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झूठों का सफ़ेदी से ताल्लुक! | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक शोध में कहा गया है कि जो लोग आदतन झूठ बोलते हैं उनका दिमाग़ उन लोगों से भिन्न होता है जो ईमानदार होते हैं और सच बोलते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ सदर्न कैलीफ़ोर्निया के वैज्ञानिकों ने 49 लोगों के व्यवहार का अध्ययन किया और पाया कि जो लोग झूठ बोलने के आदी थे उनके दिमाग़ में सच बोलने वालों से 26 प्रतिशत ज़्यादा सफ़ेद द्रव्य था. शोध में कहा गया है कि सफ़ेद द्रव्य दिमाग़ में सोचने की प्रक्रिया से संबंधित होता है और इसी की क्षमता के साथ झूठ बोला जा सकता है. लेकिन शोध दल ने यह भी बताया है कि तंत्रिका विज्ञान के नज़रिए से झूठ बोलने की वजह और ज़्यादा जटिल हो सकती है जो दिमाग़ के सिर्फ़ एक क्षेत्र में परिवर्तन की वजह से नहीं होती. यह शोध ब्रिटेन की एक पत्रिका जर्नल ऑफ़ साइकिएट्री में प्रकाशित हुआ है. शोध के लिए लॉस एंजल्स में पाँच अस्थाई रोज़गार एजेंसियों से लोगों को चुना गया और उनके तीन अलग दल बनाए गए. पहले दल में 12 ऐसे लोगों को रखा गया जो रोग विज्ञान के नज़रिए से झूठ बोलने के आदी थे. दूसरे दल में 21 ऐसे लोग थे जिनका झूठ बोलने का या असामाजिक व्यवहार का कोई इतिहास नहीं था. तीसरे दल में 16 ऐसे लोगों को रखा गया जिनकी पृष्ठभूमि असामाजिक व्यवहार और व्यक्तित्व दोष की थी लेकिन रोग विज्ञान की दृष्टि से उनकी झूठ बोलने की कोई पृष्ठभूमि नहीं थी. इन सबके मस्तिष्क का यह जानने के लिए अध्ययन किया गया कि उसमें क्या-क्या परिवर्तन होते हैं. शोध के लिए एक सूची बनाई गई जिसमें बीमारी के फ़ायदे उठाने के लिए झूठ बोलने, धोखाधड़ी करने या फिर लोगों के साथ चालाकी वाला बर्ताव करने जैसी आदतें शामिल की गईं. इन्हीं आदतों वाले लोगों के दिमाग़ों में सफ़ेद और धुंधले (ग्रे) रंग के द्रव्य कितनी मात्रा में हैं. झूठ बोलने वाले लोगों के दिमाग़ में उन लोगों के मुक़ाबले 22 से 26 प्रतिशत ज़्यादा सफ़ेद द्रव्य था जिनका झूठ बोलने का कोई इतिहास नहीं रहा है. हालाँकि इन नतीजों का विश्लेषण उम्र, जातीयता, बुद्धिमत्तता और सिर की चोट के आधार पर नहीं किया गया. शोधकर्ताओं का कहना है कि जो लोग झूठ बोलते हैं, धोखाधड़ी करते हैं या फिर चालाकी करते हैं उनके मस्तिष्क में असामान्यता साबित करने वाला यह पहला शोध है. |
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