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स्मार्ट फ़ोन से क्यों नहीं हटती नज़र?- दुनिया जहान
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
'तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती...'
1970 के दशक के इस मशहूर गाने के मुखड़े में 'चेहरे' को अगर अब 'स्मार्ट फ़ोन' से बदल दिया जाए तो हो सकता है कि कई लोग कहें,'बिल्कुल सही'.
यानी 'स्मार्ट फ़ोन से नज़र नहीं हटती.'
आप स्मार्ट फ़ोन इस्तेमाल करते हैं तो शायद कई बार महसूस करते होंगे कि आपकी नज़र भी लगातार इसकी स्क्रीन पर बनी रहती है.
ऐसा लगभग सबके साथ होता है. आप ऐसे तमाम लोगों को जानते होंगे जो फ़ोन में ऐसे डूब जाते हैं कि उन्हें कुछ और ख़्याल ही नहीं रहता.
स्मार्ट फ़ोन क्रांति
ये दीवानगी क़रीब डेढ़ दशक से जारी है. एप्पल के आईफ़ोन की बिक्री की शुरुआत के साथ एक तरह से स्मार्ट फ़ोन क्रांति भी हो गई.
तब से ही स्मार्ट फ़ोन कनेक्ट करने यानी दुनिया से आपका रिश्ता जोड़े रखने, क्रिएट करने यानी रचना संसार को जीवंत बनाने और सीखने का बेहतरीन औज़ार बन गए हैं.
तमाम लोगों के हाथों या जेब में स्मार्ट फ़ोन हर वक़्त मौजूद रहता है लेकिन उनमें से बहुत से लोगों को कभी न कभी ये भी लगता है कि वो इसे ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं.
कैलिफ़ोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर लैरी रोज़न एक घटना का ज़िक्र करते हैं.
वो बताते हैं, "एक दिन मेरी क्लास में एक गेस्ट लेक्चरर आए और उन्हें सुनने के लिए मैं छात्रों के बीच बैठ गया. वहां मेरे बराबर में एक छात्र बैठा था. वो पूरे लेक्चर के दौरान अपने स्मार्ट फ़ोन में लगा रहा. वो या तो टेक्स्ट मैसेज का जवाब दे रहा था या फिर फ़ेसबुक देख रहा था."
दिन में कितनी बार फ़ोन का इस्तेमाल?
लैरी रोज़न ने एक किताब लिखी है 'द डिस्ट्रेक्ट माइंड: एन्सिएंट ब्रेन्स इन ए हाईटेक वर्ल्ड.' उनकी रिसर्च के केंद्र में है तकनीक और उसका असर.
क्या आप जानते हैं कि एक व्यक्ति दिन में कितनी बार अपने फ़ोन की तरफ देखता है? लैरी रोज़न ने 200 से ज़्यादा छात्रों के साथ किए प्रयोग के आधार पर इस सवाल का जवाब दिया.
लैरी रोज़न बताते हैं, "हम ये पता लगा रहे थे कि वो कितनी बार अपना फ़ोन अनलॉक करते हैं और कितने मिनट तक फ़ोन अनलॉक रहता है. हमें ये जानकार हैरानी हुई कि एक नौजवान एक दिन में औसतन साठ बार अपना फ़ोन अनलॉक करता है और करीब 220 मिनट तक फ़ोन अनलॉक रहता है."
यानी साढ़े तीन घंटे से भी ज़्यादा समय तक और इस दौरान फ़ोन का इस्तेमाल क़रीब साठ बार होता है.
अगर आप हैरान हैं तो रुकिए लैरी रोज़न कहते हैं कि इस बारे में हुए कुछ दूसरे शोध बताते हैं कि ये संख्या कहीं ज़्यादा है. शोध करने वालों को ऐसे लोग मिले जिन्होंने एक दिन में अपना फ़ोन 80, 90 या फिर 100 बार अनलॉक किया.
फ़ोन से चिपके रहने की लत रिश्तों पर भी असर डालने लगी है.
