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'जलवायु मुद्दे पर तत्काल उपाय कारगर' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर थाईलैंड में हो रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रतिनिधि इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि दुनिया के पास बढ़ते तापमान से निपटने के लिए तकनीक भी है और धन भी लेकिन ग्रीन हाउस समूह की गैसों पर नियंत्रण पाने के लिए ज़्यादा और तत्काल स्तर पर प्रयास किए जाने की ज़रूरत है. उधर चीन जैसे कुछ देशों ने ग्रीन हाउस समूह की गैसों पर नियंत्रण पाने के लिए उठाए जाने वाले क़दमों पर यह कहते हुए चिंता जताई है कि उनका आर्थिक विकास पर व्यापक असर पड़ सकता है. जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के पैनल आईपीसीसी का कहना है कि ग़ैरपरंपरागत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने और परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल का दायरा बढ़ने जैसे उपायों के ज़रिए दुनिया भर में तापमान वृद्धि को सिर्फ़ दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित किया जा सकता है. पर्यावरण वैज्ञानिक पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि विकासशील देशों ने भी अगर पश्चिमी देशों की ही तरह अपने यहाँ भी उपभोक्तावादी संस्कृति वाली जीवन शैली बड़े पैमाने पर अपना ली तो यह धरती उसकी मुश्किलों और चुनौतियों का सामना नहीं सर सकेगी. लेकिन चीनी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य झोऊ दादी ने बीबीसी से कहा कि उनका देश ऊर्जा खपत के मामले में अमरीकी जीवन शैली की नक़ल नहीं करना चाहता है. चीन की राजधानी बेजिंग में बीबीसी संवाददाता डेनियल ग्रीफ़िथ्स है कि चीनी नेताओं ने पर्यावरण के मुक़ाबले आर्थिक विकास को हमेशा ही प्राथमिकता दी है. चीन के नेताओं की दलील है कि चीन के लोगों को भी एक दिन उसी जीवन शैली का आनंद लेने लायक स्थिति में पहुँचना चाहिए जो कि यूरोप और अमरीका के देशों में लोग अपना रहे हैं. इन नेताओं ने यह चिंता भी जताई है कि जलवायु परिवर्तन मुद्दे के लिए अगर आर्थिक विकास धीमा पड़ता है तो उससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष फैल सकता है लेकिन रिकॉर्ड तेज़ी के साथ होती चीन की आर्थिक वृद्धि की वजह से वहाँ बहुत से पर्यावरण समस्याएँ खड़ी हो रही हैं. चीन अब ग्रीन हाउस समूह की सबसे ज़्यादा गैसें छोड़ने वाला दुनिया का दूसरा देश बन गया है. दुनिया में सबसे ज़्यादा ग्रीन हाउस गैसें अमरीका छोड़ता है. अनेक विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि ग्रीन हाउस समूह की गैसें छोड़ने के मामले में चीन जल्दी ही पहले स्थान पर आ सकता है. चीन में जलवायु परिवर्तन की समस्या के नतीजे पहले सामने आने लगे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार तिब्बत में ग्लेशियर पिघलने लगे हैं, उत्तरी चीन में रेगिस्तान बढ़ रहा है और पानी की किल्लत होने लगी है और इसमें काफ़ी योगदान जलवायु परिवर्तन की समस्या का ही है. चीन के राजनीतिज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली समस्याओं को पह समझते हैं और इसी की वजह से उन्होंने दस प्रतिशत ऊर्जा ऐसे स्रोतों से पैदा करने की योजना बनाई है जो अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बनती है. चीन के नेता और ज़्यादा परमाणु ऊर्जा रिएक्टर भी बनाने की बात कर रहे हैं. लेकिन बीबीसी संवाददाता का कहना है कि जब तक चीन सरकार मौजूदा आर्थिक नीतियों पर अमल करते रहेंगे तब तक उन उपायों का कोई ख़ास असर नज़र नहीं आने वाला है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'इस बार सामान्य से कुछ कम बारिश'19 अप्रैल, 2007 | विज्ञान वनों से बढ़ता पृथ्वी का तापमान!10 अप्रैल, 2007 | विज्ञान जलवायु परिवर्तन का असर करोड़ों पर06 अप्रैल, 2007 | विज्ञान ब्रिटेन में कार्बन प्रदूषण में कमी की पहल13 मार्च, 2007 | पहला पन्ना 'युद्ध जितना ख़तरनाक है जलवायु परिवर्तन'02 मार्च, 2007 | पहला पन्ना बढ़ते पारे के लिए मानव ज़िम्मेदार02 फ़रवरी, 2007 | विज्ञान जलवायु परिवर्तन के 'गंभीर परिणाम' होंगे15 मई, 2006 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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