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डाइटिंग से घटता नहीं मोटापा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कोई कितनी भी डाइटिंग कर ले लेकिन शरीर में चर्बी जमा करने वाली कोशिकाओं की संख्या में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. स्वीडन स्थित केरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों का मानना है कि चर्बी जमा करने वाली कोशिकाओं की संख्या किशोरावस्था में ही तय हो जाती हैं और ज़िंदगी भर उतनी ही रहती है. इसके बाद के जीवन में बढ़ने वाले मोटापे का इनकी संख्या पर कोई असर नहीं पड़ता. 'नेचर' पत्रिका में बताया गया है कि कैसे उन्होंने बड़ी संख्या में अपना वज़न घटाने वाले लोगों का परीक्षण किया और उनकी फेट सेल यानि चर्बी कोशिकाओं में कोई ख़ास अंतर नहीं पाया. मोटापे के बढ़ने का अर्थ है हमारे शरीर और पेट की चर्बी को बढ़ाने वाली कोशिकाओं ‘एडिपोसाइट’ का विस्तार. इसीलिए वैज्ञानिकों के अध्ययन इन्हीं पर केंद्रित रहे हैं. जब हम मोटे होते हैं, तो ये कोशिकाएं अपने आकार में बढ़ती जाती हैं लेकिन विशेषज्ञ निश्चित रूप से यह नहीं जानते कि क्या केवल इनका आकार ही बढ़ता है या इनकी संख्या भी घटती-बढ़ती है. परीक्षण स्वीडेन के वैज्ञानिकों ने सबसे पहले विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों, किशोरों और वयस्कों पर परीक्षण किया. उन्होंने पाया कि बच्चों में चर्बी कोशिकाओं की संख्या बढ़ी लेकिन वयस्कों में यह संख्या पहले जैसी ही रही. इसके बाद उन्होंने इस संभावना पर परीक्षण किया कि विशेष परिस्थितियों में क्या इनकी संख्या बदल सकती है. उन्होंने उन मरीज़ों के नमूने लिए जो अपने पेट का आकार घटा कर वजन में परिवर्तन करना चाहते थे. इनमें से कुछ मरीज़ों ने 'गैस्ट्रिक बैंडिंग ऑपरेशन' कराया जो बहुत मोटे लोगों के पेट के आकार को कम करने का अंतिम उपाय माना जाता है. जब एक बार वज़न कम हो गया तब यह देखने के लिए कि चर्बी कोशिकाओं की संख्या कम हुई या नहीं, उनकी चर्बी का दूसरा नमूना लिया गया. बुरी ख़बर वैज्ञानिकों ने पाया कि चर्बी कोशिकाओं का स्तर पहले जैसा ही रहा. इस विषय पर शोध करनेवाली प्रमुख वैज्ञानिक डॉ किर्स्टी स्पाल्डिंग कहती हैं कि यह परिणाम डाइटिंग करने वालों के लिए बुरी ख़बर हैं. उन्होंने कहा, " इससे यह पता लगता है कि क्यों वजन कम करना और कम ही बनाए रखना बहुत मुश्किल काम होता है. दरअसल चर्बी कोशिकाएँ कहीं नहीं जातीं बल्कि बढ़ने की कोशिश करती रहती हैं."
लिवरपूल विश्वविद्यालय के डॉ पॉल ट्रेहर्न का कहना है कि इन वैज्ञानिकों ने मोटापे के क्षेत्र में और अध्ययन करने के लिए एक अहम पहल की है. उनका कहना था, "अगर हम चर्बी कोशिकाओं को कम करने का कोई उपाय निकाल पाते तो ज़्यादा बेहतर होता लेकिन इसके लिए दूसरे विकल्प भी हैं." उनके अनुसार इसका असली फ़ायदा यह हुआ है कि इससे मिले पुख्ता सबूतों का हम मोटापे और इसके कारणों के बारे में भविष्य में होने वाले दूसरे शोधों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर स्टीफ़न ओराहिली इस विचार से सहमत नहीं हैं कि चर्बी कोशिकाओं की संख्या किशोरावस्था से ही तय हो जाती है. उनका मानना है, "हम जानते हैं कि वयस्क व्यक्ति में ऐसी भी बहुत सी कोशिकाएँ होती हैं जो चर्बी नहीं जमा करतीं लेकिन अगर पोषक स्थितियाँ ठीक हों तो वे ऐसा करने में समर्थ हो सकती हैं." प्रोफ़ेसर स्टीफ़न ओराहिली का मानना है कि ये निष्कर्ष निकालना काफ़ी जल्दबाज़ी है कि किशोरावस्था में ही शरीर में चर्बी की कोशिकाओं की संख्या तय हो जाती है. |
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