महिलाओं और पुरुषों में आम तौर पर होने वाले पाँच कैंसर कौन से हैं?

कैंसर सेल्स

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में हर नौ में से एक व्यक्ति को कैंसर होने का ख़तरा होता है, वो चाहे महिला हो या पुरुष. - ये बात भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और नेशनल सेंटर फ़ॉर डिजीज़ इन्फॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च (एनसीडीआईआर) के शोध में सामने आई है.

पिछले साल लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस पार्टी से सांसद नुसरत जहां ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री से भारत में कैंसर पीड़ितों और उससे हुई मौतों से जुड़ा एक सवाल पूछा था.

इसके जवाब में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री डॉ. भारती प्रवीण पवार ने जवाब दिया था कि भारत में साल 2022 में कैंसर के 14,61427 मामले थे, जो पिछले दो साल के मुक़ाबले अधिक हैं.

साल 2021 में भारत में कैंसर के 14,26447 मामले सामने आए थे, वहीं साल 2020 में 13,92,179 लोग कैंसर से पीड़ित बताए गए थे.

ग़ौरतलब है कि ये आँकड़े सरकार नेशनल कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के तहत इकट्ठा करती है.

वहीं पिछले पाँच सालों के आँकड़ों पर अगर नज़र डालें, तो भारत में कैंसर से होने वाली मौत का आँकड़ा भी बढ़ा है.

आईसीएमआर-एनसीडीआईआर के शोध के मुताबिक़ महिलाओं में जहां ब्रेस्ट या स्तन कैंसर के सबसे अधिक मामले सामने आते हैं, वही पुरुषों में लंग या फेफड़ों का कैंसर सबसे ज़्यादा पाया जाता है.

वीडियो कैप्शन, जागरुकता बढ़ाने के लिए चार फ़रवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है.
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क्या कहते हैं डॉक्टर?

डॉक्टरों का कहना है कि कई ऐसे कैंसर होते हैं, जिनका पता शुरुआत में ही चल जाता है, लेकिन कई कैंसर 'साइलेंट' होते हैं, जिनके बारे में आख़िरी स्टेज में आकर पता चलता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन और ग्लोबोकैन के 2020 के डेटा के अनुसार जहाँ महिलाओं में स्तन, सर्वाइकल, गर्भाश्य ग्रीवा, अंडाशय, लिप, ओरल कैविटी और बड़ी आंत के कैंसर के सबसे ज़्यादा मामले सामने आते हैं, वहीं पुरुषों में लिप, ओरल कैविटी, फेफड़ों का कैंसर, पेट का कैंसर, बड़ी आंत का कैंसर और खाने की नली का कैंसर आम तौर पर पाया जाता है.

ग्लोबोकैन 2020, 185 देशों में 36 प्रकार के कैंसर से प्रभावितों और मृतकों के आंकड़े देने और आकलन करने वाली एक ऑनलाइन डेटाबेस कंपनी है.

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महिलाओं में होने वाले पाँच बड़े कैंसर

ब्रेस्ट या स्तन कैंसर

कैंसर विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अब युवा महिलाओं में भी स्तन कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं.

स्त्री रोग और कैंसर विशेषज्ञ डॉ स्वस्ति बताती हैं कि स्तन कैंसर जेनेटिक होता है यानी अगर परिवार में किसी महिला को स्तन कैंसर हुआ होता है, तो ऐसे में वो जीन अगली पीढ़ी में आ सकते हैं. युवा महिलाओं में ये स्तन कैंसर का कारण बनते हैं.

भारत में स्तन कैंसर को लेकर कई वर्षों से जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनमें ये भी बताया जाता है कि कैसे महिलाएं घर पर रहकर भी इसकी जाँच कर सकती है.

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घर पर कैसे की जाती है जाँच?

  • 18 साल की उम्र के बाद हर लड़की ख़ुद ये जाँच कर सकती है.
  • माहवारी ख़त्म होने के बाद अपनी चार उंगलियों से स्तन में गाँठ की जाँच करें. कांख को दबाकर गाँठ की जाँच करें.
  • निपल को दबाकर देखें कि कुछ डिस्चार्ज (स्राव) तो नहीं निकल रहा.
  • अगर किसी लड़की या महिला के परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का मामला पहले आ चुका है, जिसमें माँ को 35 की उम्र में ही ब्रेस्ट कैंसर हुआ हो, तो ऐसे में बेटी की जाँच छह-सात साल पहले ही शुरू कर दी जाती है.
  • हर महिला को 40 साल की उम्र के बाद मेमोग्राफी करानी चाहिए.

अगर ऐसा कुछ दिखे, तो तुरंत जाँच करानी चाहिए.

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सर्वाइकल कैंसर या गर्भाशय ग्रीवा कैंसर

ये महिलाओं में होने वाला दूसरा बड़ा कैंसर है. इसे बच्चेदानी के मुँह का कैंसर भी कहा जाता है.

इस कैंसर का कारण ह्यूमन पेपीलोमा वायरस (एचपीवी) होता है और विशेषज्ञ बताते हैं कि इस कैंसर की शत प्रतिशत रोकथाम की जा सकती है.

टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह ने सर्वाइकल कैंसर से रोकथाम के लिए एचपीवी वायरस के टीके को यूनिवर्सल इम्यूनाइज़ेशन कार्यक्रम में शामिल करने की सिफ़ारिश भी है.

इसमें कहा गया है कि 9-14 साल की किशोरियों को ये टीके दिए जाने चाहिए.

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शुरुआत में इस कैंसर के कोई लक्षण नहीं होते, लेकिन अगर लक्षण दिखें तो इसे नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए.

इस वायरस को कैंसर बनने में लंबा वक़्त लगता है और पेपस्मियर टेस्ट के ज़रिए इसका पता चल सकता है.

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ओवरियन या अंडाशय का कैंसर

ये कैंसर आख़िरी स्तर यानी स्टेज तीन या चार में पता चल पाता है, इसलिए इसे 'साइलेंट कैंसर' भी कहा जाता है.

डॉ स्वस्ति कहती हैं, "इस कैंसर का कोई लक्षण नहीं होता. महिलाओं को आमतौर पर पेट फूलना, भूख न लगना, उल्टियाँ होना, गैस पास न कर पाना या शौच न जा पाने जैसी परेशानियाँ पेश आती हैं. ऐसी समस्या उन्हें केवल एक महीने के लिए होती है. लेकिन जाँच करवाने पर ये अंडाशय का कैंसर भी हो सकता है."

वे बताती हैं, "जब डॉक्टर ऐसी महिलाओं की मेडिकल हिस्ट्री में जाते हैं, तो पता चलता है कि वो दो रोटी की जगह एक रोटी खाती थीं, ज़्यादा हजम नहीं कर पाती थी और घरेलू इलाज ही करवाती थीं."

ऐसे में वे सलाह देती हैं कि महिलाओं को हर साल अल्ट्रासाउंड करवा लेना चाहिए ताकि अगर अंडाशय में सिस्ट हो तो पता चल जाए और इलाज समय से शुरू किया जा सके.

इसके अलावा महिलाओं में लिप, ओरल कैविटी और कोलोरेक्टम यानी बड़ी आंत का कैंसर भी आम हैं, जो पुरुषों में भी पाया जाता है. इनके बारे में नीचे जानकारी दी जा रही है.

कैंसर की जाँच

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पुरुषों में होने वाले कैंसर

लिप, ओरल कैविटी कैंसर या मुंह का कैंसर

हेड एंड नेक सर्जन एंड ऑनकोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ अरोड़ा बताते हैं कि लिप और ओरल कैविटी कैंसर 90 प्रतिशत उन लोगों में पाया जाता है, जो तंबाकू का सेवन करते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि इस कैंसर का मुख्य कारण तंबाकू (किसी भी प्रकार से सेवन) और शराब पीना है.

ये कैंसर मुंह के अंदर अलग-अलग जगहों जैसे गाल, जीभ, जीभ के नीचे का हिस्सा, तालू में हो सकता है. यहाँ अल्सर या छाला बन जाता है और जो दवाएँ खाने के बावजूद ठीक नहीं होता है.

कैंसर विशेषज्ञ डॉ राशि अग्रवाल बताती हैं, "जैसे आपकी जीभ कट जाए या दाँत से मुँह का हिस्सा कट जाए और वो दवाएँ खाने के बाद भी तीन हफ़्ते तक ठीक न हो तो ये चिंता का सबब बन जाता है. वहीं कई बार दांत ढीला हो कर टूट कर गिर जाना क्योंकि वहाँ घाव होता है."

डॉ. सौरभ अरोड़ा बताते हैं, "इसके अलावा आपके मुंह में कोई ग्रोथ हो जाए लेकिन कोई ज़रूरी नहीं है वो कैंसर हो लेकिन इसकी जाँच करवा लेनी चाहिए. साथ ही कई बार मुंह खोलने में दिक़्क़त आने लगती है तो ये भी इस कैंसर का लक्षण होता है."

इसके अलावा जब स्थिति बिगड़ने लगती है, तब घाव से ख़ून आना, आवाज़ में बदलाव होना, दर्द की वजह से खाना खाने में दिक़्क़त और वज़न घटने लगता है.

अगर ऐसे संकेत दिखाई देते हैं और दवा लेने के बावजूद तीन हफ़्ते तक ये ठीक नहीं होता है, तो डॉक्टर की सलाह तुरंत लेनी चाहिए.

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लंग या फेफड़ों का कैंसर

डॉक्टरों का कहना है कि इस कैंसर को लोग टीबी से भी जोड़ लेते हैं क्योंकि इसमें मरीज़ को खाँसी की शिकायत ज़्यादा रहती है.

लेकिन अगर ये सारे लक्षण तीन हफ़्ते तक बने रहते हैं और दवा लेने के बावजूद असर न हो, तो डॉक्टर बॉयोप्सी की सलाह देते हैं लेकिन इससे घबराना नहीं चाहिए.

