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सैनिकों के लिए भावनात्मक मुद्दा है सियाचिन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उन मुश्किल हालात में काम करने के बावजूद सैनिक मनोबल बनाए रखते हैं और इस मनोबल की उनकी परीक्षा तब होती है जब वहाँ उनके किसी साथी की मौत हो जाए. मन में सवाल उठा कि किसी साथी सैनिक की मौत पर दूसरे सैनिक के मनोबल पर उसका क्या असर होता होगा. मैंने ये सवाल पूछा बाना सिंह नाम के उस सैनिक से जिन्हें सियाचिन पर बहादुरी दिखाने के लिए सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र दिया गया था. उन्होंने बताया, “वहाँ अगर हम ये सोचने लगे तब तो हम देश के लिए कुछ भी नहीं कर पाएँगे. हमारे लिए पहले तो देश होता है. हमने तो 11 लोगों को एक ही साथ जला दिया है और उनकी अस्थियाँ घर भेज दीं, जैसे ये सामान्य बात हो.” सुनकल लगा कि हालात इंसान को पत्थर बना देते हैं या इंसान ख़ुद को मज़बूत बनाने के लिए किसी पत्थर में जा छिपता है जहाँ किसी संवेदना की गूँज उस तक न पहुँचे. सियाचिन से वापसी के बाद ये जानने की इच्छा हुई कि आख़िर वहाँ सैनिकों की मौजूदगी बनाए रखने के लिए सरकार पैसा कितना ख़र्च कर रही है. ये सवाल मैंने कई विशेषज्ञों और सेना के पूर्व अधिकारियों से जानने की कोशिश की मगर कोई ठोस जवाब नहीं मिला. 'क़ीमत ख़ून से' तब मैंने सियाचिन से लंबे समय तक जुड़े रहे और ‘सियाचिन कॉन्फ़्लिक्ट विदआउट एंड’ नाम की क़िताब लिख चुके सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल वीआर राघवन से पूछा कि आख़िर इस सवाल का जवाब देने में हिचक क्यों है? उनके जवाब से स्थिति काफ़ी कुछ स्पष्ट हुई कि मसला किस तरह भावनात्मक स्तर पर जुड़ा है. उन्होंने कहा, “इसमें एक दर्ज़न से ज़्यादा अनुमान लग चुके हैं. अगर रुपए पैसे की बात की जाए तो एक नया संदर्भ निकल आता है. ये रुपए पैसे का मामला है ही नहीं क्योंकि ये राष्ट्र की संप्रभुता का सवाल है.” लेफ़्टिनेंट जनरल वीआर राघवन के अनुसार, “अगर संसद में बताया जाए कि कितना धन ख़र्च हो रहा है तो आप ही पलटकर पूछेंगे कि आपको नहीं लगता कि इतना पैसा ख़र्च करना फ़िज़ूलख़र्ची है. मगर राष्ट्र की सुरक्षा के मसले में जब क़ीमत ख़ून से चुकाई जा रही है तो उस ख़ून का वज़न रुपए पैसे में तौला नहीं जा सकता.” आख़िर इस मसले का हल हो कैसे सकता है इस सवाल के साथ मैं पहुँचा 1984 में ऑपरेशन मेघदूत के ज़रिए सियाचिन की उन ऊँचाइयों पर भारतीय सैनिकों को पहुँचाने वाले सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल एम एल छिब्बर के पास. उनका कहना था कि इसका हल निकालने का काम भी सेना को ही सौंपना चाहिए. लेफ़्टिनेंट जनरल एम एल छिब्बर का कहना था, “1971 के युद्ध के बाद सैम मानेकशा और जनरल टिक्का ख़ान ने नियंत्रण रेखा का मसला ठीक कर दिया था. अब होता ये है कि मीडिया आ जाता है राजनेता आ जाते हैं. सीधा सा मामला है फ़ौज को कहिए कि बैठकर इसका हल निकालो.” सियाचिन पर तैनात सैनिकों की स्थिति और वे मुश्किल हालात देखने के बाद पहला सवाल ज़ेहन में यही उठता है कि कब होगी सैनिकों की उन अमानवीय हालात से वापसी मगर जवाब के लिए शायद राजनीतिक नेतृत्त्व की सुविधा का इंतज़ार करना होगा. (इस विषय पर आप अपनी राय हमें [email protected] पर भेज सकते हैं.) |
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