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चीन में एप्पल का कारोबार और उससे जुड़े बड़े सवाल
- Author, जेम्स क्लेटन
- पदनाम, नॉर्थ अमेरिका टेक्नोलॉजी रिपोर्टर
एक वक़्त था कि जब अमेरिका की तमाम बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां चीन में कारोबार कर रही थीं. यहां तक कि उनमें फ़ेसबुक भी था.
आज चीन में एप्पल की जो व्यापक स्तर पर मौजूदगी है, उस पर सबकी नज़र रहती है. पिछले हफ़्ते माइक्रोसॉफ़्ट ने एलान किया कि वो अपनी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट लिंक्डइन का कामकाज चीन में बंद कर रही है.
हालांकि माइक्रोसॉफ़्ट चीन में कारोबार करती रहेगी. लेकिन लिंक्डइन का कामकाज रोकने के फ़ैसले पर माइक्रोसॉफ़्ट का कहना है कि चीन सरकार की नीतियों के साथ तालमेल बिठा पाना कंपनी के लिए लगातार मुश्किल होता जा रहा था. एप्पल के साथ भी चीन में सेंसरशिप को लेकर अपनी समस्याएं हैं.
बीबीसी ने पिछले हफ़्ते ये रिपोर्ट दी थी कि चीन में दो लोकप्रिय धार्मिक ऐप को एप्पल के ऐप स्टोर से हटा दिया गया था. बाद में ये बात सामने आई कि अमेज़न का ऑडिबल ऐप और याहू फिनांस ऐप भी एप्पल के ऐप स्टोर से हटा दिया गया है.
एप्पल के ऐप स्टोर पर नज़र रखने वाले ग्रुप 'एप्पल सेंसरशिप' का कहना है कि इस महीने हटाए गए ऐप्स की संख्या में वृद्धि हुई है. इन हालात में ये सवाल पैदा होता है कि आख़िर चीन में चल क्या रहा है?
टेक्नोलॉजी कंपनियों पर सरकारी कार्रवाई
चीन में बंद दरवाज़ों के पीछे क्या कुछ चल रहा है, उसका ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है. लेकिन जो बात गुज़रते वक़्त के साथ-साथ और स्पष्ट होती जा रही है, वो ये है कि एप्पल और माइक्रोसॉफ़्ट जैसी कंपनियां चीन की टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री और सरकारी अधिकारियों के बीच चल रही जंग में गहराई से उलझ गई हैं.
चीन के पास अपनी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां हैं. टेंसेंट, अलीबाबा और ख़्वावे का नाम दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में शुमार होता है. लेकिन इन कंपनियों की बढ़ती ताक़त से चीन की सरकार की चिंताएं बढ़ी हैं. अप्रैल में अलीबाबा पर 2.8 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया गया जिसे कंपनी ने स्वीकार कर लिया.
अलीबाबा के ख़िलाफ़ हुई जांच में ये बात सामने आई थी कि कंपनी ने बाज़ार में अपनी मजबूत स्थिति का दुरुपयोग किया था. अगस्त में चीन की सरकार ने एक पंचवर्षीय योजना का खाका पेश किया जिसका मक़सद देश की टेक इकॉनमी का सख़्ती से नियमन करना था. चीन में बिटक्वॉयन पर भी कार्रवाई की जा रही है.
चीन में टेक्नोलॉजी सेक्टर की कंपनियों के ख़िलाफ़ की जा रही सरकारी कार्रवाई से अमेरिकी कंपनियां भी बच नहीं पाई हैं.
'द ग्रेट फायरवॉल ऑफ़ चाइना' के लेखक जेम्स ग्रिफिथ्स कहते हैं, "चीन में टेक कंपनियों के ख़िलाफ़ जो कार्रवाई चल रही है, उससे ये संकेत मिलता है कि एप्पल और माइक्रोसॉफ़्ट दोनों को ही ये मालूम है कि हाल के सालों की तुलना में उनकी स्थिति फिलहाल बेहद कमज़ोर है. उन्हें मालूम है कि उन्हें फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाना होगा."
वो छोटी सी चीज़ जो माइक्रोसॉफ़्ट के लिए बड़ी परेशानी का सबब बनती हुई दिख रही है, वो है पर्सनल इंफॉर्मेशन प्रोटेक्शन क़ानून. ये एक नवंबर से लागू होने वाला है. इसकी वजह से माइक्रोसॉफ़्ट को और अधिक कड़े नियमों का पालन करना होगा.
माइक्रोसॉफ़्ट ने चीन में लिंक्डइन का कामकाज बंद करने पर जो बयान दिया था, उसमें इसकी ओर इशारा किया गया था. कंपनी ने कहा, "हम और अधिक चुनौतीपूर्ण माहौल का सामना कर रहे हैं. चीन में कड़े क़ायदे क़ानूनों को लागू किया जा रहा है."
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में 'डिजिचाइना प्रोजेक्ट' के मुख्य संपादक ग्राहम वेबस्टर कहते हैं, "मुझे लगता है कि उन्होंने फ़ैसला कर लिया था कि अब इसका मतलब नहीं रह गया है."
