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सियाचिन की ऊँचाइयों से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया का सबसे ऊँचा रणक्षेत्र, सियाचिन. अगर नाम के मतलब पर जाएँ तो सिया मतलब गुलाब और चिन मतलब जगह यानी गुलाबों की घाटी, मगर भारत और पाकिस्तान के लिए इस गुलाब के काँटे काफ़ी चुभने वाले साबित हुए हैं. पायलटों की कुशलता की परीक्षा
क्षेत्र के दुर्गम होने का अंदाज़ा वहाँ तैनात सैनिकों के बीच प्रचलित एक कहावत से ही लग जाता कि वहाँ की ज़मीन ऐसी बंजर और दर्रे इतने ऊँचे हैं कि सिर्फ़ पक्के दोस्त और कट्टर दुश्मन ही वहाँ तक पहुँच सकते हैं. वहाँ जाना भारतीय सेना के साथ ही संभव है इसलिए वायुसेना के विमान से ही हम वहाँ जा सके. ऑक्सीजन की कमी से क्षमता पर असर
जैसे-जैसे हम चौकियों की ओर बढ़ रहे थे उन्हें नज़दीक़ से देखने का रोमांच बढ़ता जा रहा था. चौकियाँ बर्फ़ से ढकी दिखीं, बिल्कुल लग रहा था जैसे हम किसी ध्रुव क्षेत्र में पहुँच गए जहाँ से सिर्फ़ बर्फ़ के पहाड़ और उनके बीच-बीच में बनी गहरी खाइयाँ ही दिख रही थीं. आगे बढ़ने के साथ ही तापमान गिरने लगा और धीरे-धीरे शून्य से 20 डिग्री नीचे की ओर बढ़ने लगा. मुश्किलों की लंबी सूची है सियाचिन पर
या तो हज़ारों फुट ऊँचे पहाड़ या हज़ारों फुट गहरी खाइयाँ, न पेड़-पौधे, न जानवर, न पक्षी. इतनी बर्फ़ कि अगर दिन में सूरज चमके और उसकी चमक बर्फ़ पर पड़ने के बाद आँखों में जाए तो आँखों की रोशनी जाने का ख़तरा और अगर तेज़ चलती हवाओं के बीच रात में बाहर हों तो चेहरे पर हज़ारों सुइयों की तरह चुभते, हवा में मिलकर उड़ रहे बर्फ़ के अंश. सैनिकों की जीवन रेखा की तरह है वायुसेना
सियाचिन पर तैनात सैनिक चाहे भारत के हों या पाकिस्तान के, दोनों ही ओर के सैनिकों को लगभग उसी तरह की मुश्किलें उठानी पड़ती हैं. सियाचिन पर बनी सैनिक चौकियों की जीवन रेखा के रूप में काम करती है वहाँ वायु सेना. उन चौकियों पर जो हेलिकॉप्टर उतरता है उसे चीता का नाम दिया गया है. घर और दुनिया से कटे होने का एहसास
सैनिक को अंदाज़ा होता है कि उसे काफ़ी मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ सकता है, और सैनिकों के परिजन भी शायद ये बात जानते हैं मगर फिर भी सियाचिन जैसी हर तैनाती परिवार के लिए चिंता ही लाती है. ऐसे में सैनिकों को ही अपने घरवालों को समझाना होता है कि वे धैर्य रखें. सैनिकों के लिए भावनात्मक मुद्दा है सियाचिन
उन मुश्किल हालात में काम करने के बावजूद सैनिक मनोबल बनाए रखते हैं और इस मनोबल की उनकी परीक्षा तब होती है जब वहाँ उनके किसी साथी की मौत हो जाए. मन में सवाल उठा कि किसी साथी सैनिक की मौत पर दूसरे सैनिक के मनोबल पर उसका क्या असर होता होगा. |
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