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भारतीय महिला हॉकी टीम को दिखाना होगा टोक्यो वाला जज़्बा
- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
सविता पूनिया की अगुआई वाली भारतीय महिला हॉकी टीम को यदि बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में चार साल पहले कांस्य पदक गंवाने की कहानी को दोहराने से बचना है तो विश्व कप के दौरान दिखीं खामियों पर पार पाना बेहद ज़रूरी होगा.
इस कमियों को दूर किए बगैर पोडियम पर चढ़ने की राह बनती नहीं दिखती है. इसके लिए टीम को पिछले साल टोक्यो ओलंपिक के दौरान दिखाए जज्बे से खेलना होगा.
नीदरलैंड और स्पेन में पिछले दिनों हुए हॉकी महिला विश्व कप में भारतीय प्रदर्शन को देखें तो इस बार कॉमनवेल्थ खेलों में भारत की राह थोड़ी मुश्किल लगती है.
हाँ, इतना ज़रूर है कि आठवें से 12वें स्थान के निर्धारण मुक़ाबलों में कनाडा और जापान के ख़िलाफ़ भारतीय टीम की विजयी लय लौट आने से थोड़ी उम्मीद ज़रूर बंधती है.
भारत ने निर्धारित समय में एक-एक से बराबरी रहने के बाद टाईब्रेकर में कनाडा को 3-2 से और फिर जापान को 3-1 से हराकर नौवां स्थान प्राप्त किया था.
भारत को भाता है इंग्लैंड में खेलना
कॉमनवेल्थ महिला हॉकी में हम भारतीय प्रदर्शन की बात करें तो यह पुरुषों से बेहतर रहा है क्योंकि हमारी टीम 2002 में चैंपियन बनने का गौरव हासिल कर चुकी है. यह गौरव उसने इंग्लैंड के मैनचेस्टर शहर में खेलों का आयोजन होने पर हासिल किया था.
यही नहीं सूरज लता देवी की कप्तानी वाली भारतीय टीम ने फ़ाइनल में इंग्लैंड को 3-2 से हराया था.
मुझे याद है कि इस फ़ाइनल में निर्धारित समय में 2-2 की बराबरी रहने के बाद अतिरिक्त समय में ममता ने गोल जमाकर भारत को जीत दिलाई तो खिलाड़ियों से ज़्यादा उसके कोच मिहिर रंजन नेगी ख़ुश थे, क्योंकि लग रहा था कि 1982 के नई दिल्ली एशियाड में लगा कलंक अब धुल गया है.
हमें याद है कि 1982 के एशियाई खेलों की पुरुष हॉकी का फ़ाइनल राजधानी के नेशनल स्टेडियम में खेला जा रहा था. मैच घर में होने से सभी को भारत के जीतने का भरोसा था.
इस मैच में मिहिर रंजन नेगी भारतीय टीम के गोलकीपर थे. पाकिस्तान के भारत पर गोलों की बौछार करके 7-1 से मुक़ाबला जीतने पर नेगी पर यह आरोप लगाए जाने लगे कि वह पाकिस्तान टीम से मिल गए.
इसके बाद उनका करियर भी ख़त्म हो गया. वह बाद में महिला हॉकी टीम के कोच के तौर पर लौटे और भारत को गोल्ड मेडल दिला दिया. सभी जानते हैं कि महिला हॉकी टीम की इस सफलता पर ही शाहरुख़ ख़ान की चक दे इंडिया फ़िल्म भी बनी.
इंग्लैंड की बाधा पार करना होगा ज़रूरी
भारतीय महिला हॉकी टीम को इस बार इंग्लैंड, कनाडा, वेल्स और घाना के साथ पूल ए में रखा गया है. वहीं पूल बी में पिछली चैंपियन ऑस्ट्रेलिया के साथ न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, स्कॉटलैंड और केन्या को रखा गया है.
गोल्ड कोस्ट में हुए पिछले खेलों में भारत को कांस्य पदक के मुक़ाबले में इंग्लैंड से हारना पड़ा था और इसी तरह टोक्यो ओलंपिक में भी भारतीय टीम को कांस्य पदक मुक़ाबले में भी इंग्लैंड से ही हार मिली थी.
भारत के पूल की टॉप दो टीमों में रहने को लेकर कोई शक़ नहीं है. लेकिन भारतीय टीम पूल मुक़ाबले में इंग्लैंड को फ़तह करेगी तो नंबर एक पर रहेगी. इस सूरत में सेमीफ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया से खेलने से बच सकती है.
ऑस्ट्रेलिया के अपने पूल से शिखर पर रहने के बारे में शायद ही किसी को संदेह हो. उसके साथ न्यूजीलैंड के सेमीफ़ाइल में स्थान बनाने की बेहतर संभावनाएं हैं. न्यूज़ीलैंड की चुनौती तोड़ना भी ख़ासा मुश्किल है.
यह उसने विश्व कप के पूल मुक़ाबले में भारत को हराकर दिखाया भी है. वैसे भी भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड को हाल फ़िलहाल कभी फ़तह करने में सफल नहीं हो सकी है.
