|
चीन के सामने पर्यावरण की कठिन चुनौती | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चीन की सरकार पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर लंबे समय से अपना रुख़ स्पष्ट नहीं कर रही है. उसके अनुसार देश में पर्यावरण संरक्षण की वजह से आर्थिक विकास की रफ़्तार धीमी होगी. इस साल के शुरू में जलवायु परिवर्तन पर चीन के प्रधानमंत्री विन जियाबाओ ने कहा कि चीन को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काफ़ी कुछ करने की ज़रूरत है. उन्होंने प्रदूषण करने वाले कारखानों को बंद करने और कुछ कड़े क़ानून बनाने का वादा किया था. लेकिन चीन ने अभी तक जलवायु परिवर्तन को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं. पिछले महीने चीन ने घोषणा की थी कि जलवायु परिवर्तन पर एक 'राष्ट्रीय कार्य योजना' लाने में उसे देरी हो रही है. इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बड़ा झटका लगा था. वे आशा कर रहे थे कि चीन ग्लोबल वार्मिंग पर अपनी योजना सामने रखेगा. सबसे बड़ी दिक्कत की बात तो ये है कि चीन ने इस देरी के लिए कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दिया और किसी अगली तारीख़ की घोषणा भी नहीं की. चीनी अधिकारियों ने नए ईंधन-कर को भी मार्च में वापस ले लिया था. उनका कहना था कि इससे देश की आर्थिक प्रगति धीमी होगी. ईंधन-कर लगाने से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आ सकती थी. चीन ने क्योटो संधि पर हस्ताक्षर किया है लेकिन उसने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में ज़रूरी कटौती करने से इनकार कर दिया था. आर्थिक विकास बनाम पर्यावरण
चीन का मानना है कि ऐसा करने से उसके आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा और अर्थव्यवस्था की धीमी प्रगति से बेरोज़गारी और सामाजिक तनाव बढ़ेगा. चीन के नेताओं ने देश की प्रगति को पर्यावरण पर हमेशा प्राथमिकता दी है. विशषज्ञों का कहना है कि जलवायु में हो रहे बदलाव का चीन पर घातक असर होगा. तिब्बत के तेज़ी से पिघलते ग्लेशियरों से इसकी प्रसिद्ध नदियों यलो रिवर और यांग्त्सी का जल स्तर नीचे जाएगा. समुद्र जल के बढ़ते स्तर से देश के तटीय क्षेत्रों पर भी असर पड़ेगा. चीन के बहुत से समृद्ध शहर और राज्य तटीय इलाक़ों में ही बसे हुए हैं. चीन की 40 करोड़ आबादी ज़मीन के बंजर होने की वजह से मुश्किलें झेल रही है. चीन में नए रेगिस्तान बनने की वजह जलवायु परिवर्तन ही है. तापामान में बढ़ोतरी का असर खेती और खाद्यान्नों की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है. असर
चीन में ज़्यादातर लोगों के लिए ग्लोबल वार्मिंग बड़ा मुद्दा नहीं है. वो पर्यावरण की अपेक्षा नौकरी, पैसा, परिवार और लाइफ़स्टाइल को लेकर अधिक चिंतित हैं. ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाला चीन दुनिया का दूसरा बड़ा देश है. इसकी मुख्य वजह चीन का अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए परंपरागत ईंधन पर आश्रित होना है. जिस रफ़्तार से चीन ग्रीन हाउस गैसों का उत्पादन कर रहा है उससे तो यही लगता है कि ज़ल्द ही अमरीका को पछाड़ते हुए चीन पहले नंबर पर पहुँच जाएगा. बिजली के भारी उत्पादन की वजह से चीन की अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही है. इस बिजली का 70 फ़ीसदी हिस्सा कोयले से चलने वाले बिजली घरों में आता है. इसके अलावा देश की सड़कों पर बढ़ती कारों और भारी उद्योगों और कारखानों से होने वाले प्रदूषण से भी ग्रीनहाउस गैसों में इज़ाफ़ा हो रहा है. चीन परमाणु ऊर्जा से और अधिक बिजली बनाना चाहता है और अगले 15 सालों में उसकी 30 और संयंत्र लगाने की योजना है. चीन के नीति निर्माताओं का कहना है कि वो अब बिजली उत्पादन के लिए ग़ैर-परंपरागत स्रोतों जैसे हवा और सौर ऊर्जा का भी सहारा लेना चाहते हैं. चीन नेतृत्व आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के असमंजस में फँसा हुआ है. मौसम बदलाव पर उनके रुख़ का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असर पड़ेगा. अगर चीन ने ज़ल्द ही कोई कार्रवाई नहीं की तो सिर्फ़ चीन ही नहीं बल्कि सारी दुनिया को इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें 'ग्लोबल वार्मिंग के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो'16 जून, 2004 | विज्ञान ग्लोबल वार्मिंग पर मतभेद बरक़रार18 दिसंबर, 2004 | विज्ञान 'जलवायु मुद्दे पर तत्काल उपाय कारगर'04 मई, 2007 | विज्ञान जलवायु परिवर्तन पर पहल की ज़रूरत04 मई, 2007 | विज्ञान नई महामारी की चेतावनी17 मार्च, 2003 | विज्ञान चीन महिला अंतरिक्ष यात्री भेजेगा28 जुलाई, 2004 | विज्ञान चीन का अंतरिक्ष यान सफलतापूर्वक लौटा17 अक्तूबर, 2005 | विज्ञान एक तिहाई चीन में 'तेज़ाबी वर्षा'27 अगस्त, 2006 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||