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मलेरिया की दवा बनेगी असरदार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैज्ञानिकों ने मलेरिया की बेअसर हो चुकी एक दवा में नई जान फूँकने का तरीका ढूँढ निकाला है. क्लोरोक़्विन 1950 के दशक में मलेरिया के ख़िलाफ़ बहुत ही कारगर दवा मानी जाती थी लेकिन मलेरिया फैलाने वाले परजीवी प्लाज़मोडियम फ़ाल्सिपैरम ने धीरे-धीरे इसके ख़िलाफ़ अपनी ताक़त बढ़ा ली. अब ऑस्ट्रेलिया में जीव विज्ञानियों ने पाया है कि एक अन्य दवा प्राइमाक़्विन के साथ मिलाने से क्लोरोक़्विन असरदार दवा हो जाती है. इन दिनों मलेरिया का जो उपचार उपलब्ध है वह बहुत ही महँगा है. इसलिए ग़रीब देशों को इसका फ़ायदा नहीं मिल रहा है, जबकि उन्हें ही दवा की ज़्यादा ज़रूरत है. दूसरी ओर क्लोरोक़्विन इस समय प्रचलित मलेरियारोधी दवाओं के मुक़ाबले बहुत ही सस्ती दवा मानी जाती है. यह मलेरिया परजीवी को मानव रक्त को प्रदूषित करने से रोकती है. मेलबोर्न में ला ट्रोब विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में क्लोरोक़्विन और प्राइमाक़्विन के मिश्रण को मलेरिया परजीवी पर बहुत ही असरदार पाया है. अध्ययन में शामिल वैज्ञानिक डॉ. लिएन टिल्ले ने कहा है कि जल्दी ही नई मिश्रित दवा का रोगियों पर परीक्षण शुरू किया जाएगा. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित परीक्षण इंडोनेशिया में किए जाने की संभावना है. ला ट्रोब विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक दल की अध्ययन रिपोर्ट न्यू साइंटिस्ट पत्रिका में प्रकाशित की गई है. |
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