भारत की बिसात पर रूस और यूक्रेन के बीच ये बाज़ी कौन जीतेगा

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- Author, सुजेन नाइनन
- पदनाम, खेल पत्रकार
रूस-यूक्रेन की जंग लंबी खिंचती जा रही है. यूक्रेन पिछले चार महीने से रूस के खिलाफ डटा हुआ है. लेकिन इस मोर्चे से अलग एक और जंग के मैदान में दोनों ओर के महारथी टकराने जा रहे हैं.
अगस्त में भारत के तमिलनाडु राज्य के महाबलीपुरम में शंतरज के शीर्ष अंतरराष्ट्रीय संगठन फिडे (FIDE) के प्रमुख चुने जाएंगे.
फिडे के सर्वोच्च पद की दौड़ में इसके मौजूदा अध्यक्ष और पूर्व रूसी उप प्रधाननंत्री अरकादी दवोरकोविच और यूक्रेनी ग्रैंड मास्टर एंद्रेई बारिशोपोलेत के बीच मुकाबला हो सकता है.
महाबलीपुरम में 27 जुलाई से 10 अगस्त तक शतरंज का 44वां ओलंपियाड होगा.
इसी दौरान इस मुकाबले से इतर फिडे के शीर्ष पद के लिए मुकाबला होगा.
शतरंज संघ के अध्यक्ष बनने का मुकाबला
रूस के पूर्व उप प्रधानमंत्री दवोरकोविच दूसरी बार इस पद को हासिल करना चाहते हैं. उनका मुकाबला यूक्रेनी ग्रैंड मास्टर बेरिशपोलेत्स के अलावा फ्रांस के बशार कोतले और बेल्जियम के इनालबेक शेरिपोव से है.
चार महीने पहले रूस ने यूक्रेन पर हमला कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था. इसके बाद से रूस को कई ग्लोबल फोरम से दरकिनार किया जा रहा है लेकिन दवोरोकोविच कैंप दो वजहों से अपनी जीत की उम्मीद लगाए हुए है.
महामारी के दौरान शतरंज खूब लोकप्रिय हुआ. इस मुश्किल दौर में फिडे की कोशिश से टूर्नामेंट का कैलेंडर काफी अच्छे तरीके से चलता रहा है.
दवोरोकोविच कैंप का मानना है कि यह उनकी मेहनत का नतीजा है. जबकि उनके प्रतिद्वंद्वियों का मानना है कि रूस काफी लंबे समय तक शतरंज प्रशासन को नियंत्रित करता रहा है.
इस मोर्चे पर रूस और यूक्रेन की जंग का एक और दिलचस्प पहलू है. दवोरोकोविच अगर अध्यक्ष पद का चुनाव जीतते हैं तो वह भारत के विश्वनाथन आनंद को उपाध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाएंगे.
पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद वर्ल्ड चेस में काफी सम्मानित नाम हैं. वहीं यूक्रेनी ग्रैंड मास्टर एंद्रेई बेरिशोपोलेत्स जीतते हैं तो वो उपाध्यक्ष पद के लिए पिटर हिन नीलसन को खड़ा करेंगे. वह विश्वनाथन आनंद के कोच रह चुके हैं.

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विश्वनाथन आनंद के मुकाबले कौन?
नीलसन इस वक्त दुनिया के नंबर एक शतरंज खिलाड़ी मैगनस कार्लसन के कोच हैं. आनंद 2007 से 2012 के बीच पांच वर्ल्ड टाइटिल जीत चुके हैं. इसमें से चार के दौरान नीलसन उनके कोर ट्रेनर ग्रुप में शामिल रहे हैं.
नीलसन फिडे के सबसे कटु आलोचकों में शामिल रहे हैं. वह इसकी फंडिंग में पारदर्शिता और इसमें रूसी शतरंज फे़डरेशन के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के अधिकारियों के शामिल रहने को लेकर सवाल उठा चुके हैं.
नीलसन ने बीबीसी से कहा, "हमारी लड़ाई दवोरोकोविच से नहीं है. हमारी लड़ाई फिडे पर रूस के कब्जे के ख़िलाफ़ है. पिछले चार साल में शतरंज के 20 बड़े आयोजनों में से 11 की मेजबानी रूस ने की है."
वह कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय शतरंज से जुड़े समुदाय में लोगों की यह बड़ी इच्छा है कि वह रूस से दूरी बनाना शुरू करे. यह समुदाय रूस के प्रभाव से मुक्त एक स्वतंत्र अस्तित्व बनाना चाहता है. ये चुनाव आमूलचूल बदलाव ला सकता है. इस चुनाव को लेकर काफी उम्मीदें हैं."
दवोरोकोविच के फिडे का अध्यक्ष बनने से पहले रूसी कारोबारी और राजनीतिक नेता करसन इलमझिनोव दो दशक तक इसके अध्यक्ष बने रहे थे. उन्हें रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन का समर्थन हासिल था.
लेकिन उनका कार्यकाल का शतरंज के इस अंतरराष्ट्रीय संगठन की छवि पर काफी असर पड़ा. हालांकि आनंद मानते हैं कि दवोरोकोविच के कार्यकाल में फिडे में काफी अच्छे बदलाव दिखे हैं.