रिश्तों पर असर डालते फ़ोन
लैरी रोज़न कहते हैं, "शोध के नतीजे बताते हैं कि कई एक पति या पत्नियों की शिकायत होती है कि उनके पार्टनर उनसे ज़्यादा फ़ोन पर ध्यान देते हैं. उन्हें अपने पार्टनर का ध्यान अपनी ओर खींचने में दिक़्क़त हुई है."
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ड्राइविंग के दौरान भी फ़ोन इस्तेमाल करते हैं जबकि ऐसा करना बहुत जोखिम भरा है. कुछ लोग सोते वक़्त भी फ़ोन साथ रखते हैं और बिस्तर पर लगातार उसे देखते रहते हैं. इसका असर नींद पर भी होता है, लेकिन सवाल है कि आख़िर फ़ोन से चिपके रहने की ये बेचैनी क्यों होती है.
लैरी रोज़न कहते हैं, "संवाद के जितने भी तरीक़े हैं लोग उनके साथ जुड़े रहना चाहते हैं. इनमें टेक्स्ट मैसेज और ईमेल शामिल हैं लेकिन सबसे अहम है सोशल मीडिया. हम बोरियत को लेकर अध्ययन कर रहे हैं और नतीजे हमें बताते हैं कि अब लोग बोरियत बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं."
सवाल और भी हैं. मसलन हम अपने फ़ोन से कितना जुड़े हुए हैं और जब हमसे फ़ोन ले लिए जाते हैं तब क्या होता है?
लैरी रोज़न अपने प्रयोग के आधार पर बताते हैं कि फ़ोन से लगातार चिपके रहने वाले लोगों के फ़ोन लेकर जब उन्हें दूसरे काम में लगाया गया तब फ़ोन पर आने वाले हर मैसेज की आवाज़ से उनकी बेचैनी और दिल की धड़कन की रफ़्तार बढ़ गई. लैरी रोज़न कहते हैं कि हर किसी के साथ ऐसा नहीं हुआ लेकिन ये एक तथ्य है कि स्मार्ट फ़ोन को लेकर आसक्ति यानी फ़ोन के बिना नहीं रह पाने वाले लोगों की संख्या काफ़ी बड़ी है और जब वो फ़ोन से अलग होते हैं तो उनकी बेचैनी बढ़ जाती है.
फ़ोन की लत
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर नताशा शुल भी उन लोगों में शामिल हैं जो मानते हैं कि वो ज़रूरत से ज़्यादा फ़ोन इस्तेमाल करते हैं.
नताशा शुल बताती हैं, "किसी महत्वपूर्ण बोर्ड मीटिंग या फिर अपने विभाग की मीटिंग के दौरान.... मैं ये बखूबी जानती हूं कि मेरे सहकर्मियों की निगाहें मुझ पर हैं लेकिन फिर भी मैं ख़ुद को फ़ोन पर उंगलियां घुमाने और ईमेल चेक करने से नहीं रोक पाती हूं."
किसी चीज़ की डिज़ाइन में ऐसा क्या ख़ास होता है कि लोगों को उसकी लत लग जाती है, नताशा इसी मामले को समझाने की विशेषज्ञ हैं.
वो बताती हैं, " किसी व्यक्ति को अपनी ओर खींचने वाली चीज़ों की बात करें तो उनमें सेक्स, उनकी पसंद के दूसरे इंसान और अच्छा भोजन शामिल हैं लेकिन अब इसमें कंप्यूटर तकनीक भी जुड़ गई है. ये भी हमें अपनी ओर खींचती है और इसकी लत लग जाती है."
