क्या कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाना अब और अधिक वैक्सीन लेने से बेहतर है?

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- Author, जेम्स गैलाघर
- पदनाम, स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
कोरोना वायरस से प्राकृतिक रूप से संक्रमित होना और वैक्सीन लेना आपके इम्यून सिस्टम के लिए दो अलग अलग चीज़ें हैं. दोनों में से कौन अच्छा है?
एक साल पहले भी जब पहली बार कोविड होना घातक था, ख़ास कर बुज़ुर्गों के लिए या उन्हें जिनका स्वास्थ्य पहले से ही ख़राब रहा हो तब भी इस सवाल पर लोगों के मत अलग-अलग ही थे.
अब हम ज़ीरो इम्युनिटी से शुरू नहीं कर रहे हैं क्योंकि अधिकांश लोगों ने या तो पहला टीका लगवा लिया है या फिर इस वायरस से वो पहले ही संक्रमित हो चुके हैं.
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आज एक गंभीर सवाल ये है कि क्या बच्चों को भी वैक्सीन दी जानी चाहिए. और क्या हम वयस्कों में इम्युनिटी बढ़ाने के लिए वायरस या बूस्टर डोज़ का उपयोग किया जाना चाहिए.
दोनों विवादास्पद मुद्दे बन गए हैं.

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प्रतिरक्षा विज्ञानी (इम्युनोलॉजिस्ट) प्रोफ़ेसर एलेनॉर रिले ने मुझे बताया, "हो सकता है कि हम लंबे समय से खुद को एक कठिन परिस्थिति में डाल रहे हैं, जहां हमें लगता है कि हर साल बूस्टर डोज़ से हम कोविड को दूर रख सकते हैं."
एक सरकारी वैक्सीन सलाहकार, प्रोफ़ेसर एडम फिन ने कहा कि जब दुनिया के दूसरे हिस्से में वैक्सीन हो ही नहीं तो यहां लोगों को इसके अधिक डोज़ देना थोड़ा पागलपन है, यह केवल असमान नहीं है, यह बेवकूफी है."

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इम्युनिटी कैसे काम करती है?
हमें अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) और उस पर हमला करने वाले वायरस दोनों की मुख्य संरचना को समझने की ज़रूरत है.
हमारे शरीर को संक्रमण से मुक्त करने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली की दो ताक़तें एंटीबॉडी और टी-कोशिकाएं हैं.
एंटीबॉडी वायरस की सतह से चिपक कर उसे ख़त्म करने के लिए चिह्नित करती हैं. वहीं टी-कोशिकाएं अपनी उन कोशिकाओं की पहचान करके उन्हें नष्ट करती हैं, जिन्हें वायरस ने हाइजैक कर लिया होता है.
ऐसे में वायरस से जो भी परेशानी पैदा होती है, उसे प्रभावशाली तरीके से ख़त्म करना बहुत ही सरल होता है.
इसके पास जाना माना स्पाइक प्रोटीन होता है, जो हमारे शरीर में कोशिकाओं के दरवाज़े को खोलने के लिए उपयोग की जाने वाली चाबी है.
हमारी कोशिकाओं को हाइजैक करने और ख़ुद की हज़ारों कॉपी तैयार करने के लिए इसे 28 अन्य प्रोटीनों की आवश्यकता होती है.
आम तौर पर संक्रमित होने और वैक्सीन लेने की अवस्था में वायरस की तुलना करने के चार प्रमुख क्षेत्र हैं.

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इम्यून सिस्टम कितने वायरस पर हमला करना सीख पाता है?
वैक्सीनेशन की तुलना में वायरस से संक्रमित होने के बाद आपको प्रतिरक्षा प्रणाली से कहीं अधिक व्यापक प्रतिक्रिया मिलती है.
चाहे आपने मॉडर्ना या फ़ाइज़र या ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन ली हो, आपका शरीर केवल एक चीज़ पहचानना सीख रहा है- स्पाइक प्रोटीन.
यह एंटीबॉडी बनाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इससे लोगों को अस्पताल जाने से रोकने में मदद मिली है और यह शानदार रहा है.
लेकिन अन्य 28 प्रोटीन को भी लक्षित करना है तो टी-कोशिकाओं को इससे कहीं आगे जाना होगा.
प्रोफ़ेसर रिले कहती हैं, "इसका मतलब है कि यदि आपका संक्रमण वास्तविक रूप में बड़ा था तो आपके पास किसी भी नए प्रकार के वैरिएंट के लिए बेहतर प्रतिरक्षा प्रणाली हो सकती है. क्योंकि आपके पास केवल स्पाइक की तुलना में अधिक इम्यूनिटी है."