डॉक्टरों का कहना है कि इसके होने का मुख्य कारण धूम्रपान है वहीं अब प्रदूषण को भी इसके कारण के तौर पर देखा जा रहा है. ये कैंसर बढ़ी हुई अवस्था यानी तीसरे या चौथे स्टेज में ही पता चलता है.

इसोफैगस या खाने की नली का कैंसर

डॉक्टरों के अनुसार ये कैंसर 50 साल की उम्र के बाद ही पता चलता है. इस कैंसर में खाना निगलने में दिक़्क़त होने लगती है और बाद में कुछ पीने में भी परेशानी आने लगती है.

ये कैंसर ऐसे लोगों को ज़्यादा होने की आशंका रहती है, जिन्हें लंबे समय से एसिडिटी की समस्या हो या मुँह खट्टा रहने की शिकायत होती है.

इसके अलावा ये लक्षण हो सकते हैं..

  • पाचन की समस्या
  • छाती में जलन
  • कुछ फँसा हुआ महसूस होना

डॉक्टरों के अनुसार जो लोग मोटे होते हैं, शराब पीते हैं और धूम्रपान करते हैं उनमें ये कैंसर होने की आशंका ज़्यादा होती है.

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पेट का कैंसर

गैस्ट्रों एंड कैंसर सेंटर रीजेंसी हॉस्पिटल लिमिटेड में जीआई सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ अभिमन्यू कपूर बताते हैं कि पेट या अमाशय का कैंसर जिसे गैस्ट्रिक कैंसर भी कहा जाता है, पेट की लाइनिंग पर पाई जाने वाली कोशिकाओं में शुरू होता है.

डॉक्टरों का कहना है कि इसके लक्षण भी खाने की नली के कैंसर से मिलते-जुलते होते हैं.

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जिन मरीज़ों में कैंसर की वजह से ब्लीडिंग होती है, उन्हें ख़ून की उल्टी हो सकती है या उनके मल का रंग काला हो सकता है.

डॉ अभिमन्यू कपूर बताते हैं कि इस कैंसर के प्रमुख कारण शराब पीना, तंबाकू का सेवन और धूम्रपान है. वहीं जंक फूड और कसरत न करना भी इस कैंसर का कारण बन सकता है.

वे बताते हैं कि जापान में पेट का कैंसर आमतौर पर देखा गया और इसका मुख्य कारण इस बीमारी की स्क्रीनिंग की सुविधा होना है, लेकिन भारत में इस तरह के स्क्रीनिंग कार्यक्रम नहीं है, इसलिए मरीज़ में जब लक्षण दिखते हैं, तभी जाकर इस बीमारी का पता चल पाता है.

वहीं वे ये भी बताते हैं कि अगर ये कैंसर पेट तक ही सीमित रहते हैं यानी अर्ली स्टेज में पता चल जाता है तो मरीज़ पूरी तरह से ठीक हो जाता है.

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डॉ अभिमन्यू कपूर बताते हैं, "ये बीमारी आज से 20 साल पहले हमें नाउम्मीद कर देती थी लेकिन अब इतने सर्जिकल इलाज संभव हो गए हैं कि लंबे समय तक मरीज़ जी सकता है."

डॉक्टरों का कहना है कि धूम्रपान, शराब का सेवन, मोटापा, ज़्यादा नमक का खाना यानी प्रीज़र्वेटिव वाला खाना लेना और सब्ज़ियों और फलों का कम सेवन इसके कारणों में गिने जाते हैं.

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कोलोरेक्टल या बड़ी आंत का कैंसर

डॉ राशि अग्रवाल कहती हैं कि इस कैंसर में आपके शरीर में ख़ून की कमी हो जाती हैं.

आमतौर पर महिलाओं में जहाँ हीमोग्लोबिन 12-15 ग्राम डेसीलीटर होना चाहिए, वहीं पुरुषों में ये 13.5-17.5 ग्राम डेसीलीटर होना चाहिए.

डॉक्टरों के मुताबिक़ इस कैंसर से पीड़ित व्यक्ति में एनीमिया की दिक्क़त पेश आती है और इसमें ख़ून की अचानक आती है.

डॉ अभिमन्यू कपूर बताते हैं कि अगर ट्यूमर बन जाता है तो शौच के वक्त ख़ून आना, काला मल, कब्ज़ का होना या दस्त लगना इसके लक्षणों में गिने जाते हैं.

इसके अलावा डॉक्टर लक्षणों के बारे में बताते हैं-

  • गैस बनना
  • पेट का फूलना
  • पेट में पानी बनना
  • पेट दर्द अगर गंभीर स्थिति हो तो पेट में गाँठ भी बन जाती है.

डॉक्टरों का कहना है कि ये बढ़ती उम्र का कैंसर है, जो 50 वर्ष की उम्र में होता है और बताते हैं और इसके कारणों के बारे में पता नहीं चल पाया है.

लेकिन एक परिवार में अगर फ़र्स्ट डिग्री रिलेटिव यानी माँ, पिता, सगे भाई या बहन हैं, तो उन्हें ये कैंसर होने का ख़तरा रहता है.

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