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भावनाओं से दमा बढ़ सकता है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी वैज्ञानिकों ने कहा है कि उनके पास ऐसे ठोस सबूत हैं जिनसे साबित होता है कि कुछ ख़ास तरह की भावनाओं से ऐज़मा यानी दमा की बीमारी के हमले का ख़तरा बढ़ सकता है. विस्काँसिन-मैडीसन विश्वविद्यालय के एक दल ने मस्तिष्क के दो ऐसे क्षेत्रों का पता लगाया है जो आपस में जुड़े हुए होते हैं और भावनात्मक शब्दों को पढ़ते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इनमें से एक क्षेत्र दमे के लक्षणों के बारे में सूचनाएँ ग्रहण करने का काम करता है और दूसरा क्षेत्र भावनाओं को ज़ाहिर करता है. डॉक्टर रिचर्ड डेविडसन और उनके दल ने छह ऐसे मरीज़ों से अपने प्रयोग में हिस्सा लेने की गुज़ारिश की जिन्हें हल्के स्तर का दमा था. हर व्यक्ति को विभिन्न शब्दों की तीन श्रेणियाँ दिखाई गईं. मसलन दमा से संबंधित शब्द जैसे कि 'साँस लेने में कठिनाई'. दूसरे, ऐसे शब्द जो नकारात्मक हों लेकिन दमा से संबंधित नहीं जैसे कि 'अकेलापन'. और तीसरे, तटस्थ शब्द जैसे कि 'पर्दे'. साथ ही इन मरीज़ों को दमा की स्थिति में साँस लेने में मदद देने वाली दवाई भी दी गई जिसे नाक से लगाकर ज़ोर से साँस खींची जाती है. भावनात्मक तत्व इस प्रयोग के दौरान इन मरीज़ों के मस्तिष्क में होने वाली हलचल पर निगरानी रखी गई. जब दमा से संबंधित शब्द बोले गए तो मस्तिष्क के दो क्षेत्रों - कोर्टेक्स और इंसुला में हलचल में तेज़ी हुई जबकि बाक़ी दो श्रेणियों के शब्द बोले जाने के समय कम हलचल हुई.
शोधकर्ताओं का कहना है कि चूँकि उनके प्रयोग में बहुत कम लोगों ने हिस्सा लिया इसलिए इस प्रयोग को दोहराए जाने की ज़रूरत है और हो सकता है कि मस्तिष्क के कुछ अन्य हिस्से भी दमा और भावनाओं के इस संबंध की प्रक्रिया में शामिल हों. हालाँकि शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि हो सकता है कि मस्तिष्क के ये हिस्से किसी ख़ास बीमारी से संबंधित भावनाओं के लिए अतिसंवेदनशील हों. ब्रिटिश फेफड़ा संस्थान के चेयरमैन डॉक्टर मार्क ब्रिटन का कहना था, "ये दिलचस्प नतीजे हैं. हमें यह तो जानकारी रही है कि दमा और मरीज़ का व्यक्तित्व और भावनाएँ एक दूसरे से काफ़ी निकट से जुड़ी हुई होती हैं. लेकिन इसमें आगे कोई शोध नहीं हुआ था." डॉक्टर मार्क ब्रिटन का कहना था कि अक्सर दमा के किसी मरीज़ को यह सलाह देना लाभदायक हो सकता है कि अगर वे मानसिक दबाव और तनाव महसूस करते हैं तो ऐसी स्थिति उनके मर्ज़ के लिए ख़तरनाक साबित हो सकती है. "अगर आपको अपनी बीमारी की गहराई से जानकारी हो तो आपको उसका मुक़ाबला करने में मदद मिलती है." ऐज़मा यूके नामक संगठन के डॉक्टर लाइन स्मर्थवैट का कहना था, "यह सब जानते हैं कि मानसिक दबाव और तनाव से दमा और ख़तरनाक होता है और जब दमा बढ़ता है तो उससे मानसिक दबाव बढ़ता है." "हमारा शोध दिखाता है कि दमा के मरीज़ों में से 69 प्रतिशत कहना है कि मानसिक दबाव से उनके लक्षण और बढ़ते हैं और यह ताज़ा शोध दिखाता है कि मस्तिष्क के उन दो हिस्सों में वाक़ई एक संबंध है जो भावनाओं के संदेशों को लाता ले जाता है और जो दमा के लक्षणों को ज़ाहिर करता है." |
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