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सोमवार, 26 जनवरी, 2009 को 23:59 GMT तक के समाचार
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बढ़ती गर्मी से पेंग्विनों को ख़तरा
एंपरर पेंग्विन
एंपरर पेंग्विन अंटार्कटिका के इलाक़े में ही पाए जाते हैं
अमरीका में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि विश्व स्तर पर बढ़ रही गर्मी के कारण दुनिया की सबसे बड़ी पेंग्विन प्रजाति इस सदी के अंत तक लुप्त हो सकती हैं.

मैसाचुसेट्स में शोधकर्ताओं का कहना है कि अंटार्कटिका के समुद्र में बर्फ़ के कम होने का पेंग्विनों के जीवन पर गहरा असर पड़ सकता है. इस क्षेत्र में पेंग्विनों की सबसे बड़ी प्रजाति यानी एंपरर पेंग्विन रहते हैं.

पेंग्विनों का जीवन पूर्ण रुप से बर्फ़ पर ही निर्भर करता है और अगर बर्फ़ की यह मोटी परत घटती है या कम होती है तो पेंग्विनों का जीवन दूभर हो सकता है.

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में छपे एक विस्तृत शोध में यह बात सामने आई है कि बढ़ती गर्मी के कारण कम होते बर्फ़ पेंग्विनों के जीवन पर असर डाल रहे हैं.

यह शोध अंटार्कटिका में रह रहे पेंग्विनों की एक बस्ती पर पिछले चार दशक से किया जा रहा है.

दक्षिणी ध्रुव के इस सुंदर और प्रतीकात्मक एंपरर पेंग्विन में पहली बार इतना विस्तृत शोध सामने आया है जिसके ज़रिए इनके भविष्य के बारे में कई फ़ैसले किए जा सकते हैं.

पेंग्विनों की इस बस्ती में मिले आकड़ों को अंटार्कटिका की जलवायु के बारे में भविष्यवाणी करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले आकड़ों से मिला कर नई जानकारियां जुटाई गई हैं.

शोधकर्ताओं का कहना है कि जिस तरह से गर्मी बढ़ रही है और बर्फ़ पिघल रही है उससे अनुमान लगाया जाता है कि 6000 पेंग्विनों की इस बस्ती में इस सदी के अंत तक मात्र 800 पेंग्विन रह जाएंगे.

अगर इस आकड़े को पूरे अंटार्कटिक द्वीप के पेंग्विनों पर लागू किया जाए तो इस सदी के अंत एंपरर पेंग्विनों की संख्या लुप्तप्राय पक्षियों के बराबर हो जाएगी.

ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि पेंग्विन बर्फ़ की मोटी तह के अलावा किसी और मौसम में रहने में अक्षम देखे गए हैं और बदलते मौसम में उनकी अनूकुलन क्षमता भी अधिक नहीं देखी गई है.

ऐसे में अगर बर्फ़ घटती चली जाती है तो पेंग्विनों के पास मौत के अलावा कोई और चारा नहीं रह जाता है.

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