स्तन कैंसर जागरूकता: ब्रेस्ट कैंसर काली महिलाओं को अधिक प्रभावित क्यों करता है?

डॉ. लीज़ा न्यूमैन (बायें) और डॉ. मेलिसा बी डेविस (दाएं) ने ये शोध किया है.

इमेज स्रोत, John Abbott

इमेज कैप्शन, डॉ. लीज़ा न्यूमैन (बायें) और डॉ. मेलिसा बी डेविस (दाएं) ने ये शोध किया है.
    • Author, पेज नील-होल्डर, खाड्रा सलाद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिका में शोधकर्ताओं ने अफ़्रीकी मूल के लोगों और एक आक्रामक प्रकार के स्तन कैंसर के बीच जेनेटिक लिंक का पता लगाया है. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि उन्होंने जो पता लगाया है उसके बाद अधिक संख्या में काले लोग क्लिनिकल ट्रायल में हिस्सा लेंगे ताकि बीमारी से ग्रसित लोगों को बचाने की संभावना को बढ़ाया जा सके.

न्यूयॉर्क में रहने वाली 53 वर्षीय अफ़्रीकी अमेरिकी लेवेरीन फांटलेरॉय कहती हैं, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत है."

लेवेरीन स्वस्थ जीवन जी रहीं थीं. वो अच्छा खाती थीं और नियमित तौर पर व्यायाम भी करती थीं. लेकिन जनवरी में उनके जन्मदिन से कुछ दिन पहले, उन्हें अपनी सेहत के बारे में जो कुछ पता चला उसके बाद से वो डरी हुई हैं और असमंजस में हैं.

वो बताती हैं, "उन्होंने बताया है कि मुझे ब्रेस्ट कैंसर है. अधिकतर लोग जिन्हें मैं जानती हूं और जिन्हें कैंसर था, ज़्यादा दिन तक ज़िंदा नहीं रहे, तो ज़ाहिर है, मैं बहुत डरी हुई थी."

लेवेरीन फॉंटलियोरी

इमेज स्रोत, Laverne Fauntleroy

इमेज कैप्शन, लेवेरीन को जनवरी में टीएनबीसी होने का पता चला

लेवेरीन को पता चला कि उन्हें ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर (टीएनबीसी) है.

यह बीमारी का एक कम सामान्य प्रकार है लेकिन ये बहुत तेज़ी से फैलता है. इसके वापस लौटने की संभावना भी अधिक होती है और हर तरह के ब्रेस्ट कैंसर में ये सबसे घातक होता है.

अन्य प्रकार के ब्रेस्ट कैंसर से ग्रसित कोशिकाओं में जो तीन तरह के रिसेप्टर होते हैं, वो इसमें नहीं होते. ऐसे में अन्य ब्रेस्ट कैंस में असर करने वाली दवाएं टीएनबीसी पर बेअसर रहती हैं.

ये चालीस साल से कम उम्र की महिलाओं में अधिक पाया जाता है और काली महिलाओं में ये अन्य के मुक़ाबले अधिक पाया जाता है.

जेएएमए ओनकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक़ टीएनबीसी से ग्रसित काली महिलाओं की जान जाने की संभावना इसी बीमारी से ग्रसित गोरी महिलाओं के मुक़ाबले 28 प्रतिशत अधिक होती है.

अब एक नए शोध से टीएनबीसी और अफ़्रीकी मूल के लोगों के बीच जेनेटिक लिंक का पता चला है.

ब्रेस्ट कैंसर की जांच कैसे करें

  • जानें की आपके लिए क्या सामान्य है और महीने में एक बार अपने स्तन की जांच करें.
  • नहाते हुए साबुन लगे हाथों से स्तन जांचना सबसे सही तरीका है.
  • नहाने से पहले शीशे में अच्छे से देखें, कहीं कोई लंप, त्वचा में बदलाव, निपल में बदलाव या किसी तरह का डिस्चार्ज तो नहीं हैं.
  • अपनी बगलों की जांच करना ना भूलें.
  • ये ध्यान रखें कि युवा महिलाओं के स्तन में लंप हो सकता है, ये बिल्कुल सामान्य बात है.
  • महावारी के हिसाब से स्तन में बदलाव हो सकता है, लेकिन अगर कोई लंप एक महावारी से अधिक रहता है तो डॉक्टर को दिखाएं.
  • अपने परिवार का इतिहास भी जानें, अगर परिवार के लोगों में स्तन कैंसर या ओवरी कैंसर के अधिक मामले हैं (पिता और मां दोनों की तरफ) तो इसकी आशंका अधिक रहती हैं.
लीज़ा न्यूमैन

इमेज स्रोत, Weill Cornell Medicine

इमेज कैप्शन, डॉ. न्यूमैन कहती हैं कि नए शोध से टीएनबीसी को और बेहतर तरीक़े से समने में मदद मिलेगी

अक्तूबर स्तन कैंसर जागरूकता महीना होता है.

विल कार्नेल मेडिसिन से जुड़ी डॉ. लीज़ा न्यूमैन अफ़्रीका के अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर पर शोध के एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं. ये प्रोजेक्ट बीस साल से चल रहा है.

उनके काम से ये पता चला है कि टीएनबीसी घाना जैसे पश्चिमी सब-सहारा अफ़्रीकी के देशों की महिलाओं में अधिक पाया जाता है.

