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ऑक्सीजन की कमी से क्षमता पर असर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जिस एमआई 17 वन वी हेलिकॉप्टर में हम थॉइस केंद्र से चौकियों की ओर रवाना हुए उसमें चालक दल के अलावा 10 से 12 लोग एक समय में बैठ सकते थे. वो हेलिकॉप्टर पीछे से खुला था, जहाँ मोटी रस्सी की जालियाँ लगी थीं इससे बाहर के दृश्य साफ़ देखे जा सकते थे. लगभग 17 हज़ार फुट ऊँचे पहाड़ों के बीच से हेलिकॉप्टर चौकियों की ओर चला. हर तरफ़ बर्फ़ से ढकी पहाड़ों की चोटियाँ दिख रही थीं. जैसे-जैसे हम चौकियों की ओर बढ़ रहे थे उन्हें नज़दीक़ से देखने का रोमांच बढ़ता जा रहा था. चौकियाँ बर्फ़ से ढकी दिखीं, बिल्कुल लग रहा था जैसे हम किसी ध्रुव क्षेत्र में पहुँच गए जहाँ से सिर्फ़ बर्फ़ के पहाड़ और उनके बीच-बीच में बनी गहरी खाइयाँ ही दिख रही थीं. आगे बढ़ने के साथ ही तापमान गिरने लगा और धीरे-धीरे शून्य से 20 डिग्री नीचे की ओर बढ़ने लगा. पीछे से खुले उस हेलिकॉप्टर से ठंडी हवा अंदर तक आ रही थी और कई तहों में कपड़े पहनने के बावजूद ठंड का पूरा एहसास हो रहा था. अनोखा अनुभव दिल्ली से सियाचिन के लिए जब रवाना हुए थे तब दिल्ली का तापमान 44 डिग्री सेल्सियस था. सिर्फ़ चौबीस घंटे के भीतर हम लगभग 60 डिग्री के तापमान के अंतर में पहुँच गए थे.
उस ऊँचाई पर ऑक्सीजन की कमी थी और हालाँकि हमें उस समय ये कमी महसूस नहीं हो रही थी, मगर हमारे साथ मौजूद सेना के लोगों की सलाह रही कि हमें वहाँ मौजूद ऑक्सीजन के सिलिंडरों से पाइप के ज़रिए आ रही ऑक्सीजन बीच-बीच में लेते रहना चाहिए. हम आगे बढ़ते-बढ़ते भारतीय सेना की कुमार चौकी तक गए और उसके आगे ख़राब होते मौसम की वजह से हमें लौटना पडा. रास्ते में हमने नुब्रा नदी का उदगम स्थान भी देखा. एक अनोखे अनुभव का भान स्पष्ट रूप से हो रहा था. बेस कैंप पर आने के बाद पता चला कि वहाँ से भारत की जो चौकी सबसे दूर है, उसका नाम इंद्रा कॉल है और सैनिकों को वहाँ तक पैदल जाने में लगभग 20 से 22 दिन का समय लग जाता है. सेना की ओर से हमें बताया गया कि चौकियों पर जाने वाले सैनिक एक के पीछे एक करके लाइन में चलते हैं और एक रस्सी सबकी क़मर में बँधी होती है. क़मर में रस्सी इसलिए बाँधी जाती है क्योंकि बर्फ़ कहाँ धँस जाए इसका पता नहीं रहता और अगर कोई एक व्यक्ति खाई में गिरने लगे तो बाकी लोग उसे बचा सकें. ऑक्सीजन की क़मी होने की वजह से उन्हें धीमे-धीमे चलना पड़ता है और रास्ता कई हिस्सों में बँटा होता है. साथ ही ये भी तय होता है कि एक निश्चित स्थान पर उन्हें किस समय तक पहुँच जाना है और फिर वहाँ कुछ समय रुककर आगे बढ़ जाना है. काफ़ी मुश्किलों का सामना करने के बाद चौकियों तक पहुँचते हैं सैनिक. मगर उन चौकियों तक पहुँचने के बाद भी समाप्त नहीं होती मुश्किलें. (चौकियों पर सैनिकों को होने वाली मुश्किलों की चर्चा मुकेश शर्मा की डायरी के अगले पन्ने में) |
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