अजनबी के पैर धोकर चूमने का मतलब क्या है

पोप फ़्रांसिस, पैर धोते-चूमते हुए

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किसी का सम्मान करने के लिए उसके पैर धोने का रिवाज बहुत पुराना है. और किसी के पैर धोकर अगर आप चूम लेते हैं तो उससे बेहद क़रीबी ताल्लुक़ का एहसास होता है. अभी कुछ दिन पहले पोप फ्रांसिस ने रोम में कुछ ईसाइयों और ग़ैर ईसाइयों के पैर धोकर चूमे. इन तस्वीरों की पूरी दुनिया में ख़ूब चर्चा हुई.

पोप फ्रांसिस के इस काम से लोगों को 1925 में फ़िलिस्तीन में बनी एक पेंटिंग की याद आ गई.

कैथोलिक ईसाइयों के धर्म गुरू पोप हर साल ईस्टर से तीन दिन पहले यानी 'होली थर्सडे' को पैर धोने का ये रिवाज निभाते हैं. ये रिवाज ईसा की याद में निभाया जाता है. ईसा ने आख़िरी भोज या 'लास्ट सपर' से पहले बारह दूतों के पांव धोए थे.

पोप फ़्रांसिस, पैर धोते-चूमते हुए

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यूं तो पोप हर साल लोगों के पांव धोते हैं. मगर इस बार इस रिवाज को निभाने में कुछ बातें ख़ास थीं. पहली बार पोप ने किसी महिला के पांव धोए.

पैर धोने और चूमने की ये धार्मिक क्रिया, पोप ने, ब्रसेल्स के आतंकी हमले के ठीक दो दिन बाद निभाई. सबसे ख़ास बात ये थी कि इस बार पोप ने जिन बारह लोगों के पांव धोए, उनमें बाहर से यूरोप आए शरणार्थी थे. तीन मुसलमान थे जो माली, पाकिस्तान और सीरिया से आए थे.

कैथोलिक ईसाइयों के धर्म गुरू पोप के कुछ सामान्य लोगों के पांव धोने और चूमने की तस्वीरें, ऊंच-नीच, छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब की बहुत सी सोचों को तोड़ती है.

पोप फ़्रांसिस, पैर धोते-चूमते हुए

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ये मैरी के अपने आंसुओं और इत्र से ईसा के पांव धोने की तस्वीर ज़ेहन में ज़िंदा करती है. यही नहीं ये ईसा के अपने देवदूतों के पांव धोने की घटना की भी याद दिलाती है.

बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट में दर्ज इस घटना को कमोबेश हर बड़े कलाकार ने तस्वीरों में बयां किया है. बरसों-बरस ऐसी पेंटिंग्स देख-देखकर ये घटना लोगों के ज़ेहन में रच-बस गई है. लेकिन पोप के लोगों के पांव धोने की घटना से 1925 की एक पेंटिंग की याद आई है.

ये पेंटिंग ब्रिटिश कलाकार डेविड बोमबर्ग ने बनाई थी. जिसमें दो बुर्क़ापोश हैं. एक पांव धो रहा है, दूसरा पैर धुलवा रहा है. ये आज के दौर में नक़ाबपोश चरमपंथियों की याद दिलाता है.

1925 की एक पेंटिंग

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डेविड बोमबर्ग ने ऐसी ही घटना, यरुशलम के आर्मेनियन चर्च में देखी थी. जिसमें एक बिशप, यरुशलम के पैट्रिआर्क के पैर धोते हैं.

इस घटना की तस्वीर बनाने वाला कलाकार ही शक के दायरे में आ जाता है. क्योंकि वह पैर धोने की इस घटना का बिन बुलाया गवाह बन जाता है.

अब बोमबर्ग की पेंटिंग और पोप फ्रांसिस का सदियों पुराना रिवाज निभाना. ये दोनों तस्वीरें हमें ये एहसास दिलाती हैं कि परोपकार के काम से हमें अपनी आत्मा की गंदगी को धोने की कोशिश करनी चाहिए.

(अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/culture/story/20160401-what-it-means-to-kiss-a-strangers-feet" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कल्चर</caption><url href="http://www.bbc.com/culture" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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