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'आयुर्वस्त्र' पहनना ही काफ़ी नहीं | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आजकल ख़ासे लोकप्रिय हो रहे भारतीय जड़ी-बूटियों से रंगे कपड़ों के बारे में आयुर्वस्त्र' परियोजना के साथ काम करने वाली कैथरीन स्टबरफ़ील्ड का कहना है कि सिर्फ़ इन कपड़ों को पहनने भर से ही इलाज हो जाए, ऐसा नहीं है. परियोजना की ओर से दावा किया गया है कि औषधीय जड़ी-बूटियों से रंगी विशेष शर्ट पहनने से त्वचा की खुजली या सूखापन दूर हो सकता है जबकि ऐसी ही एक विशेष चादर को अगर गद्दों पर बिछा दिया जाए तो वह रातों को नींद न आने का निवारण कर सकती है. ‘आयुर्वस्त्र’ के साथ काम करने से पहले कैथरीन स्टबरफ़ील्ड दुनिया भर के अनेक कपड़ा निर्माताओं के साथ काम कर चुकी है. वे कहती हैं, “उचित प्रभाव के लिए इन कपड़ों के साथ ज़िंदगी के सही तौरतरीकों को अपनाना भी ज़रूरी है.” वह कहती हैं, “मेरा मानना है कि प्राकृतिक रूप से रंगे गए प्राकृतिक सूती वस्त्र, ऊन या सिल्क पहनना निश्चित रूप से आपकी त्वचा की सहायता करेंगे.” उन्होंने कहा, “लेकिन आयुर्वेदिक रंगों से रंगी टी-शर्ट पहनने मात्र से आपका उपचार नहीं हो जाएगा. जैसा कि सरकारी रिपोर्ट कहने वाली है कि अगर आप इसके साथ आयुर्वेदिक दवाएं लें, तब तो ठीक है.” केरल की परंपरा
इन जड़ी-बूटियों को पारंपरिक भारतीय आयुर्वेदिक औषधियों के सिद्धांत के अनुसार छांटा जाता है और इनसे रंगे कपड़ों को ‘आयुर्वस्त्र’ के नाम से जाना जाता है. ‘आयुर्वस्त्र’ परियोजना के मुख्य तकनीशियन राजन के ने बीबीसी विश्व सेवा के कल्चर शॉक कार्यक्रम से कहा, “हमने आयुर्वेदिक पुस्तकों और सिद्धांतों पर आधारित 28 औषधीय पौधों को छांटा है.” उन्होंने कहा, “हम प्राकृतिक सूती कपड़ों को इनमें डुबो कर सोने वाले वस्त्रों का निर्माण करते हैं.” आयुर्वेदिक उपचार का मुख्य केंद्र केरल है जहाँ यह पिछली दो सदियों से पश्चिमी एलोपैथिक उपचार के साथ अपनी भी मौजूदगी दर्ज करा रहा है. केरल सरकार इन कपड़ों के औषधीय फ़ायदों के बारे में दावा करने वाले एक स्थानीय क्लीनिक के प्रयोगों के बारे में रिपोर्ट जारी करने वाली है. सिर्फ़ स्वास्थ्य लाभ नहीं परियोजना के प्रमुख डॉ रवि कहते हैं, “आयुर्वस्त्र के स्वास्थ्य लाभ तो केवल इस कहानी का एक हिस्सा भर हैं.” उन्होंने कहा, “हमने इस परियोजना को स्वास्थ्य के लाभ के लिए नहीं बल्कि ग्रामीण केरल के इस पारंपरिक उद्योग को जीवित रखने के लिए बनाया है.” वह कहते हैं, “हैंडलूम की परंपरा तो इस धरती का हिस्सा है और आयुर्वेद भी.” वह क्षेत्र के लोगों के बारे में बताते हैं कि अब तक उन्हें जीवन यापन के लिए एक दिन में सिर्फ़ 35 रुपए ही मिलते थे. लेकिन आयुर्वेदिक चादरें उन्हें देशी और विदेशी बाज़ार से कुछ ज़्यादा दिला सकती हैं. वे कहते हैं, “इस परियोजना का मुख्य लाभ इन गरीब लोगों को ही मिलेगा.” | इससे जुड़ी ख़बरें जड़ी बूटियों के गुणों वाले भारतीय बुर्क़े07 सितंबर, 2007 | विज्ञान बाल मज़दूरों के बनाए वस्त्र नष्ट होंगे28 अक्तूबर, 2007 | कारोबार चीनी कपड़ों को लेकर चिंता21 अगस्त, 2007 | कारोबार प्रभु के लिए जयपुरी रज़ाई की गर्माहट 08 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एनआईडी में बन रहे हैं सेना के कपड़े08 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस आयुर्वेद अल्ज़ाइमर में 'कारगर'05 सितंबर, 2006 | विज्ञान मोटे लोगों के लिए ख़ास डिज़ाइनर कपड़े02 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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