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घर और दुनिया से कटे होने का एहसास | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सैनिक को अंदाज़ा होता है कि उसे काफ़ी मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ सकता है, और सैनिकों के परिजन भी शायद ये बात जानते हैं मगर फिर भी सियाचिन जैसी हर तैनाती परिवार के लिए चिंता ही लाती है. सियाचिन पर तैनात रहे ऐसे ही एक सैनिक की पत्नी ने हमें बताया, “जब पहली बार पता चला कि उनकी पोस्टिंग सियाचिन पर हो गई है तो मन तो काफ़ी घबराया कि वहाँ काफ़ी बर्फ़ होती है. मगर फिर ख़ुद को समझाना ही पडा कि सेना की नौकरी में ऐसा तो होगी ही.” ऐसे में सैनिकों को ही अपने घरवालों को समझाना होता है कि वे धैर्य रखें. चौकी पर तैनाती के बाद परिवार वालों से जुड़े रहने का साधन फ़ोन बन जाता है. फ़ोन की सुविधा अब अपने परिवार से जुड़ा रहना फ़ोन की सुविधा आ जाने की वजह से काफ़ी आसान भी हुआ है. सियाचिन पर मौजूद स्क्वॉड्रन लीडर वत्सल कुमार सिंह ने बताया, “चार से पाँच चौकियों के बीच में फ़ोन होता है जिसके ज़रिए परिवार वालों से हफ़्ते में एक बार बात हो पाती है.” फ़ौजी डाक प्रणाली से चिट्ठी बेसकैंप पर आती है और उसके बाद चौकियों तक पहुँचाई जाती है, वैसे अब फ़ोन की सुविधा का ही इस्तेमाल ज़्यादा होता है. वैसे इस संघर्ष के शुरुआती दिनों में जब सैनिक वहाँ तैनात होते थे तब तो वहाँ सुविधाएँ बहुत ही कम हुआ करती थीं. वहाँ तैनात रहे एक सैनिक ने बताया कि उस समय संपर्क लगभग नहीं के ही बराबर रहता था. उन्होंने बताया कि चिट्ठी काफ़ी दिनों बाद पहुँच पाती थी और उतनी ठंड में तो कलम की स्याही भी जम जाया करती थी. उन हालात में सैनिक पेंसिल का इस्तेमाल करके कभी-कभार चिट्ठी लिख पाते थे. दूर रहने की मुश्किलें इस तरह की तैनाती में सैनिकों के परिवार भी ख़ुद को समझा लेते हैं कि सेना की नौकरी में ऐसी तैनातियाँ तो होंगी ही, हालाँकि वे ये भी नहीं चाहते कि एक के बाद ऐसी ही जगह तैनाती होती रहे. चौकियों पर तैनात सैनिकों को अब चूँकि सीमा के उस पार निशाना नहीं साधना पड़ता तो वहाँ उसके पास अपनी चौकियों में रहने के अलावा सामरिक दृष्टि से कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं रह जाता, यानी ज़्यादा खाली समय और ऐसे समय में मन भागता है घर की ओर. स्क्वॉड्रन लीडर वत्सल कुमार सिंह ने बताया, “आप अगर शादी-शुदा हैं और घर पर आपको लगता है कि आपके बीवी-बच्चे आपका इंतज़ार कर रहे हैं तो इन कठिन परिस्थितियों में रहना और भी मुश्किल हो जाता है.” उन्होंने कहा, “ऐसे में भी अलग रहना तो पड़ता ही है. अच्छी बात होगी कि आप जितनी जल्दी ये बात समझ जाएँ और उसी के साथ जीना सीख लें.” घर में बच्चा पैदा होने की ख़ुशी हो या किसी के गुज़र जाने का ग़म, एहसास तभी होता है जब वो सैनिक ख़ुद घर पर फ़ोन करे. एक सैनिक की पत्नी ने बताया, “जब हमारा बेटा पैदा हुआ तो वो सियाचिन पर तैनात थे. उन्हें आठ दिन बाद तभी ख़बर मिली जब उन्होंने ख़ुद फ़ोन किया. कहीं और तैनात होते तो हम लोग ही फ़ोन कर देते मगर वहाँ तो ऐसा हो नहीं सकता. पता तभी चलता है जब वो ख़ुद फ़ोन करें.” यानी एक तो मुश्किल हालात और उस पर से परिजनों से इतनी दूर और दुनिया से कटे रहने का एहसास, ऐसे में समय काटना भी पहाड़ की तरह हो जाता है. (इस विषय पर आप अपनी राय हमें [email protected] पर भेज सकते हैं. मुकेश शर्मा की सियाचिन डायरी के अगले पन्ने में चर्चा होगी सैनिकों के मज़बूत मनोबल की. ) |
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