वो कहती हैं कि इसकी एक वजह ये हो सकती है कि यहां की महिलाओं के जीन पर मलेरिया जैसे ख़तरनाक वायरस से लड़ते रहना का प्रभाव पड़ा हो और पीढ़ी दर पीढ़ी ये विकसित हुए हों.

डॉ. न्यूमैन कहती हैं, "अलग-अलग पारिवारिक पृष्ठभूमि की महिलाओं में ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर के बारे में शोध करते हुए, हम ये जान रहे हैं कि कुछ जेनेटिक मार्कर जो अलग-अलग संक्रामक एजेंट के प्रतिरोध से संबंधित हैं का ब्रेस्ट जैसे अलग-अलग अंगों के सूजन पर नकारात्मक असर पड़ा है."

2px presentational grey line

वो कहती हैं कि इस बीमारी को और बेहतर तरीक़े से समझने के लिए ये शोध बेहद अहम है.

वो कहती हैं, "हम इस काम को लेकर बहुत उत्साहित हैं क्योंकि इससे ये समझने में मदद मिल रही है कि अलग-अलग नस्ल और प्रजातियों के लोगों में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर असमानताएं क्यों होती हैं."

"यह हमें समग्र रूप से ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर के जीव विज्ञान की बहुत गहरी और अधिक व्यापक समझ भी देता है."

वो कहती हैं कि इसी वजह से क्लिनिकल ट्रायल के दौरान अलग-अलग बैकग्राउंड की महिलाओं का शामिल होना बेहद अहम है.

डॉ. न्यूमैन कहती हैं, "दुर्भाग्यवश, कैंसर के क्लिनिकल ट्रायल के दौरान अफ़्रीकी अमेरिकी मूल की महिलाओं का प्रतिनिधित्व बाक़ी नस्लों के मुक़ाबले बेहद कम होता है. अगर प्रतिनिधित्व विविध नहीं होगा तो आप ये नहीं समझ पाएंगे कि इलाज में जो प्रगति हो रही है उसे कैसे लागू करना है."

"इसकी एक वजह ये भी है कि स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर ऐतिहासिक रूप से भरोसे में कमी रही है."

"हेल्थकेयर डिलीवरी सिस्टम में हम संस्थागत नस्लवाद अभी भी देख रहे हैं. ये दुखद है कि कैंसर के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकने वाली काली नस्ल की महिलाओं को गोरे मरीज़ों के मुक़ाबले क्लिनिकल ट्रायल में कम शामिल करते हैं."

चीज़ों को बेहतर करना

लेवेरीन मानती हैं कि काली महिलाओं का क्लिनिकल शोध में शामिल होना अहम है और इसलिए ही वो भी इसका हिस्सा हैं.

वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि इस देश (अमेरिका) में हमारा इतिहास और जिस तरह का व्यवहार हमसे किया जाता रहा है, कि वजह से हम किसी भी चीज़ का हिस्सा होने में हिचकते हैं."

वो कहती हैं, "मैं भविष्य की पीढ़ी के लिए हालात बेहतर करने के प्रयासों का हिस्सा होना चाहती हूं."

"वो आपके ख़ून की जांच करते हैं. जब आपकी सर्जरी होती है, जो भी आप इस्तेमाल नहीं करते- यहां तक कि जो टिश्यू बच जाते हैं- उसका इस्तेमाल भी वो शोध के लिए करते हैं."

जुलाई में कामयाब सर्जरी के बाद अब लेवेरीन को अब कैंसर से मुक्ति मिल गई है.

वो कहती हैं, "चीज़ें ठीक चल रही हैं… मुझे गर्व है कि मैं शोध का हिस्सा रही. मुझे गर्व है कि मैं डॉ. न्यूमैन की मदद कर पाई."

डॉ. जॉर्जेटे ओनी कहती हैं कि महिलाओं को साबुन लगे हाथों से अपने ब्रेस्ट की जांच करनी चाहिए

इमेज स्रोत, Dr Georgette Oni

इमेज कैप्शन, डॉ. जॉर्जेटे ओनी कहती हैं कि महिलाओं को साबुन लगे हाथों से अपने ब्रेस्ट की जांच करनी चाहिए

इंग्लैंड में, काली महिलाओं में गोरी महिलाओं के मुक़ाबले अंतिम चरण के स्तन कैंसर होने की संभावना दोगुनी होती है.

एनएचएस रेस और हेल्थ ऑब्ज़रवेटरी काली महिलाओं से शोध का हिस्सा होने की अपील कर रही है.

डॉ. जार्जेटे ओनी, नॉटिंघम में ब्रेस्ट सर्जन हैं. वो कहती हैं कि क्लिनिकल ट्रायल में कामी महिलाओं का कम शामिल होना ब्रिटेन में भी एक बड़ी समस्या है.

वो कहती हैं, "मैं इस बात पर बहुत ज़ोर देती हूं कि काली महिलाएं क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा हों, क्योंकि इसी से वो डाटा जुटाते हैं. इसी से उन्हें पता चलता है कि इलाज और अन्य चीज़ों का आप पर क्या प्रभाव हो रहा है क्योंकि ये बीमारी काली महिलाओं में अधिक पाई जाती है."

"अगर आप सही जानकारी चाहते हैं, तो आपके पास आंकड़े होने चाहिए."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)