लत के पीछे का मनोविज्ञान
लेकिन, लत लगती क्यों है, इस सवाल पर नताशा फ़ादर ऑफ़ बिहेवियरिज़्म कहे जाने वाले बीएफ स्किनर के प्रयोगों पर ग़ौर करने के लिए कहती हैं. स्किनर एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे. इनाम और सज़ा का किसी के बर्ताव पर क्या असर होता है, ये जानने के लिए उन्होंने कई प्रयोग किए. एक प्रयोग में उन्होंने कबूतरों को बक्सों में बंद किया जिसमें एक लीवर दबाने पर बतौर इनाम खाना बाहर आता था. नताशा के मुताबिक़ इस प्रयोग में उत्सुकता जगाने वाली कोई बात नहीं थी. ये साफ़ था कि जब भूख लगी हो आप लीवर दबाइए और खाना मिल जाएगा.
स्किनर ने इसके बाद दूसरे प्रयोग भी किए और उनके बारे में नताशा शुल बताती हैं, "1950 और 1960 के दशक में उन्होंने ये पाया कि इनाम पाने की लत तब लगती है जब ये पता नहीं हो कि इनाम कितना मिलेगा और कब मिलेगा?"
कबूतरों को जब ये जानकारी थी कि लीवर दबाने से खाना मिल जाएगा तो वो उसे तभी दबाते थे जब भूख लगी हो लेकिन अगर लीवर दबाने पर उन्हें कभी खाना मिले और कभी नहीं मिले तो वो इससे चिपके रहेंगे और लगातार दबाते रहेंगे. स्किनर ने प्रयोग के जरिए इसी बात को समझाया.
इनाम की आस
नताशा शुल ने एक किताब भी लिखी है 'एडिक्शन बाई डिज़ाइन'. उनका कहना है कि इंसान हों या फिर जानवर अगर उन्हें ये जानकारी न हो कि इनाम क्या मिलेगा तो वो खिंचे चले आते हैं. स्किनर के शोध बताते हैं कि इनाम देने के तरीक़े से आप लोगों के बर्ताव को प्रभावित कर सकते हैं. स्लॉट मशीन बनाने वाले भी इसे जानते हैं.
कसीनो यानी जुआघरों में सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा स्लॉट मशीनों के जरिए ही आता है. ये ज़ाहिर है कि जुए के दूसरे खेल के मुक़ाबले इसकी लत तीन से चार गुना ज़्यादा तेज़ी से लग जाती है.
मशीन की माया
नताशा कहती हैं कि स्लॉट मशीनों को फ़ायदा लेने के लिए ही डिज़ाइन किया जाता है. लेकिन क्या कबूतरों और स्लॉट मशीनों की स्मार्ट फोन से भी कुछ समानता है?
इस पर नताशा शुल कहती हैं, "खाना बाहर आने की उम्मीद में चोंच मारते कबूतर या फिर किसी कसीनो में बार-बार स्लॉट मशीन का बटन दबाते जुआरी या फिर किसी ट्रेन में रोज़ यात्रा करने वाले शख्स का अपने मोबाइल पर टेक्स्ट मैसेज देखना या फिर अपनी फ़ेसबुक टाइमलाइन चेक करना. इनमें एक बात आम है. वो जानना चाहते हैं कि आगे क्या आने वाला है."
नताशा कहती हैं कि आप पाएंगे कि सभी के सामने क़रीब-क़रीब एक सा लुभावना फंदा है.
चर्चित लेखक और उद्यमी नीर एयाल भी ज़रूरत से ज़्यादा फ़ोन इस्तेमाल करने को लेकर परेशान रहे हैं.
नीर एयाल बताते हैं, "कुछ बरस पहले मेरे साथ ये दिक़्क़त थी कि हर रात मैं बहुत देर से सोने जाता था. मेरे पास तकनीकी उपकरण होते थे. नींद पूरी करने के लिहाज़ से ये ठीक नहीं था. ये मेरी सेक्स लाइफ़ के लिए भी ये अच्छा नहीं था."
तकनीक का जाल
नीर एयाल के पास एक टेक स्टार्टअप चलाने का अनुभव भी है. वो बताते हैं कि ये गेमिंग और एडवरटाइज़िंग से जुड़ी कंपनी थी. उन्होंने ये कंपनी साल 2007 में कंपनी शुरू की थी.