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आनंद क्यों कूदे मैदान में?
अपने तीस साल से अधिक के करियर में आनंद शतरंज की राजनीति से दूर रहे थे. यहां तक कि 1990 के दशक में जब गैरी कास्परोव और नाइजल शॉर्ट ने फिडे से बगावत कर प्रतिद्वंद्वी संगठन बनाया था तब भी वह तटस्थ ही थे.
आनंद का मानना है कि वह राजनीति के लिए फिट नहीं हैं. इसके अलावा उन्हें इस बात का भी डर था इससे उनका खेल न बिगड़ जाए.
उन्हें इस बात की चिंता थी कि राजनीति में पड़ने पर वो अपनी रैंकिंग ऊंची कर अपनी काबिलियत साबित नहीं कर पाएंगे.
उस दौरान ये एक तरह की विसंगति थी. आनंद ऐसे बड़े गैर रूसी खिलाड़ी थी, जिसके पास कोई बड़ा संस्थागत समर्थन नहीं था.
आनंद अब 52 साल के हो रहे हैं. लेकिन अभी भी शतरंज में सक्रिय हैं. इतने साल के बाद अब जाकर शतरंज के संगठन में वो किसी एक पक्ष में खड़े दिख रहे हैं.
यहां तक कि दवोरोकोविच के आलोचक भी इस बात पर सहमत होंगे कि अपने सहयोगी के तौर पर आनंद का चुनाव करना एक बेहतर सूझबूझ वाला फैसला है.
आनंद शतरंज के महान खिलाड़ियों में से एक है. उन्हें काफी पसंद किया जाता है. उनका राजनीति से संबंध नहीं रहा है और सार्वजनिक जीवन में उनकी छवि बेदाग है.
नीलसन कहते हैं, "विशी (आनंद) अगर शतरंज की राजनीति से जुड़ते हैं तो ये इस समुदाय के लिए बड़ी खुशी का बात होगी. इस खेल को उनकी ओर से बढ़ावा मिलना काफी शानदार साबित होगा लेकिन दुख की बात ये है कि उन्होंने रूस के साथ जाने का फैसला किया है."
हालांकि आनंद का मानना है कि वह ऐसे पाले में हैं जिसने अपनी साख बनाई है.

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दवोरोकोविच की काबिलियत
दवोरोकोविच की प्रतिष्ठा एक मॉडर्न टेक्नोक्रेट और एक योग्य प्रशासक की है. उनकी ट्रेनिंग एक अर्थशास्त्री के तौर पर हुई है. साल 2018 में जब रूस में फीफा वर्ल्ड कप हुआ था तो वह आयोजन समिति के अध्यक्ष थे.
लेकिन दवोरोकोविच की योग्यताओं के बावजूद शतरंज पर रूस का नियंत्रण का मुद्दा विवाद का विषय बना हुआ है. खास कर रूस और यूक्रेन के युद्ध की पृष्ठभूमि में.
चेस24 को हाल में दिए गए एक इंटरव्यू में दवोरोकोविच ने कहा कि युद्ध की वजह से उन पर 'रूस के हितों का बचाव' करने का दबाव है.
उन्हें कुछ कड़े फैसले लेने पड़े है. इनमें रूसी कंपनियों के साथ स्पॉन्सरशिप के करार खत्म करने जैसा फैसला भी शामिल है. वह जटिल स्थिति में फंसे हुए हैं.
आनंद कहते हैं, "आप देख सकते हैं कि दवोरोकोविच ने खास कर इस साल ऐसे कई फैसले लिए हैं, जिनसे लगता है कि वह रूस के प्रभाव से अलग होकर काम कर रहे हैं. उन्होंने रूस के बजाय फिडे के अध्यक्ष के तौर पर काम किया है. ''
वर्ल्ड चेस में पांचवें नंबर के खिलाड़ी लेवन एरोनियन मानते हैं दवोरोकोविच का कार्यकाल प्रभावी रहा है.
वह कहते हैं, "पहले फिडे को चलाने वाले लोग उदासीन थे. वो खिलाड़ियों की ज्यादा परवाह नहीं करते थे. लेकिन मौजूदा प्रशासन अच्छा काम कर रहा है. ज्यादातर खिलाड़ी इस बात पर सहमत होंगे. कोविड के बावजूद पिछले दो साल में कई बड़े टूर्नामेंट हुए हैं."
हालांकि वो मानते हैं कि वित्तीय मामलों में मैनेजमेंट को ज्यादा पारदर्शी होना होगा.

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कैसे मिली भारत को शतरंज ओलंपियाड की मेजबानी?
पहले रूस को शतरंज ओलंपियाड और फिडे सम्मेलन की मेजबानी करनी थी लेकिन यूक्रेन पर हमले की वजह से रूस से यह अधिकार छीन लिया गया.
अब मेजबानी भारत को मिली है. भारत इस ओलंपियाड को सफल बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दवोरोकोविच की मौजूदगी में शतरंज ओलंपिक की मशाल रैली का उद्घाटन किया. यह मशाल देश के 75 शहरों में घूमेगी और फिर महाबलीपुरम पहुंचेगी.
शतरंज ओलिंपियाड तीन दशक बाद एशिया लौटा है. भारत पहली बार शतरंज ओलंपियाड की मेजबानी कर रहा है. ऐसे में इस क्षेत्र के दिग्गज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद को अपने पाले में कर दवोरोकोविच ने काफी सूझबूझ भरा कदम उठाया है.
(सुजेन नाइनन बेंगलुरू में रहने वाली स्वतंत्र खेल पत्रकार हैं.)
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