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गुरुवार, 05 अगस्त, 2004 को 12:45 GMT तक के समाचार
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लंबा विवाद है सियाचिन का

सियाचिन ग्लेशियर
सियाचिन सबसे ऊँचे रणक्षेत्रों में से एक है
क़रीब 18000 फुट की ऊँचाई पर स्थित दुनिया के सबसे ऊँचे रणक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर सैन्य गतिविधियाँ बंद करने के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच क़रीब सात साल बाद एक बार फिर बातचीत हुई है.

इस बातचीत में भारतीय रक्षा सचिव अजय विक्रम सिंह भारतीय दल के मुखिया थे जबकि पाकिस्तानी शिष्टमंडल का नेतृत्व वहाँ के रक्षा सचिव सेवानिवृत्त लैफ़्टिनेंट जनरल हामिद नवाज़ ख़ान ने किया.

उजाड़, वीरान और बर्फ़ से ढका यह ग्लेशियर यानी हिमनद सामरिक रुप से दोनों ही देशों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन इस पर सेनाएँ तैनात रखना दोनों ही देशों के लिए महंगा सौदा साबित हो रहा है.

इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच 1989 तक सात दौर की वार्ता हुई थी लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.

पिछले सात सालों में सियाचिन पर यह पहली बातचीत है जिसे सकारात्मक कहा जा रहा है.

गुरूवार को बातचीत के पहले दौर के बाद पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी से भी मुलाक़ात भी की है.

समस्या और हल

सियाचिन की समस्या क़रीब 21 साल पुरानी है.

1972 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद जब शिमला समझौता हुआ तो सियाचिन के एनजे-9842 नामक स्थान पर युद्ध विराम की सीमा तय हो गई.

इस बिंदु के आगे के हिस्से के बारे में कुछ नहीं कहा गया. अगले कुछ वर्षों में बाक़ी के हिस्से में गतिविधियाँ होने लगीं.

पाकिस्तान ने कुछ पर्वतारोही दलों को वहाँ जाने की अनुमति भी दे दी. कहा जाता है कि पाकिस्तान के कुछ मानचित्रों में यह भाग उनके हिस्से में दिखाया गया.

 दोनों देशों में आपसी भरोसे की कमी है, दोनों को डर रहता है कि कोई चौकी छोड़ी तो दूसरा उस पर क़ब्जा कर लेगा, इसलिए आपसी विश्वास बढ़ाना ज़रुरी है, फिर यह मुद्दा जल्दी सुलझने की उम्मीद की जा सकती है
लेफ़्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद

इससे चिंतित होकर भारत ने 1985 में ऑपरेशन मेघदूत के ज़रिए एनजे-9842 के उत्तरी हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया.

रिटायर्ड लेफिटनेंट जनरल शंकर प्रसाद उस अभियान के बारे में बताते हैं, "भारत ने एनजे-9842 के जिस हिस्से पर नियंत्रण किया है, उसे सालटोरो कहते हैं. यह वाटरशेड है यानी इससे आगे लड़ाई नहीं होगी."

वे कहते हैं, "सियाचिन का उत्तरी हिस्सा-कराकोरम भारत के पास है. पश्चिम का कुछ भाग पाकिस्तान के पास है. सियाचिन का ही कुछ भाग चीन के पास भी है. एनजे-9842 ही दोनों देशों के बीच लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक सीमा नियंत्रण रेखा है."

इन उजड़े और वीरान हिस्सों का किसी के क़ब्जे में होना कितना सामरिक महत्व रखता है? रक्षा विशेषज्ञ मनोज जोशी मानते हैं कि यहाँ सैनिकों का रहना ज़रुरी नहीं है पर अगर किसी दुश्मन का क़ब्जा हो तो फिर दिक़्क़त हो सकती है."

"यहाँ से लेह, लद्दाख और चीन के कुछ हिस्सों पर नज़र रखने में भारत को मदद मिलती है. अगर यह किसी के हिस्से में न हो तो दोनों देशों के लिए कोई नुक़सान नहीं है."

रक्षा सचिव स्तर की बातचीत
सियाचिन पर समझौते से दोनों पक्षों को फ़ायदा होगा

मनोज जोशी कहते हैं, "चूँकि पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों के दौरान पूरे सियाचिन को अपना हिस्सा बताता रहा है इसलिए इस पर अपनी सेना की वास्तविक स्थिति रिकॉर्ड पर लाने में उसे दिक़्क़त हो सकती है."

दूसरी ओर लैफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद का कहना है कि इस मुद्दे पर समझौता होना आसान है क्योंकि यहाँ पर सैनिक गतिविधियाँ बंद करना दोनों के ही हित में है.

उनका कहना है, "दोनों देशों में आपसी भरोसे की कमी है, दोनों को डर रहता है कि कोई चौकी छोड़ी तो दूसरा उस पर क़ब्जा कर लेगा, इसलिए आपसी विश्वास बढ़ाना ज़रुरी है, फिर यह मुद्दा जल्दी सुलझने की उम्मीद की जा सकती है."

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देश सियाचिन में सैनिक गतिविधियों पर हो रहा भारी ख़र्च बचाना तो चाहते है लेकिन साथ ही चाहते हैं कि उनकी प्रतिष्ठा को भी कोई ठेस न लगे यानी घरेलू मोर्चे पर नाक भी बची रहे.

दोनों देशों के संबंधों में आई नई गरमाहट सियाचिन के बर्फ़ को कितना पिघला पाती है, इसके लिए वक़्त का इंतज़ार करना होगा.

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