विश्व कप में जापान के ख़िलाफ़ जीत में दो गोल जमाने वाली भारतीय फॉरवर्ड नवनीत कौर ने कहा कि विश्व कप क्वॉर्टर फ़ाइनल में स्थान बनाने के लिए मुक़ाबले में स्पेन से हारकर टीम हताश हो गई. पर हम जानते थे कि इस हताशा से जल्द उभरकर स्थान निर्धारण वाले मैचों में कनाडा और जापान के ख़िलाफ़ मैचों में अच्छा प्रदर्शन करके विश्व कप अभियान की समाप्ति सकारात्मक ढंग से की जाए. इसमें हम दोनों टीमों को फ़तह करके सफल भी रहे.
यह सही है कि भारत ने कनाडा को निर्धारित समय में एक-एक की बराबरी रहने के बाद टाईब्रेकर में 3-2 से विजय प्राप्त की. पर इसमें मैच में भी सलीमा टेटे ने खेल समाप्ति से दो मिनट पहले गोल जमाकर भारत को मुक़ाबले में बनाए रखा.
वरना हम और भी पीछे खिसके नज़र आते. असल में इस मैच में भारत खिलाड़ियों ने कनाडा के सर्किल में पहुँचकर एक के बाद एक मौक़े गंवाए. हमें यह ध्यान रखना होगा कि कनाडा की टीम कॉमनवेल्थ गेम्स में भी भारत के ही पूल में है. इसलिए खामियों पर पार जाना ज़रूरी होगा.
इन खामियों पर पार पाए बगैर नहीं बनेगी बात
भारतीय महिला हॉकी टीम के विश्व कप के फ्लॉप शो के दौरान दो-तीन खामियां दिखीं, जिन्हें सुधारे बिना कॉमनवेल्थ गेम्स में पोडियम पर चढ़ पाना आसान नहीं होगा.
सबसे पहले तो मिले मौक़ों को भुनाने की आदत डालना होगी. इस कमज़ोरी का शिकार टीम लंबे समय से है और यह टीम की ख़राब फिनिश की वजह से है. जिस तरह अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुसना तो जानते थे पर निकलना नहीं.
उसी तरह भारतीय खिलाड़ी हमले बनाकर सर्किल में तो पहुँच जाते हैं पर इन हमलों को गोल में तब्दील करने में महारत नहीं रखते हैं. इसी का परिणाम था कि भारत विश्व कप में ग्रुप से क्वॉर्टर फाइनल में स्थान नहीं बना सका.
असल में हमलों में पैनापन लाने के लिए मिडफील्ड में एक ऐसी योजना बनाने वाली खिलाड़ी की ज़रूरत पड़ती है, जो गेंद का होशियारी से वितरण कर सके. पूर्व कप्तान रानी रामपाल की अनुपस्थिति की वजह से इस क्षेत्र में टीम थोड़ी कमज़ोर दिख रही है.
अगर किसी खिलाड़ी को सर्किल में अच्छी स्थिति में गेंद मिलेगी तो उसे गोल भेदने के लिए बेहतर मौक़ा मिलता है. मौजूदा समय में गोलकीपरों की मुस्तैदी की वजह से सीधे शॉटों से गोल को भेदना थोड़ा मुश्किल होता जा रहा है.
इसके लिए सर्किल में बेहतर तालमेल से ही गोलकीपर को गच्चा दिया जा सकता है. पर इस मामले में वंदना कटारिया, नवनीत कौर, नेहा और सलीमा टेटे कमजोर साबित हुई. कॉमनवेल्थ गेम्स में बेहतर परिणाम के लिए इस खामी को सुधारना होगा.
भारत को बेहतर परिणाम पाने के लिए पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदलने की कला को भी सुधारने की ज़रूरत है. टोक्यो ओलंपिक और एफआईएच प्रो लीग के मैचों में यह पक्ष भारतीय टीम की ताकत माना जा रहा था.
लेकिन विश्व कप के दौरान यह ताक़त कमजोरी में बदलती दिखी. इसकी वजह यह लगती है कि आजकल गोलकीपर ज़्यादा मुस्तैद नज़र आते हैं और तमाम तरह के सुरक्षा गियर आने से बचाव करने वालों में डर नहीं होने से आपकी तेज़ ड्रेग फ्लिक को भी रोक लिया जाता है.
इसलिए बचाव वालों को गच्चा देने के लिए पेनल्टी कॉर्नरों पर विभिन्न वेरिएशन अपनाने की ज़रूरत है.
भारतीय कोच जानके शोपमैन ने विश्व कप के बाद कहा कि दोनों टूर्नामेंटों में मात्र 10 दिन का अंतर होने से रिकवरी टीम बहुत कम है. हमारा पहला प्रयास कॉमनवेल्थ गेम्स में फिट टीम उतारना है और कम समय में सामने आई खामियों को दूर करने का प्रयास करना है.
हम यदि भारतीय टीम के एफआईएच प्रो लीग में किए प्रदर्शन को देखें तो टीम कहीं बेहतर परिणाम निकालने वाली नजर आती है. इससे लगता है कि जज्बे की कमी की वजह से भी टीम विश्व कप में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकी थी.
यह सही है कि टोक्यो ओलंपिक में भारतीय टीम के बेहतर प्रदर्शन की वजह कोच शोर्ड मारिन का टीम को बेस्ट देने के लिए प्रेरित करना था. कप्तान सविता पूनिया और उपकप्तान दीप ग्रेस एक्का को कोच के साथ मिलकर खिलाड़ियों को अपना बेस्ट देने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है और हम यदि ऐसा कर सके तो पोडियम पर जरूर नजर आएंगे.
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