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एनआईडी में बन रहे हैं सेना के कपड़े | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन यानी एनआईडी में इन दिनों हिमालय की चोटियों पर तैनात सैनिकों को लिए विशेष प्रकार के गर्म वस्त्र तैयार करने की कोशश की जा रही है. इस संस्थान के विशेषज्ञ इस मुहिम में जुटे हैं कि किसी तरह विदेशों से आयात किए जा रहे महँगे ‘थर्मल वीयर’ का भारतीय विकल्प तैयार किया जा सके ताकि फौज के खर्च में कमी आ सके. इसके लिए अंगूरा ऊन का इस्तेमाल किया जा रहा है. ग़ौरतलब है कि ये ऊन दूसरों के मुकाबले अधिक गर्म होती है. इसे मजबूत बनाने के लिए प्लाज़्मा तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. एनआईडी में कर्यरत पीएस झाला कहते हैं, '' प्लाज़्मा तकनीक की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इससे पर्यावरण को किसी तरह का नुक़सान नहीं पहुँचता. दूसरी विशेषता ये है कि अंगूरा की मूल विशेषताओं में इससे कोई कमी नहीं आती है.'' विशेष वस्त्र कुछ महीने पहले एनआईडी के छात्रों के दल ने सियाचीन ग्लेशियर जाकर इस बात का अध्ययन किया था किस प्रकार सैनिकों के वस्त्रों का भार कम कर आरामदायक बनाया जाए. यह पूछने पर कि सेना एनआईडी की ओर से तैयार किए गए वस्त्रों को क्यों महत्व देगी, संस्थान के टेक्सटाइल व्यापार विभाग के सोमेश सिंह का कहना था, '' अगर कोई सामान सस्ता मिलेगा तो आप उसे क्यों नहीं लेंगे.'' उनका कहना था, ‘’दूसरी बात ये है कि अगर आप कोई सामान आयात करते हैं तो उसकी सर्विसिंग के लिए बार- बार बाहर जाना पड़ता है. ऐसे में आप निश्चित तौर पर अपने यहाँ तैयार सामान को महत्व देंगे.’’ सोमेश का कहना है कि अगर एनआईडी को सफलता मिलती है तो पहाड़ी इलाक़ों में अंगूरा ऊन तैयार करने वाले लोगों को भी काफ़ी फ़ायदा होगा. उनका कहना था कि इस फैब्रिक के मजबूत होने के बाद हम इससे तरह-तरह के वस्त्र तैयार कर सकते हैं. अंगूरा को दूसरे फैब्रिक के साथ मिलाकर नए प्रकार के वस्त्र तैयार किए जा सकते हैं और जब माँग बढ़ेगी तो इसका सीधा फ़ायदा अंगूरा ऊन बनाने वालों को होगा. पीएस झाला मानते हैं कि प्लाज़्मा तकनीक से टेक्सटाइल की दुनिया में क्राँति आ रही है. वो कहते हैं, '' प्लाज़्मा प्रोसेसिंग के बाद कपड़ा न तो सिकुड़ता है और न ही पहनने वाले को चुभता है.'' एनआईडी तैयार परिधान अगले वर्ष जनवरी में सेना के सामने पेश करेगी. अगर सेना इन वस्त्रों को लेने से इनकार भी करती है तो भी ठंडे इलाक़ों में रह रहे लोगों के लिए यह ज़रूर काम आएंगे. | इससे जुड़ी ख़बरें सियाचिन में युद्ध-विराम जारी रहेगा27 मई, 2005 | भारत और पड़ोस सैनिकों की जीवन रेखा की तरह है वायुसेना26 मई, 2006 | भारत और पड़ोस सियाचिन की ऊँचाइयों से30 मई, 2006 | भारत और पड़ोस सैनिकों के लिए भावनात्मक मुद्दा है सियाचिन30 मई, 2006 | भारत और पड़ोस मुश्किलों की लंबी सूची है सियाचिन पर25 मई, 2006 | भारत और पड़ोस ऑक्सीजन की कमी से क्षमता पर असर24 मई, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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