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गर्भवती औरतों के लिए घुमावदार रीढ़ मददगार
गर्भवती महिला
महिलाओं के शारीर का क्रमिक विकास इस तरह से हुआ है कि गर्भ के दौरान भी उनका शारीरिक संतुलन बना रहे.
औरतों का शारीरिक विकास कुछ इस तरह से हुआ है कि गर्भावस्था के दौरान शारीरिक संतुलन बनाए रखने में उन्हें ज़्यादा दिक्कत न हो.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एक शोध का निष्कर्ष है कि औरतों में पुरुषों की अपेक्षा घुमावदार रीढ़ का विकास इसी वजह से हुआ.

विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का कहना है कि तनकर चलने वाले मानव के पूर्वज बिना अतिरिक्त लचक के गर्भ के दौरान दुश्मनों से बचकर भागने के क़ाबिल नहीं रहे होंगे.

"नेचर स्टडी" का कहना है कि उन लोगों को पीठ की दर्द की शिकायतें भी रही होंगी.

इस बात को तब और भी मज़बूती मिली जब मानव के "प्रागैतिहासिक संबंधी" ऑस्ट्रैलोपिथेकस महिला के अवशेष में भी रीढ़ की संरचना पुरुषों से अलग पाई गई.

अनुकूलन लाई राहत

मानव के विकास में तन कर चलने का संक्रमण काल महत्वपूर्ण बदलाव का दौर रहा.

लेकिन गर्भवती महिलाओं के लिए यह एक अनचाहा परिणाम था.

गैर-मानव प्राईमेट्स में गर्भ का भार पेट के बीचोंबीच आता है लेकिन मानव में यह वजन आगे की ओर पड़ता है.

इससे शरीर का गुरुत्व केंद्र आगे खिसक जाता है और शरीर असंतुलित हो जाता है.

 रीढ़ में आए इस अनुकूलन के बिना गर्भावस्था में पीछे की मांशपेशियों पर बहुत वजन पड़ता जिससे दर्द और थकान होती. इससे चलने-फिरने में परेशानी होती और दुश्मन से भागने की क्षमता भी कम हो जाती.
लीज़ा शैपिरो, हार्वर्ड विश्वविद्यालय

मानव और वानरों के जीववैज्ञानिक समूह को प्राईमेट्स कहा जाता है.

आदमी और औरत दोनों की रीढ़ के निचले हिस्से में एक घुमाव पाया जाता है.

लेकिन हार्वर्ड के शोधकर्ताओं ने पाया कि महिलाओं में यह घुमाव ज़्यादा बड़े हिस्से में होता है.

रीढ़ के घुमाव में इस अंतर के कारण ही औरतों को शरीर के भार का संतुलन बनाने में मदद मिलती है.

यही अंतर उन्हें पीठ की दर्द से भी राहत देती है. यह राहत उन्हें तब भी मिलती है जब गर्भावस्था के अंतिम महीनों में गर्भ का वजन 7 किलोग्राम तक पहुँच जाता है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर यह परिवर्तन सीधे तौर पर आता तो हमारे कुछ प्रागैतिहासिक पूर्वजों में भी यह लक्षण मिलता.

दो पैरों वाले मानव के विकास के बाद करीब 20 लाख़ सालों तक जिंदा रहे ऑस्ट्रैलोपिथेकस के मिले अवशेषों में भी आदमी और औरत के बीच यह अंतर मिला है.

सुरक्षित गर्भावस्था

हार्वर्ड में मानव विकास की विशेषज्ञ लीज़ा शैपिरो कहती हैं, "प्राकृतिक रूप से इस अनुकूलन को मदद मिली क्योंकि गर्भवती महिलाओं की रीढ़ पर यह अतिरिक्त दबाव को कम करता है."

वे कहती हैं, "अनुकूलन के बिना गर्भावस्था में पीछे की मांशपेशियों पर बहुत वजन पड़ता जिससे दर्द और थकान होती."

शैपिरो कहती हैं कि अगर ऐसा नहीं होता तो चलने-फिरने में परेशानी होती और दुश्मन से भागने की क्षमता भी कम हो जाती.

वे बताती हैं, "हमारा शोध कहता है कि रीढ़ का ऐसा विकास गर्भावस्था को ज़्यादा सुरक्षित और कम तक़लीफ़देह बनाने के लिए हुआ. अगर अनुकूलन नहीं होता तो ये दिक्कतें होतीं."

लीवरपुल विश्वविद्यालय के रीढ़ विशेषज्ञ डॉ. पीटर डैंगरफील्ड कहते हैं कि तन कर सीधा चलने की दिशा में हुए क्रमिक विकास का मानव पर कई तरह से असर पड़ा है जिसमें कुछ बुरे भी हैं.

वे कहते हैं, "सीधे खड़ा होने के कारण अब साफ तौर पर बुढ़ापा में पीठ दर्द की बीमारियाँ बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं."

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