|
पायलटों की कुशलता का इम्तेहान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया का सबसे ऊँचा रणक्षेत्र, सियाचिन. अगर नाम के मतलब पर जाएँ तो सिया मतलब गुलाब और चिन मतलब जगह यानी गुलाबों की घाटी, मगर भारत और पाकिस्तान के लिए इस गुलाब के काँटे काफ़ी चुभने वाले साबित हुए हैं. क्षेत्र के दुर्गम होने का अंदाज़ा वहाँ तैनात सैनिकों के बीच प्रचलित एक कहावत से ही लग जाता कि वहाँ की ज़मीन ऐसी बंजर और दर्रे इतने ऊँचे हैं कि सिर्फ़ पक्के दोस्त और कट्टर दुश्मन ही वहाँ तक पहुँच सकते हैं. वहाँ जाना भारतीय सेना के साथ ही संभव है इसलिए वायुसेना के विमान एएन 32 से हम पहले दिल्ली से चंडीगढ़ पहुँचे, जहाँ हमें सियाचिन के बारे में बताया गया. एक झलक रखी गई 17 से 23 हज़ार फुट की ऊँचाई पर सियाचिन पर बनी भारतीय सेना की चौकियाँ की जहाँ ठंड में तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे पहुँच जाता है. सियाचिन की उन ऊँचाइयों के बारे में जानने के बाद हम वायुसेना के एएन 32 विमान से रवाना हुए सियाचिन पर बनी भारतीय सेना की चौकियों की ओर. पायलटों की मुश्किल अपने विमान के कॉकपिट से हमने देखा कि आगे जा रहे विमान ने किस तरह चौकियों के पास पैराशूट से सामान गिराया. चौकियों के पास जिन जगहों पर ये सामान गिराया जाता है उन्हें सेना की भाषा में ‘ड्रॉपिंग ज़ोन’ कहा जाता है, यानी सामान गिराने का क्षेत्र.
ये क्षेत्र बहुत बड़े नहीं होते और जहाँ ये क्षेत्र हैं उनके इर्द-गिर्द काफ़ी गहरी खाइयाँ भी होती हैं, जिन्हें सैनिक ‘क्रेवासेज़’ कहते हैं. डर ये भी होता है कि गिराया गया सामान कहीं उन खाइयों में न गिर जाए क्योंकि सामान अगर वहाँ गया तो फिर उसे निकाल पाना संभव नहीं होता. ये खाइयाँ इतनी गहरी बताई जाती हैं कि ये पूरा का पूरा विमान ही लील लेंगी और उसका अता-पता भी नहीं चलेगा. विमान चालकों की मुश्किलों के बारे में वहाँ कार्यरत सियाचिन पायनियर्स की हेलिकॉप्टर्स यूनिट के कमांडिंग ऑफ़िसर जीन एरिंजरी ने बताया, “उतनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की कमी होने की वजह से साँस फूलती है मगर फिर भी पायलटों को आपस में बात तो करनी ही होती है.” एरिंजरी के अनुसार, “वहाँ ठंड काफ़ी होती है और विमान के भीतर तक ये ठंड आती है जिससे हाथ और पैर सुन्न होने लगते हैं. इसके अलावा ड्रॉपिंग ज़ोन और चौकियाँ ऊपर से इतने छोटे दिखते हैं कि अगर ठीक से काम नहीं किया गया तो सफलता की संभावना काफ़ी कम रहती है.” चौकियों पर सामान गिराया जाना देखने के बाद हम भारतीय वायुसेना के थॉइस केंद्र पर लौटे और उसके बाद चौकियों को और नज़दीक से देखने के लिए हम वायुसेना के एमआई 17वन वी हेलिकॉप्टर में रवाना हुए. (मुकेश शर्मा की सियाचिन यात्रा की डायरी का एक पन्ना हर रोज़ आपके लिए बीबीसी हिंदी डॉटकॉम पर. आगे की यात्रा का विवरण अगले पन्ने में.) |
इससे जुड़ी ख़बरें सियाचिन तक पहुँची निजी एयरलाइंस15 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस सीमाएँ नहीं बदलेंगी: मनमोहन12 जून, 2005 | भारत और पड़ोस सियाचिन में युद्ध-विराम जारी रहेगा27 मई, 2005 | भारत और पड़ोस लंबा विवाद है सियाचिन का05 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||