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फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप: पाकिस्तानी किशोर जो नेमार के पास पहुंचा
रूस में चल रहे फ़ुटबॉल विश्व कप में शुक्रवार को ब्राज़ील और कोस्टा रिका के बीच हुए मुक़ाबले में टॉस का सिक्का उछाले जाने के वक़्त पाकिस्तान के सियालकोट शहर से संबंध रखने वाले अहमद रज़ा भी मौजूद थे.
अहमद रज़ा के पिता शब्बीर अहमद ख़ुद सियालकोट में फ़ुटबॉल बनाते हैं और उनका परिवार तीन पुश्तों से फ़ुटबॉल सिलने का काम कर रहा है.
बीबीसी से बात करते हुए अहमद रज़ा ने बताया कि वो सियालकोट के क़ायद-ए-आज़म स्कूल में पढ़ते हैं और उन्हें फ़ुटबॉल का बहुत शौक़ है.
रज़ा ने बताया, "एक दिन कोका कोला वाले स्कूल में आए और उन्होंने मुझे फ़ुटबॉल खेलते हुए देखा. 1500 बच्चों में से मुझे चुना और लाहौर लेकर गए."
लाहौर में पाकिस्तान में फ़ुटबॉल से जुड़े अधिकारियों ने रज़ा से मुलाक़ात की और उन्हें बताया कि उन्हें रूस ले जाया जाएगा.
रज़ा कहते हैं, "मुझे आहिस्ता-आहिस्ता बताया गया कि रूस कब जाना है, वहां क्या करना है और कहां ठहरना है. फिर उन्होंने मुझे बताया कि मैं वर्ल्ड कप के मैच में टॉस के दौरान मौजूद रहूंगा. तब मुझे यक़ीन हुआ कि मैं रूस जा रहा हूं."
15 साल के अहमद रज़ा उस अहसास को भूल नहीं पा रहे हैं जो उन्हें ब्राज़ील और कोस्टा रिका के बीच सैंट पीटर्सबर्ग के मैदान में खेले गए मैच के दौरान हुआ.
रज़ा कहते हैं, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं फ़ुटबॉल के ग्राउंड में इस तरह क़दम रखूंगा.
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"मैंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि मैं फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप का मैच देखने जाउंगा और वो भी उस टीम का जो मेरी पसंदीदा टीम है, जिसमें मेरा पसंदीदा खिलाड़ी नेमार खेलता है. मेरी ख़ुशी की इंतेहा उस वक़्त न रही जब नेमार मेरे पास ही आकर खड़े हो गए."
रज़ा कहते हैं, "अभी तो मैंने टॉस के वक़्त पाकिस्तान की नुमाइंदगी की है, अगर मौक़ा मिला तो पाकिस्तान की फ़ुटबॉल टीम में भी नुमाइंदगी करूंगा."
अपने परिवार के बारे में बताते हुए रज़ा कहते हैं कि उनके दादा और दादी भी फ़ुटबॉल की सिलाई करते थे.
रज़ा के पिता पढ़ नहीं सके. वो भी फ़ुटबॉल सिलने का अपना पारिवारिक काम ही करते हैं.
रज़ा कहते हैं कि वो जब से रूस आए हैं उनकी मां उनसे रोज़ फ़ोन पर बात करती हैं और दुआएं देती हैं.
रज़ा ने जब फ़ीफ़ा के निमंत्रण पर रूस जाने की बात अपने स्कूली दोस्तों को बतायी थी तो किसी को यक़ीन नहीं हुआ.
अब उनके दोस्तों ने उनसे नेमार और रोनाल्डो के ऑटोग्राफ़ लाने के लिए कहा है.
अहमद रज़ा के मुताबिक़, फ़ीफ़ा प्रशासन किसी भी खिलाड़ी से बात करने की अनुमति नहीं देता है, यदि खिलाड़ी ख़ुद बात करें तो बात अलग है.
अपने पसंदीदा खिलाड़ी नेमार से मुलाक़ात के बारे में रज़ा बताते हैं, "मैं जब टॉस के लिए खड़ा था तो मैं सबसे आख़िर में था. नेमार मेरे साथ आकर खड़े हो गए. मैंने हिम्मत की और उनसे हाथ मिला लिया."
अहमद रज़ा के पिता उनके रूस पहुंचने के बाद से बहुत ख़ुश हैं. वो कहते हैं, "अहमद अपने दोस्त के साथ फ़ुटबॉल खेलने जाता था. एक दिन मैंने उससे पूछा कि कहां निकल जाते हो तो उसने बताया कि फ़ुटबॉल खेलने."
"मैंने उससे कहा कि हां बेटा ठीक है, मैं फ़ुटबॉल सिलता हूं, तुम फ़ुटबॉल खेलते हो."
रज़ा के पिता पहले एक फ़ुटबॉल बनाने की फ़ैक्ट्री में काम करते थे. अब वो सप्लायर के लिए गेंदों की सिलाई करते हैं.
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