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दर्द घटाती है, दर्द कम होने की सोच | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में विशेषज्ञों के अनुसार इस बात के पुख़्ता वैज्ञानिक सबूत मिले हैं कि सकारात्मक सोच के ज़रिए दर्द पर काबू पाया जा सकता है. सकारात्मक सोच को दर्दनिवारक मॉरफ़िन की सुई के बराबर प्रभावी पाया गया है. वेक फ़ॉरेस्ट विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार यदि दर्द के कम होने की बात सोची जाए तो इतना भर से भी दर्द सचमुच में कम हो जाता है. डॉ. रॉबर्ट कोगिल और उनकी टीम ने अपने अध्ययन में 10 स्वस्थ लोगों को शामिल किया. अध्ययन के दौरान इन लोगों के पैरों पर तापमान देने वाले एक उपकरण के ज़रिए गर्मी दी गई ताकि दर्द उत्पन्न हो सके. साथ ही इन लोगों के मस्तिष्क की चुंबकीय स्कैनिंग की गई यह देखने के लिए मस्तिष्क का कौन सा हिस्सा कैसी प्रतिक्रिया करता है. प्रयोग में यह पाया गया कि कई बार दर्द बढ़ाने के बावजूद तंत्रिकाओं ने मस्तिष्क को कम दर्द जैसा संकेत भेजा. अध्य्यन में शामिल लोगों ने जब कम दर्द की उम्मीद की तो उन्हें क़रीब 28 प्रतिशत कम दर्द महसूस हुआ. दर्द में यह कमी वैसी ही थी जैसा कि दर्दनिवारक सुई या गोली लेने पर देखी जाती है. इसके साथ ही दर्द के अनुभव से जुड़े मस्तिष्क के हिस्सों की गतिविधियों में भी कमी देखी गई. डॉ. कोगिल के अनुसार प्रयोग से ज़ाहिर है कि दर्द मात्र शरीर के चोटिल हिस्से से मस्तिष्क को मिलने वाले संकेतों पर ही निर्भर नहीं करता है. उन्होंने कहा, "दर्द से सिर्फ़ दवा से नहीं निपटा जाना चाहिए. मस्तिष्क में दर्द को तय करने की क्षमता होती है और हमें इसकी शक्ति का दोहन करना चाहिए." उन्होंने कहा कि नया अध्ययन संज्ञानात्मक उपचार की उपयोगिता को रेखांकित करता है. |
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