नीर एयाल बताते हैं, "ये दोनों उद्योग यूज़र्स के बदलते बर्ताव पर निर्भर करते हैं. मैंने पाया कि वहां तकनीक का काफ़ी इस्तेमाल हो रहा था लेकिन उनमें से किसी का जुड़ाव मनोविज्ञान के सिद्धांतों के साथ नहीं था."
नीर एयाल ने स्किनर जैसे लोगों के सिद्धांतों को तकनीक की दुनिया में लागू किया और नतीजों को एक किताब में दर्ज किया. 'हुक्ड: हाउ टू बिल्ड हैबिट फॉर्मिंग प्रोडक्ट'
नीर एयाल का कहना है कि आदत का हिस्सा बन जाने वाली तकनीक की मां ईमेल को कहा जा सकता है. ईमेल में कभी अच्छी ख़बर आती है और कभी बुरी. ये एक तरह का रिवॉर्ड है और लोग इसके बारे में जानने को लेकर उत्सुक रहते हैं.
वो कहते हैं, "फ़ोन पर आने वाले नोटिफ़िकेशन भी हमें उकसाते रहते हैं. फ़ेसबुक, ट्विटर और स्नैपचैट जैसे ऐप हम उत्सुकता के साथ खोलते हैं. हमें ये पता नहीं होता है कि हमें क्या रिवॉर्ड मिलने वाला है."
नीर एयाल कहते हैं, " हम किसी इत्तेफ़ाक़ की वजह से फ़ोन नहीं देखते. हम जानबूझकर ऐसा कर रहे होते हैं, ऐसा इसलिए है कि जिस तकनीक को हम जेब में लिए घूम रहे होते हैं वो रिवार्ड देने वाले उम्दा उपकरण हैं."
कंपनियां बुनती हैं जाल
रिवॉर्ड और फ़ीचर को लेकर कंपनियां अलग अलग प्रयोग कर सकती हैं. ऐप को लगातार इस्तेमाल करने के मामले में हमारा फ़ोन तमाम डेटा मुहैया कराता है. नीर एयाल कहते हैं कि कंपनियां चाहती हैं कि हमें इन उत्पादों की आदत पड़ जाए.
वो बताते हैं, "मैंने बोरियत दूर करने के लिए ईमेल जैसी तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया. जब हम अकेलापन महसूस करते हैं तो फ़ेसबुक चेक करते हैं, जब किसी बात को लेकर हम पक्के तौर पर कुछ नहीं कह पाते हैं तो गूगल देखते हैं, जब हम बोर हो रहे होते हैं तो यूट्यूब देखते हैं, हम अपनी जरूरत के मुताबिक़ उनके उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं."
नीर एयाल कहते हैं कि हमें जकड़े रखने के लिए कंपनियां मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों और तकनीक का इस्तेमाल करती हैं और यही वजह है कि हम फ़ोन से दूर नहीं रह पाते. वो ये भी कहते हैं कि हम वही प्रोडक्ट इस्तेमाल करते हैं जिन्हें हम पसंद करते हैं और जो हमारे काम के हैं
टेक एक्सपर्ट ट्रिस्टान हैरिस फ़ोन की लत से उबरने के तरीक़ों पर बात करते हैं. उन्हें तकनीक के क्षेत्र में काम करने का लंबा अनुभव है.
हैरिस बताते हैं, "मैंने तकनीक के क्षेत्र में लंबे वक़्त तक काम किया है, मैं जब 18 साल का था तब एप्पल के लिए काम करता था वहां मैं सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था."
बदलाव का रास्ता
क़रीब एक दशक पहले उनके स्टार्टअप ने इस बारे में जानकारी देना शुरू किया कि लोग वेब पर क्या पढ़ रहे हैं? उन्होंने बीबीसी और न्यूयॉर्क टाइम्स पर ट्रायल किया.
