घर की याद सताती है तो क्या करते हैं आप?

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बचपन या लड़कपन में लोग जब घर से दूर जाते हैं तो उन्हें घर की याद सताती है. कभी पढ़ाई के लिए बोर्डिंग स्कूल या किसी दूसरे देश की यूनिवर्सिटी में एडमिशन होता है.
तो बच्चे अपने घर रुआंसे होकर फ़ोन करते हैं कि बहुत याद आ रही है. इसे अंग्रेज़ी में 'होमसिकनेस' कहते हैं.
अक्सर माना जाता है कि ये दिक़्क़त बच्चे और किशोर ही झेलते हैं. बड़े होने के बाद लोगों को यह परेशानी नहीं होती. मगर ऐसा है नहीं.
19वीं सदी में बहुत से लोगों को विदेश जाना पड़ता था, कमाई के लिए, जंग के लिए. 19वीं सदी में बड़ी तादाद में लोग यूरोप से अमरीका आ रहे थे.
इन लोगों को अपने पुराने शहर, परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों की याद सताती थी. इसे अच्छा माना जाता था. कहते थे कि लोग अपनों से जुड़ाव महसूस करते हैं, तभी उनकी याद आती है. ये भावुकता की निशानी था.
अमरीकी लेखिका सूसन जे मैट ने, 'होमसिकनेस: एन अमेरिकन हिस्ट्री' नाम से किताब लिखी है. सूसन बताती हैं कि 'होमसिकनेस' शब्द 1750 तक चलन में नहीं था. इससे पहले घर की याद आने को बीमारी माना जाता था.
मगर आज घर की याद आने को तनाव की निशानी माना जाता है. तनाव, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आए बदलाव की वजह से पैदा होता है. मगर इस टेंशन को आज काफ़ी गंभीरता से लिया जा रहा है.
ख़ासतौर से तब और, जब लोग घर की याद आने की तकलीफ़ की वजह से पढ़ना छोड़ देते हैं.

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जानकार कहते हैं कि ऐसे हालात से निपटने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि आप वह काम करें, जो घर-बार छोड़ने से पहले करते थे. ऐसी कई क़िताबें हैं जिन्हें पढ़ने से 'होम सिकनेस' दूर होगी.
ऐसी ही क़िताब है लॉरी ली की 'सेडार विद रोज़ी'. जिसमें लेखक ने अपने बचपन की यादों का ज़िक्र किया है. ये उस दौर की यादें हैं जब न कारें थीं और न बिजली. बच्चों को अपना मन बहलाने का इंतज़ाम भी ख़ुद करना होता था. क़िताब में यादों को इतने बेहतरीन ढंग से बयां किया गया है कि आपको पढ़ते हुए अपने घर जाने का अहसास होगा.
घर से दूर जाने पर लोग कई चीज़ें मिस करते हैं. किसी को अपनी प्यारी बिल्ली की याद सताती है, तो किसी को अपने शहर की गलियों की याद आती है. इसके लिए एक किताब है 'काफ़्का ऑन द शोर'.
इसे हारुकी मुराकामी ने लिखा है. इसमें काफ़्का नाम 15 साल के एक लड़के का है जो घर से भाग गया है. लेकिन क़िताब में एक और किरदार है नकाटा नाम का. वह बुज़ुर्ग है. उसे बिल्लियों से बात करने का ख़ब्त है.
इसकी मदद से वो गुम हो गई बिल्लियों को खोज निकालता है. काफ़्का और नकाटा दोनों अपने घरों से दूर हैं. मगर जब एक दूसरे से मिलते हैं, तो सफ़र दोनों के लिए आसान हो जाता है.
दोनों मिलकर ख़ूब मौज-मस्ती करते हैं. यह किताब भी आपकी 'होमसिकनेस' दूर करेगी.