यह संक्रमण या गंभीर बीमारी को कितनी अच्छी तरह से रोकता है?
हम जानते हैं कि वैक्सीन लेने के बावजूद और एक बार कोविड हो जाने के बाद भी फिर से इस वायरस से संक्रमित होने के कुछ मामले आए हैं.
ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर फिन ने कहा, "दोनों ही आपको संक्रमण के ख़िलाफ़ पूरी सुरक्षा नहीं देते, लेकिन इससे जो आपको इम्यूनिटी मिलती है वो गंभीर बीमारी से बहुत अच्छी तरह बचाती है."
वैक्सीन लेने के एक महीने बाद, संक्रमण की तुलना में आपके शरीर में एंटीबॉडी का स्तर औसतन अधिक होता है.
हालांकि गंभीर मरीज़ और एसिम्टोमैटिक (जो बहुत अधिक एंटीबॉडी नहीं बना पाते) लोगों के बीच एंटीबॉडी में एक बहुत बड़ा अंतर दिखता है.
सबसे अधिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया हमें उन लोगों में मिली जिन्हें कोविड हुआ फिर उन्होंने वैक्सीन लगवाई.
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एंटीबॉडी कब तक शरीर को सुरक्षित रखता है?
समय के साथ एंटीबॉडी के स्तर में गिरावट देखी गई है, हालांकि कि गंभीर रोग को रोकने में यह महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है.
प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस और वैक्सीन को याद रखती है ताकि जब किसी संक्रमण का सामना हो तो यह तेज़ी से अपनी प्रतिक्रिया दे सके.
हमारे शरीर में "स्मृति टी-कोशिकाएं" होती हैं, और बी-कोशिकाओं की प्राथमिकता मांग के हिसाब से एंटीबॉडी पैदा करना है.
संक्रमण के एक साल से भी अधिक समय के बाद इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया के प्रमाण मिले हैं और वैक्सीन के परीक्षणों में इसके स्थायी फायदे भी देखे गए हैं.
इंपीरियल कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर पीटर ओपेनशॉ कहते हैं, यह कितना स्थायी है, इसे देखने के लिए हम इंतज़ार कर रहे हैं."
शरीर में इम्युनिटी कहां होती है?
यह मायने रखता है. नाक और फेफड़ों में एंटीबॉडी (इसे इम्युनोग्लोबुलिन एएस के नाम से जाना जाता है) का एक पूरा अलग समूह रहता है, उनकी (इम्युनोग्लोबुलिन जीएस की) तुलना में जिन्हें हम ख़ून में मापते हैं.
इन दोनों में से इम्युनोग्लोबुलिन एएस शरीर तक संक्रमण पहुंचने के रास्ते में अधिक महत्वपूर्ण बाधा है.
वैक्सीन की तुलना में प्राकृतिक संक्रमण इस एंटीबॉडी को बनाने में ज़्यादा मददगार हो सकते हैं क्योंकि हाथ पर दिए जाने वाले जैब की तुलना में ये नाक के ज़रिए होते हैं. नाक के वैक्सीन पर भी जांच की जा रही है.
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में टी-कोशिकाओं पर शोध कर रहे प्रोफ़ेसर पॉल क्लेनरमैन कहते हैं, "संक्रमण के स्थान से फर्क पड़ता है, भले ही वायरस वही क्यों न हो. लिहाजा हम प्राकृतिक संक्रमण और वैक्सीन के बीच महत्वपूर्ण अंतर की उम्मीद करेंगे."

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अतिरिक्त वैक्सीन और वायरस के बीच का संतुलन
इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि जिन वयस्कों ने किसी वैक्सीन की डोज़ नहीं ली है, अगर वे वैक्सीन लेते हैं तो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कहीं मजबूत होगी, चाहे उन्हें पहले कोविड क्यों न हुआ हो..
लेकिन दो अहम सवाल हैं:
- क्या वैक्सीन ले चुके वयस्क को बूस्टर डोज़ लेनी होगी, या क्या वायरस के संपर्क में आना ही काफी है?
- क्या बच्चों को वैक्सीनेशन की ज़रूरत होती है, या जीवन भर संक्रमण का सामना करने से एक अच्छी प्रतिरक्षा प्रणाली बनती है?
जीवन भर नियमित रूप से इम्युनिटी बढ़ाने का विचार कुछ संक्रमणों में उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जैसे कि आरएसवी (रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस) या चार अन्य कोरोना वायरस जिनके संक्रमण से लोगों को सामान्य सर्दी के लक्षण पैदा होते हैं.
ये आपको जितनी बार होते हैं, आपका इम्यून सिस्टम थोड़ा मजबूत हो जाता है और ये आपके बुढ़ापे तक जारी रहता है, जब इम्यून सिस्टम बिगड़ने लगता है और संक्रमण तब समस्या बन जाता है.
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प्रोफ़ेसर फिन कहते हैं, "यह साबित नहीं हुआ है, लेकिन पूरे समय वैक्सीनेशन पर खर्च करने की तुलना में ऐसा होने देना बहुत सस्ता और सरल हो सकता है."
साथ ही वे यह चेतावनी भी देते हैं कि "नहीं तो हम बूस्टर डोज़ के चक्र में पड़ सकते हैं, यह देखे बग़ैर कि इसकी ज़रूरत है भी या नहीं."
हालांकि वो कहते हैं कि "बच्चों के मामले में यह बहस पहले ही सही हो चुकी है" क्योंकि "40-50% बच्चे पहले ही संक्रमित हो चुके हैं और उनमें से अधिकतर या तो बीमार नहीं हुए या बहुत बीमार नहीं पड़े."
लेकिन इसके विरोध में ही तर्क हैं. प्रोफ़ेर रिले बच्चों में लंबे वक़्त तक कोविड संक्रमण की ओर इशारा करती हैं और प्रोफ़ेसर ओपनशॉ वायरस के दीर्घकालिक असर को लेकर घबराहट की ओर इशारा करते हैं जिससे शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं.
लेकिन प्रोफ़ेसर रिले कहती हैं कि संक्रमण होने के बाद वैक्सीन लेने से इम्यून सिस्टम के और मजबूती की संभावना दिखती है.
वे कहती हैं, "हमें वास्तव में विचार करने की ज़रूरत है कि क्या हम लोगों को जीवन में आगे बढ़ने का विश्वास देने के बजाय उन्हें डरा रहे हैं? अभी हम केवल लोगों की चिंता बढ़ाने के क़रीब हैं."
बेशक, मामलों के बढ़ने पर, हमारे पास अधिक विकल्प नहीं होंगे.
प्रोफ़ेसर क्लेनरमैन कहते हैं, मैं सोच रहा हूं कि क्या ये ऐसे ही चलेगा. अगर वायरस का फैलना जारी रहा तो क्या बूस्टर डोज़ भी प्रभावी रहेंगे?"
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