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रक्षाबंधन: टोक्यो ओलंपिक में एक ही दिन गोल्ड मेडल जीतने वाले भाई-बहन
- Author, हर्षल अकुड़े
- पदनाम, बीबीसी मराठी
टोक्यो ओलंपिक हाल ही में समाप्त हुआ है. हज़ारों एथलीट इसमें मेडल जीतने के सपने के साथ शामिल हुए थे और सैकड़ों एथलीट अपने सपने को पूरा करने में कामयाब भी हुए.
कुछ ने तो अपने ही रिकॉर्ड को बेहतर किया तो कुछ अपना ही करिश्मा दोहरा नहीं पाए.
जो एथलीट मेडल नहीं हासिल कर पाए, उन्होंने भी दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन में हिस्सा लेने का अनुभव हासिल किया. टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा लेने वालों के साथ साथ इसे देखने वाले भी इस रोमांच को लंबे समय तक याद रखेंगे.
लेकिन हम आपको एक भाई-बहन की कहानी बता रहे हैं, जिसके लिए यह ओलंपिक ऐतिहासिक के साथ साथ यादगार साबित हुआ. दरअसल इन दोनों ऐसा कारनामा कर दिखाया जो ओलंपिक इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ था.
एक ही दिन अलग अलग खेलों की व्यक्तिगत स्पर्धाओं में इन दोनों ने गोल्ड मेडल जीते, इससे पहले किसी ओलंपिक में ऐसा करिश्मा कोई नहीं दिखा पाया.
रक्षाबंधन के मौके पर पढ़िए हिफुमी आबे और उता आबे की कहानी, कैसे उन्होंने स्वर्णिम इतिहास बनाया.
एक ही दिन जूडो में जीता गोल्ड मेडल
टोक्यो ओलंपिक में 25 जुलाई, 2021 के दिन जूडो के मुक़ाबले खेले गए थे. 21 साल की उता और उनके भाई, 24 साल के हिफुमी जापानी जूडो टीम के सदस्य थे. दोनों ने अपने अपने इवेंट के फ़ाइनल राउंड में जगह बनायी. दोनों का फ़ाइनल भी उसी दिन हुआ.
पहले 21 साल की उता आबे ने महिलाओं के 51 किलोग्राम इवेंट के राउंड 16 में ब्राज़ील की लारिसा पेमिंटा, क्वार्टर फ़ाइनल में ब्रिटेन की चेल्सी जाइल्स और सेमीफ़ाइनल में इटली की ओडेटा ग्यूफ्रीडा को हराकर फ़ाइनल में प्रवेश किया.
ख़िताबी मुक़ाबले उता की टक्कर फ्रांस की एमानडिने बुशार्ड से हुई, उता ने बुशार्ड को हराकर गोल्ड मेडल जीता.
हिफुमी आबे ने भी पुरुषों के 66 किलोग्राम इवेंट में शानदार प्रदर्शन किया. हिफुमी ने राउंड 16 के मैच में फ्रांस के किलियन ले ब्लोक को, क्वार्टर फ़ाइनल में मंगोलिया की योंदोनपेरेनलई बासखू को और सेमीफ़ाइनल में ब्राज़ील के डेनिएल कार्गनिन को हराकर फ़ाइनल में प्रवेश किया. फ़ाइनल मुक़ाबले में हिफुमी ने जॉर्जिया के वाज़ा मार्गवेलाशविली को हराकर गोल्ड मेडल जीता.
दिलचस्प ये रहा कि दोनों भाई बहन ने चंद मिनटों के अंतर पर गोल्ड मेडल जीते, पहले बहन उता ने कामयाबी हासिल की और उसके कुछ ही मिनटों के बाद बड़े भाई हिफुमी ने गोल्ड मेडल जीतकर ना केवल इतिहास बनाया बल्कि अपने परिवार सहित पूरे जापान को गर्व के भाव से भर दिया.
गोल्ड मेडल जीतने के बाद हिफुमी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा, "यह हम लोगों के लिए बेहद ख़ास दिन है. मेरे ख़्याल से भाई और बहन दोनों, टोक्यो ओलंपिक जैसे स्टेज पर इससे ज़्यादा बेहतर कुछ नहीं कर सकते थे. हम बहुत खुश हैं."