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घर से दूर अपने घर की याद सताए तो आप एक और किताब पढ़कर राहत महसूस कर सकते हैं. इसका नाम है 'द मास्टर एंड द मार्गरिटा'. इसे लिखा है मिखाइल बुल्काकोव ने.
यह 2000 सालों के फ़ासले पर दो अलग-अलग कहानियों का मेल है. एक कहानी येरुशलम की है, तो दूसरी मॉस्को की है.
मगर इतने विस्तार से इन शहरों के बारे में लिखा गया है कि आप कहीं के भी हों, ख़ुद को घर के बेहद क़रीब महसूस करेंगे.
किसी भी मुश्किल वक़्त में किताबें आपकी सच्ची साथी हो सकती हैं. घर से दूर होने पर घर की याद आ रही हो तो भी. और नए शहर या नए देश के माहौल से तालमेल बैठाने में दिक़्क़त हो रही हो तब भी.
किताबों, कहानियों, उपन्यासों के तमाम किरदार ऐसे होते हैं, जो आपको अपने किसी साथी की, घर के सदस्य की या फिर अपने पालतू जानवरों की याद दिलाते हैं.
यह ख़ूबसूरत अहसास आपके घर से दूर होने के दर्द को कम कर देता है.
अमरीकी उपान्यासकार इज़ाबेल एलेंडे इसकी बेहतरीन मिसाल हैं. वह 30 साल से अपने वतन चिली से दूर हैं. अमरीका में रहती हैं, अंग्रेज़ी में लिखती हैं. मगर उन्हें जब भी मौक़ा मिलता है, वह अपनी पैदाइशी ज़ुबान स्पेनिश में लिखकर सुकून पाती हैं.
इज़ाबेल का नया नॉवेल, 'द जापानीज़ लवर' दो महिलाओं के एक-दूसरे से जुड़ाव की कहानी है. दोनों महिलाएं एक-दूसरे से एकदम अलग हैं. उम्र का, रहन-सहन, रीति-रिवाज़, हर तरह का फ़र्क है दोनों में सिर्फ़ एक ही बात कॉमन है. दोनों ही पूर्वी यूरोप से अमेरिका आई हैं.

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एक का मुल्क पॉलैंड है, तो दूसरी रोमानिया की है. पड़ोसी मुल्कों की होने की वजह से दोनों दूसरे वतन में एक-दूसरे से जुड़ाव महसूस करती हैं.
भारतीय मूल की लेखिका झुम्पा लाहिड़ी की क़िताब 'द नेमसेक' भी कुछ ऐसी ही कहानी कहती है. बंगाली लड़की आशिमा शादी के बाद अपने घर से दूर अमरीका के कैम्ब्रिज शहर में रहने आती है.
घर की याद दूर करने के लिए वह वहां के व्यंजन बनाती है. समोसा, आलू गोभी और लस्सी की मदद से वह घर की याद की तकलीफ़ से जूझती है. इस पर हॉलीवुड में फ़िल्म भी बनी थी. जिसमें तब्बू और इरफ़ान ख़ान ने काम किया था.
घर की याद जब आती है, तो सबसे ज़्यादा याद आता है खाना. मां के हाथ का खाना, बहन की बनाई कढ़ी. आज ऐसे क़िस्से बयां करने वाली किताबों का ख़ूब चलन है.
ऐसी शुरुआती किताबों में एक थी, 'एप्रिकॉट्स ऑन द नाइल'. इसे कॉलेट रोज़ां ने लिखा था. इसमें फ्रेंच मूल की लेखिका ने अपने बचपन की यादें लिखी हैं. जिसे घर से दूर, मिस्र की राजधानी काहिरा में रहने को मजबूर होना पड़ा था, अपने दादा-दादी के साथ.

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घर की यादों से पीछा छुड़ाने के लिए वो अपने दादा-दादी के यहां काम करने वालों से जुड़ने की कोशिश करती है. ऐसे ही उसका दोस्त बनता है रसोइया. जो वहां तैयार होने वाले व्यंजनों को बनाने का तरीक़ा बताता है. उसे सबसे पहले चखने का मौक़ा देता है.
धीरे-धीरे उसे अपने नए घर से प्यार हो जाता है. मगर इस वजह से वह अपने फ्रांस के घर में बिताया वक़्त भूल जाती है.
बरसों बाद जब लेखिका बड़ी होती है. तो काहिरा से दूर होने पर उसे काहिरा की याद सताती है. वो उन व्यंजनों को तैयार करती है, जो बचपन में मिस्र के रसोइये ने उसे सिखाए थे.
ये कहानी आपको बार-बार बताती है कि जिस पल भी आप जी रहे हैं, उनकी यादों को संजोते जाइए. किसी भी जगह जाएं, वहां के खानपान को अपनाएं ताकि जब उस माहौल से दूर जाएं, वहां की याद सताए, तो उन तजुर्बों की मदद से आप उन यादों को फिर से जी सकें.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/culture/story/20160308-how-can-i-cure-my-homesickness" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी क्लचर</caption><url href="http://www.bbc.com/culture" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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