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मच्छर पर मछली से क़ाबू
भारत में मलेरिया एक ऐसी बीमारी है जो कहीं भी और कभी भी हो सकती है क्योंकि मच्छर हर जगह होते हैं और मलेरिया मच्छरों से ही फैलता है. भारत में मलेरिया पर क़ाबू पाने के प्रयास में देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा ख़र्च होता है. लेकिन अब भारतीय वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि मछली के प्रयोग से मलेरिया को फैलने से रोकने में कामयाबी मिली है. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों का दावा है कि कुछ इलाक़ों में जलाशयों में मछली की कुछ ख़ास जातियाँ छोड़ी गई हैं जिन्होंने मच्छरों का काफ़ी हद तक सफ़ाया कर दिया है. यह मछली एक ख़ास क़िस्म की जाति है जो तालाबों, नदियों और कुँओं में मच्छरों को खा जाती है. नया प्रयोग भारतीय वैज्ञानिकों ने चार राज्यों में यह प्रयोग किया है और चंडीगढ़ में भारतीय विज्ञान काँग्रेस में इसका विवरण पेश किया गया.
इसमें कहा गया है कि ये मछलियाँ मच्छरों के अंडों से निकलने वाले बच्चों को ही खा जाती है. भारतीय मलेरिया शोध संस्थान के पूर्व निदेशक डॉक्टर वीपी शर्मा का कहना था कि चार राज्यों में इसके अच्छे नतीजे रहे हैं और मलेरिया के मामले काफ़ी हद तक कम हुए हैं. "पहले मलेरिया के क़रीब बीस लाख मामले होते थे जो घटकर 18 लाख पर आ गए हैं." इस सफलता से उत्साहित होकर विश्व बैंक ने सौ ज़िलों में मछली के ज़रिए मलेरिया के उन्मूलन का कार्यक्रम बनाया है और असल नतीजे आने में क़रीब पाँच साल का वक़्त लग सकता है. डॉक्टर शर्मा ने कहा कि हालाँकि इस प्रयोग से कई स्थानों पर मच्छरों का सफ़ाया हुआ है लेकिन ज़रूरी नहीं कि यह प्रयोग हर जगर कामयाब ही हो. मच्छरों पर क़ाबू पाने के लिए रसायनों का ही ज़्यादा इस्तेमाल होता रहा है और एक ख़ास रसायन डीडीटी पिछली सदी से इस्तेमाल होता रहा है जो काफ़ी असरदार होता था. लेकिन अब मच्छरों पर अब इसका असर होना कम हो गया है इसलिए मछली मैदान में आई है. |
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