हैरिस बताते हैं, "इससे चीज़ों को बेहतर तरीक़े से समझने में मदद मिली, लेकिन बीबीसी और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे हमारे ग्राहक तभी ख़ुश होते थे जब हम लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा देर तक उनकी वेबसाइट पर बनाए रखते लेकिन इससे हमारे मक़सद और हम जो कर रहे थे उसमें एक बड़ा अंतर दिखने लगा. हमारा मक़सद लोगों को सीखने में मदद करने का था जबकि हम उन्हें वेबसाइट पर बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे."
ट्रिस्टान हैरिस कहते हैं कि चाहे पढाई लिखाई से जुडी वेबसाइट हो या मेडिटेशन ऐप हो गेम हो या फिर फ़ेसबुक हो. इनमें से हर किसी को इसी तरह बनाया गया है कि लोग उनकी तरफ़ खिंचे रहें. कंपनियां अपने प्रोडक्ट के ज़रिए लोगों को आकर्षित करने कोशिश करती रही हैं लेकिन तकनीक इसे एक अलग स्तर पर ले गई है. ट्रिस्टान हैरिस कहते हैं कि तकनीक की लत को लोग अपनी ग़लती मानते हैं लेकिन उन्हें शायद ये जानकारी नहीं होती है कि स्क्रीन की दूसरी तरफ़ कई सौ या कई हज़ार लोग होते हैं जो इस कोशिश में होते हैं कि आप उनके प्रोडक्ट को ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें.
वो ये भी कहते हैं कि अब कामयाबी को लेकर सोच बदलने की ज़रूरत है. टाइम स्पेंट को टाइम वेल स्पेंट बनाने की ज़रूरत है. वो ये भी चाहते हैं कि ऐप्स की रेटिंग के लिए लोग नए तरीक़े आज़माएं. रेटिंग ऐप पर बिताए गए समय के बजाए उसकी उपयोगिता से तय हो.
ये ज़ाहिर है कि स्मार्ट फ़ोन के प्ले स्टोर को गूगल और एप्पल कंट्रोल करते हैं और अगर तब्दीली लानी है तो इन्हें भी बड़े बदलाव करने होंगे.
ट्रिस्टान हैरिस कहते हैं, "अगर आप खान-पान उद्योग के ऑर्गेनिक मूवमेंट को देखें तो पाएंगे कि पहले सस्ता सामान उपलब्ध कराने की होड़ रहती थी लेकिन ऑर्गेनिक मूवमेंट ने दिखाया कि खेल के नियम कैसे बदले जा सकते हैं."
ऑर्गेनिक मूवमेंट ने लोगों को कीटनाशक से मुक्त सामान के लिए ज़्यादा क़ीमत देने को तैयार किया. हैरिस तकनीक के क्षेत्र में भी ऐसे बदलाव की उम्मीद लगाए हैं.
ट्रिस्टान हैरिस कहते हैं, "अगर हम आज ऐसा करें तो आप कहेंगे कि नहीं मैं उस प्रोडक्ट को इस्तेमाल करता हूं और पसंद करता हूं लेकिन अगर समय के सही इस्तेमाल के लिहाज़ से उसकी रेटिंग की जाए तो हमें ये जानकारी हो सकेगी कि ये आपके लिए कितना फ़ायदेमंद है."
ये साफ़ है कि फ़ोन सिर्फ़ अपने उपयोगी फ़ीचर नहीं बल्कि टेक कंपनियों के उन फ़ॉर्मूलों की वजह से हमें अपनी तरफ़ खींचते हैं जिन्हें वो ध्यान बटोरने के लिए आज़माती हैं.
अब सवाल ये है कि क्या ये तरीक़े इतने ताक़तवर हैं कि उनसे मुक़ाबले के लिए हमें किसी की मदद की दरकार होगी या फिर हमारी इच्छा शक्ति ही काफ़ी रहेगी. इसका फ़ैसला आपको ही करना है लेकिन अगर आप फ़ोन की लत से बचना चाहते हैं तो आपके लिए नीर एयाल का एक सुझाव है. वो कहते हैं कि फ़ोन की नोटिफ़िकेशन सेटिंग बदल कर आप बहुत सी दिक़्क़तों से बच सकते हैं.
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