टोक्यो ओलंपिक: नीरज चोपड़ा को गोल्ड मिला पर पाकिस्तान के अरशद नदीम भी बने प्रेरणा

    • Author, अब्दुल राशिद शकुर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू

पाकिस्तान को ओलंपियन अरशद नदीम से बहुत उम्मीदें थीं. पाकिस्तान ने बीते 29 सालों से ओलंपिक में कोई पदक नहीं जीता है.

लेकिन भाला फेंक के फाइनल मुक़ाबले में अरशद नदीम पाँचवे स्थान पर रहे और पाकिस्तान की ये उम्मीद भी टूट गई.

इस स्पर्धा में भारत के नीरज चोपड़ा ने गोल्ड मेडल जीता है. ये ओलंपिक के इतिहास में ट्रैक एंड फ़ील्ड इवेंट में किसी भारतीय का पहला गोल्ड मेडल है. एक तरफ़ जहां भारत में जश्न है, वहीं पाकिस्तान उदासी में डूबा है.

नीरज चोपड़ा इस गोल्ड मेडल के साथ ही भारत की तरफ़ से व्यक्तिगत मुक़ाबले में गोल्ड जीतने वाले दूसरे भारतीय भी बन गए हैं. उनसे पहले अभिनव बिंद्रा ने निशानेबाज़ी में गोल्ड मेडल जीता था.

नीरज चोपड़ा ने 87.5 मीटर दूर भाला फेंक कर गोल्ड अपने नाम किया. इस स्पर्धा में दूसरे और तीसरे नंबर पर चेक गणराज्य के खिलाड़ी रहे.

भाला फेंक के फ़ाइनल में पाकिस्तान के अरशद नदीम समेत कुल 12 एथलीट थे, जिनमें दुनिया के नंबर एक जर्मनी के जोहान्स वेटर और एशिया चैंपियन भारत के नीरज चोपड़ा भी थे.

अरशद नदीम फ़ाइनल में पहुँचने से पहले दुनिया भर में चौथे नंबर पर थे. अरशद नदीम का प्रदर्शन अच्छा रहा. उन्होंने पहला थ्रो 82.4 मीटर दूर फेंका, दूसरा थ्रो फाउल रहा जबकि तीसरे थ्रो में उन्होंने 84.62 मीटर की दूरी छू ली. वो 12 एथलीटों में पाँचवे नंबर पर रहे.

24 साल के अरशद नदीम पर पाकिस्तान की पदक जीतने की उम्मीदें टिकीं थीं. बीते 29 साल से पाकिस्तान ओलंपिक में कोई पदक नहीं जीत सका है.

पाकिस्तान ने साल 1992 बार्सीलोना ओलंपिक में आख़िरी पदक जीता था, जब पाकिस्तान की हॉकी टीम कांस्य जीतने में कामयाब रही थी.

अरशद नदीम ने इस साल ईरान के मशहद में 86.38 मीटर दूर भाला फेंका था. ये उनका इस साल का सबसे अच्छा प्रदर्शन था.

वहीं टोक्यो ओलंपिक के क्वॉलीफाइंग इवेंट में उन्होंने बुधवार को 85.16 मीटर भाला फेंक कर तीसरा स्थान हासिल किया था.

अरशद वाइल्ड कार्ड एंट्री के बजाय अपने प्रदर्शन के आधार पर टोक्यो ओलंपिक पहुँचे थे. वो सीधे ओलंपिक के लिए क्वॉलीफ़ाई करने वाले पहले पाकिस्तानी एथलीट थे. जब उन्होंने फ़ाइनल राउंड में जगह बनाई तो वो ऐसा करने वाले पाकिस्तान के पहले ट्रैक एंड फ़ील्ड एथलीट बन गए थे.

पाकिस्तान के इतिहास में कोई भी एथलीट शुरुआती प्रतियोगिता से आगे नहीं बढ़ पाया है.

वहीं अरशद नदीम ने काठमांडू में 2019 में एशियाई खेलों में 86.29 मीटर दूर भाला फेंककर ना सिर्फ़ नया रिकार्ड बनाया था बल्कि सीधे ओलंपिक के लिए क्वॉलीफ़ाई भी किया.

ओलंपिक में भाला फेंकने के लिए सीधे क्वॉलीफ़ाई करने की दूरी 85 मीटर है. जो एथलीट इस दूरी को पार कर लेते हैं वो सीधे ओलंपिक के लिए क्वॉलीफ़ाई कर लेते हैं.

अरशद नदीम भले ही पदक न जीत पाए हों लेकिन वो पाकिस्तान में खेलों के नए हीरो बन गए हैं. पूरे देश में उनकी तारीफ़ हुई है और इसे एथलेटिक्स के क्षेत्र में एक अहम पड़ाव के तौर पर देखा जा रहा है.