हिफुमी पर था ज़्यादा दबाव
52 किलोग्राम वर्ग में उता गोल्ड मेडल की सबसे ज़ोरदार दावेदार थीं, उन्होंने उम्मीद के मुताबिक ही गोल्ड मेडल भी जीता. लेकिन इसी वजह से उनके भाई हिफुमी पर काफ़ी ज़्यादा दबाव भी था. हिफुमी ने प्रेस कांफ्रेंस में इस पहलू पर कहा, "अब मैं आधिकारिक तौर पर कह सकता हूं कि बहन के साथ साथ मैं भी गोल्ड मेडल जीतने के इरादे से यहां हिस्सा ले रहा था. उता के बड़े भाई होने के नाते मेरे सामने हारने का विकल्प ही नहीं था."
ज़ाहिर है ये बात हिफुमी के दिमाग़ मे थी, इसी वजह से उन्होंने अपना सबकुछ झोंककर गोल्ड मेडल हासिल किया. हिफुमी के लिए ये कामयाबी इतनी आसान नहीं थी. वे जापान की ओर से ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने वाले 14वें और अंतिम खिलाड़ी थे.
ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफ़ाईंग राउंड के मुक़ाबले पिछले साल दिसंबर में खेले गए और वहां उन्होंने ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए पात्रता हासिल की.
बहन ने भाई को प्रेरित किया
हिफुमी और उता, दोनों के लिए बचपन से ही जूडो किसी पैशन की तरह था. दोनों जूडो प्रतियोगिताओं में एक दूसरे को चुनौती देते नज़र आते. वहां से शुरू हुआ सफ़र, इस मुकाम तक पहुंच गया जहां दोनों के पास ओलंपिक खेलों का गोल्ड मेडल है.
उता की जीत के बाद कुछ पत्रकार उनका इंटरव्यू करने उनके पास पहुंचे. उता ने बातचीत से इनकार करते हुए कहा कि उनके भाई का मुक़ाबला शुरू होने वाला है, उसके बाद ही वह मीडिया से बातचीत कर पाएंगी.
उता मैट के नज़दीक खड़ी होकर अपने भाई का उत्साह तब तक बढ़ाती रहीं, जब तक भाई ने गोल्ड मेडल न जीत लिया. इसके बाद दोनों के चेहरे राहत के भाव थे और दोनों ने कामयाबी का जश्न एकसाथ मनाया.
वर्ल्ड चैंपियनशिप में दिखा चुके थे कमाल
आबे भाई बहन की इस जोड़ी ने ओलंपिक से पहले वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी एक साथ गोल्ड मेडल जीतने का करिश्मा दिखाया हुआ है.
2018 में दोनों वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता था. उस वक्त दोनों की कामयाबी पर जूडो की दुनिया ने काफ़ी तारीफ़ की थी, दोनों ने इसके तीन साल के अंदर ओलंपिक में उसी कामयाबी को दोहराया.
ओलंपिक जैसे खेल में कोई भी मेडल हासिल करना आसान नहीं होता है. ऐसे में गोल्ड मेडल हासिल करने के पीछे की मेहनत और लगन को बख़ूबी समझा जा सकता है.
लेकिन सबसे ख़ास बात यह है कि आबे भाई बहनों ने दुनिया भर के उन युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया है जो अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में इतिहास बनाना चाहते हैं.
हम सब जानते हैं कि भाई बहन के बीच रिश्ता बेहद ख़ास होता है, आपस में झगड़ा भी होता है लोग एक दूसरे का मज़ाक़ भी उड़ाते हैं लेकिन एक दूसरे के प्रति बेहद प्यार होता है.
हिफुमी और उता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. इन दोनों ने साबित किया कि ना केवल पढ़ाई लिखाई में बल्कि खेल में भी भाई बहन मिलकर इतिहास बना सकते हैं.
इनकी कामयाबी ने यह भी जताया है कि लड़के और लड़की में कोई अंतर नहीं होता है, लिहाजा माता पिता को दोनों के साथ एकसमान बर्ताव करना चाहिए, उन्हें एक जैसे मौके देने चाहिए और एकसमान सुविधाएं भी.
रक्षा बंधन के मौके पर हम यही उम्मीद करते हैं कि खेल की दुनिया में हिफुमी और उता जैसे मेडल जीतने वाले भाई बहन की जोड़ी की संख्या आने वाले दिनों में बढ़े.
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