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'घट रही है जीव-जंतुओं की संख्या' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन की ज़ूलॉजिकल सोसायटी का दावा है कि पिछले चार दशकों में पानी और ज़मीन पर पाए जाने वाले जीवों की आबादी में एक चौथाई से लेकर एक तिहाई तक की कमी आ गई है. इस रिपोर्ट में समिति ने वन्यजीवों से जुड़े 1970 के बाद के आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर दुनिया भर में जीवों की घटती प्रजातियों और संख्या के बारे में लोगों को चेताया है. रिपोर्ट का कहना है कि इन 38 सालों में ज़मीन पर रहने वाले जीवों की आबादी में 25 फ़ीसदी, समुद्री जीवों की जनसंख्या में 28 फ़ीसदी और नदी-पोखरों के जीवों की संख्या में 29 फ़ीसदी की कमी आ गई है. धरती के इतिहास में इस समय 'विलुप्त होने की भयावह कहानी' चल रही है. हर साल ग़ायब होने वाली प्रजातियों में एक फ़ीसदी हिस्सा तो मानवों का भी है. जनसंख्या में कमी और प्रजातियों के लुप्त होने के लिए रिपोर्ट ने प्रदूषण, शहरी विस्तार, ज़्यादा मछली मारने और शिकार को जवाबदेह ठहराया है. लुप्त होने की रफ़्तार वन्यजीवों पर काम करने वाली संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ के साथ मिलकर लंदन की इस समिति ने जीवित जीवों की एक सूची बनाई है.
वैज्ञानिक प्रकाशनों और ऑनलाइन आँकड़ों की मदद से इस रिपोर्ट में मछली, उभयचर (जो ज़मीन और पानी दोनों में रहते हैं), सरीसृप और चिड़ियों की 1,400 से ज़्यादा प्रजातियों के भविष्य के बारे में बात की गई है. इसका कहना है कि वर्ष 1970 से 2005 के बीच मात्र 35 सालों में इन जीवों की संख्या में 27 फ़ीसदी की कमी आ गई. सबसे ज़्यादा बुरा असर समुद्री प्रजातियों पर हुआ है जिनकी आबादी में वर्ष 1995 से 2005 के दस सालों में ही 28 फ़ीसदी की गिरावट देखने को मिली. समुद्री पक्षियों की संख्या में नब्बे के दशक के मध्य से 30 फ़ीसदी की कमी आई जबकि ज़मीन पर रहने वाले चिड़ियों की आबादी भी 25 फ़ीसदी घट गई है. जिन प्रजातियों की आबादी में सबसे ज़्यादा कमी आई है उसमें अफ़्रीकी हिरण, स्वॉर्डफ़िश और हैमरहेड शार्क शामिल हैं. इसके अलावा बैजी यानी याँग्त्ज़े नदी में मिलने वाले डॉल्फ़िन तो पूरी तरह से ख़त्म हो गए लगते हैं. आदमी पर असर समिति की यह रिपोर्ट जर्मनी के बॉन शहर में जैव विविधता पर होने वाले एक सम्मेलन से पहले जारी की गई है.
यह सम्मेलन 1992 में कई देशों के बीच हुई एक संधि के बाद से लगातार आयोजित हो रहा है. दुनिया भर में जीव-जंतुओं की घट रही संख्या और प्रजाति को रोकने के उद्देश्य से इस सम्मेलन में सदस्य देश रणनीति बनाएँगे. इन देशों ने वर्ष 2002 में जीव-जंतुओं की संख्या में कमी की इस रफ़्तार में 2010 तक 'महत्वपूर्ण कमी' लाने का इरादा जताया था. लेकिन ज़ूलॉजिकल सोसायटी का कहना है कि सरकारें इस लक्ष्य को पाने के लिए ज़रूरी नीतियाँ बनाने और उसे लागू कर पाने में विफल रही हैं. उसका कहना है कि इस रफ़्तार के हिसाब से 2010 तक उस लक्ष्य को पाने की उम्मीद नहीं की जा सकती. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ का कहना है कि अगले तीस सालों में तो जलवायु परिवर्तन भी विभिन्न प्रजातियों के लिए बड़ा ख़तरा बना जाएगा जिसका असर मानवों पर भी पड़ेगा. बॉन सम्मेलन में भाग ले रहे देशों से संगठन ने अपील की है कि जीव-जंतुओं को बचाने के लिए वे वर्ष 2020 तक वनों के नाश को शून्य के स्तर पर ले जाएँ. |
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