ग्राहम वेबस्टर चीन में लिंक्डइन का कामकाज बंद करने के माइक्रोसॉफ़्ट के फ़ैसले को पर्सनल इंफॉर्मेशन प्रोटेक्शन क़ानून के लागू होने से जोड़कर देखते हैं.
'शैतान के साथ सौदा'
हालांकि माइक्रोसॉफ़्ट की तुलना में एप्पल की चीन में पूरी तरह से भिन्न प्राथमिकताएं हैं. दूसरी अमेरिकी कंपनियों की तुलना में एप्पल का चीन में बहुत बड़ा कारोबार है.
पिछली तिमाही में एप्पल ने चीन और ताइवान के बाज़ार से 15 अरब डॉलर की कमाई की. वहां एप्पल की असाधाराण मौजूदगी का इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
एप्पल के ग्लोबल सप्लाई चेन नेटवर्क की भी चीन में होने वाले उसके उत्पादन पर गहरी निर्भरता है. और चीन में बने रहने का मतलब एप्पल को मालूम है. उसे चीन के नियम क़ानूनों के मुताबिक़ ही काम करना होगा. भले ही इसका मतलब सेंसरशिप ही क्यों न हो.
आप के मन में ये सवाल उठ सकता है कि एप्पल चीन में खुद को केवल हार्डवेयर बिज़नेस तक ही क्यों नहीं समेट लेता है और ऐप स्टोर को क्यों नहीं भुला देता है?
यहां दिक्कत ये है कि एप्पल का ये मानना है कि उसके आईफोन और ऐप स्टोर का वजूद एक दूसरे से इस कदर जुड़ा हुआ है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है.
वो कोई ऐसी नज़ीर नहीं पेश करना चाहता जहां लोग इधर-उधर से ऐप डाउनलोड करने लगें. अगर ऐसा हुआ तो इसका असर उसकी कमाई पर भी पड़ेगा.
इसलिए एप्पल को अगर चीन में अपने उत्पाद बेचने हैं तो उसे ऐप स्टोर भी चालू रखना ही होगा.
ग्राहम वेबस्टर बताते हैं, "एप्पल सालों से किसी न किसी तरह से ऐप स्टोर से ऐप्स हटाता रहा है और सेंसरशिप लागू करता रहा है. लेकिन हाल के समय में ये सेंसरशिप और सख़्त हुई है."
"ऐसा लगता है कि एप्पल ने शैतान के साथ सौदा कर लिया है. एक बार जब आप किसी हटाने के लिए सहमत हो जाते हैं तो ये सिलसिला रुकने वाला नहीं है."
खुफिया रणनीति
चीन में हालात कारोबार के लिहाज से मुश्किल होने वाले हैं, माइक्रोसॉफ़्ट से पहले इसका अंदाज़ा कई कंपनियों को हो गया था.
गूगल ने साल 2010 में चीन में अपना सर्च इंजन बंद कर दिया था. गूगल के फ़ैसले की वजह हैकिंग अटैक बताई गई थी. गूगल ने साफ़ तौर पर कहा था कि वो सर्च के नतीज़ों की सेंसरशिप को लेकर वो खुश नहीं थी.
'सिलिकॉन ड्रैगन' की लेखिका रेबेका फैनिन को लगता है कि लिंक्डइन को लेकर माइक्रोसॉफ़्ट के फ़ैसले के बाद के बाद एप्पल एक बड़ा टारगेट बन गया है. हालांकि वो ये भी मानती है कि चीन में कारोबार जारी रखने के लिए एप्पल संघर्ष करने को तैयार है.
वो कहती हैं, "आपको मालूम है कि चीन में एप्पल मार्केट की अगुवा कंपनियों में शामिल है. मुझे नहीं लगता है कि आने वाले समय में एप्पल किसी मुद्दे को लेकर चीन से कदम खींचने जा रहा है."
लेकिन हमें ये बात भी नहीं मालूम कि चीन में परदे के पीछे सरकारी अधिकारियों और एप्पल के बीच किस तरह की बातचीत चल रही है.
मुमकिन है कि एप्पल कदम वापस खींच ले या ये भी हो सकता है कि चीन में बहुत से ऐप्स ऐप स्टोर पर उपलब्ध और सक्रिय रहें क्योंकि एप्पल ने उनके पक्ष में साफ़ स्टैंड लिया हो. हमें ये बातें गहराई से नहीं मालूम हैं. एप्पल शायद ही कभी इन कहानियों पर कोई टिप्पणी करता है.
पत्रकार जब उससे इस बारे में सवाल करते हैं तो कंपनी अपनी मानवाधिकार नीति का हवाला देती है. इसमें कहा गया है कि कंपनी जिस देश में कारोबार करती है, वो उसके क़ानूनों पर अमल करती है, भले ही वो उससे क्यों न असहमत हो.
और चीन में भी वो यही कर रही है. जब भी सरकारी अधिकारी किसी ऐप को हटाने के लिए कहते हैं, तो उसे ऐप स्टोर से हटा दिया जाता है.
चीन में एप्पल की मौजूदगी किसी और ज़माने की बात लगती है. बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों की चीन में अब पहले जैसी मौजूदगी नहीं रह गई है.
ऐसे में बस यही सवाल है कि कितने नियम क़ानूनों और कितनी सेंसरशिप को पानी का नाक से ऊपर चला जाना कहा जाएगा.
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