का मौका मिला. हरमनप्रीत के साथ वो पहली भारतीय क्रिकेटर थी जिन्हें लीग ने साइन किया था.
लेकिन इस लीग में स्मृति को उनके फेवरिट पोज़ीशन ओपनिंग में खेलने का मौका नही मिलता था. जनवरी में मेलबर्न के ख़िलाफ़ खेलते हुए स्मृति अजीब तरीके से गिर गई और उनके घुटने में गंभीर चोट आई.
स्मृति लंबे समय तक क्रिकेट से दूर रही और इस दौरान वो सिर्फ एक दुआ करती थी कि जून में होने वाले वर्ल्ड कप तक वो ज़रूर फिट हो जाए.
स्मृति कहती है कि चोट ने उनके जीवन का नज़रिया बदल दिया. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि इससे पहले वो अगर कुछ पारियों में लगातार खराब खेलती थी तो बेहद निराश हो जाती थी और उस पैच को अपने जीवन का सबसे खराब दौर मानती थी. लेकिन चोट के दौरान उन्हें लगा कि अभी तो मैं चल भी नहीं सकती, उस वक्त चल तो सकती थी.
स्मृति कहती हैं कि उन्होंने सोचा कि क्रिकेट खेलना उन्होंने क्यों शुरू किया था क्योंकि वो उसे इन्जॉय करती थी लेकिन प्रोफ़ेशनल क्रिकेट में शायद वो इस आनंद से दूर होती जा रही थी. उन्होंने फ़ैसला किया वो जमकर मेहनत करेंगी और क्रिकेट को फिर से इन्जॉय करेंगी.
खुद पर अटूट भरोसे की मदद से स्मृति वर्ल्ड कप तक फिट हो गई और पहले ही मैच में इंग्लैंड के विरुद्ध शानदार 90 रन बनाए. इसी टूर्नामेंट में उन्होंने वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ शतक भी लगाया.
बदले नज़रिये से स्मृति मंधाना आज वर्ल्ड क्रिकेट में एक बड़ा नाम है. पहले भारतीय महिला क्रिकेट में लोग मिताली राज या झूलन गोस्वामी का ही नाम लेते थे लेकिन आज के दौर में हरमनप्रीत और स्मृति भी किसी से कम नहीं है और फ़ैंस की ज़ुबान पर हैं.
और आख़िरकार लगातार धूप में खेलने वाली स्मृति ने भारतीय क्रिकेट का सिर ऊंचा ही किया है.
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