अरशद नदीम के प्रदर्शन से प्रभावित होकर अधिक युवाओं के एथलेटिक्स में आने की उम्मीदें ज़ाहिर की गई हैं.

बीबीसी उर्दू से बात करते हुए पाकिस्तान की महिला एथलीट साहिब इसरा ने कहा कि अरशद नदीम पाकिस्तान के एथलीटों के लिए मिसाल बन गए हैं.

उन्होंने कहा, 'अरशद नदीम की सबसे बड़ी ताक़त उनकी विनम्रता है. अपनी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद वो बिलकुल विनम्र रहते हैं.'

इसरा ने कहा कि ओलंपिक के लिए तैयारी के दौरान वो पाकिस्तान के सभी एथलीटों का हौसला बढ़ाते थे.

इसरा कहती हैं कि उनका व्यवहार बिलकुल दोस्ताना था और उन्होंने कभी ये अहसास नहीं होने दिया कि वो एक अंतरराष्ट्रीय एथलीट हैं.

साहिब इसरा ने दक्षिण एशियाई खेलों में कांस्य पदक हासिल किया था. वो कहती हैं कि वो भी उनकी तरह वाइल्ड कार्ड एंट्री लेने के बजाए क्वालीफ़ाई करना चाहती हैं.

वहीं पाकिस्तान के सबसे सम्मानित एथलीटों में शामिल मुहम्मद यूनुस ने बीबीसी से कहा कि सबसे ख़ुशी की बात ये है कि अरशद नदीम ने सीधे ओलंपिक के लिए क्वॉलिफ़ाई किया.

1974 एशियाई खेलों में तेहरान में 1500 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने वाले मुहम्मद यूनुस कहते हैं कि अरशद नदीम को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है.

72 वर्षीय यूनुस कहते हैं कि ओलंपिक के बाद अब अरशद नदीम को अपने प्रशिक्षण पर और ध्यान देना होगा ताकि वो और आगे बढ़ सकें.

यूनुस कहते हैं कि अब सुविधाएं भी पहले से बेहतर हो रही हैं, सुविधाओं को और बेहतर करने की ज़रूरत है ताकि लड़के और लड़कियां और बेहतर प्रदर्शन कर सकें.

अरशद नदीम के जर्जर जूते

पाकिस्तानी एथलेटिक्स पर नज़दीकी नज़र रखने वाले मुल्तान के पत्रकार नदीम कैसर कहते हैं कि अरशद नदीम की कहानी एथलीटों के लिए एक उदाहरण हैं.

वो कहते हैं कि 2012 में मैंने पहली बार अरशद नदीम को इंटर-बोर्ड एथलेटिक्स में देखा था. वो घिसे-पिटे जूते पहने हुए थे. ऐसे जूते पहनकर भाला फेंकना संभव नहीं था.

कैसर कहते हैं कि ये प्रतियोगिता घास के मैदान पर थी और नदीम ने नंगे पैर हिस्सा लिया था.

प्रतियोगिता के बाद अरशद नदीम अपने पैर से कांटे और कचरा साफ़ कर रहे थे. जब कैसर ने उनकी तारीफ़ की तो उन्होंने कहा, 'सर, मेरे पास पहनने के लिए अच्छे जूते भी नहीं है.'

नदीम कैसर कहते हैं कि अरशद नदीम ने बहुत मुश्किल वक़्त देखा और इस दौरान उनके कोच राशिद अहमद साकी ने उनका बहुत साथ दिया.

वो कहते हैं कि आज अरशद नदीम जो कुछ भी हैं वो अपने कोच साकी साहब की वजह से हैं.

अरशद नदीम की ट्रेनिंग पर दो करोड़ ख़र्च

वहीं पाकिस्तान एथलेटिक्स महासंघ के अध्यक्ष मेजर जनरल (रिटायर्ड) अकरम शाही का कहना है कि अरशद नदीम के प्रशिक्षण पर पाकिस्तान ने दो करोड़ रुपए ख़र्च किए हैं.

अकरम शाही ने बीबीसी से कहा, 'बहुत से लोग ऐसा सोचते हैं कि अरशद नदीम का ओलंपिक पहुँचना उनकी व्यक्तिगत कोशिशों का नतीजा है और महासंघ का इसमें कोई योगदान नहीं है. बेशक अरशद नदीम की अपनी मेहनत है लेकिन लोगों को ये भी पता होना चाहिए कि महासंघ ने भी ओलंपिक में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अथक प्रयास किए हैं.'

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