कोरोना से MIS-C: बच्चों को हो रही ये ‘नई बीमारी’ क्या है?

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    • Author, प्रशांत चाहल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

चार साल के अमन को आनन-फ़ानन में ग़ाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश) के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. डॉक्टरों का कहना था कि "बिना वक़्त ख़राब किये, उसे इलाज के लिए बच्चों के आईसीयू में भर्ती करना होगा."

डॉक्टरों को अमन की रिपोर्ट्स में कुछ असामान्य गड़बड़ियाँ दिखाई दी थीं जिन्हें लेकर वो चिंतित थे.

अमन की माँ, पूजा बताती हैं कि "उनके बेटे को क़रीब दो सप्ताह से हल्का बुखार (लगभग 99 डिग्री) था, आँखों में खुजली की शिक़ायत थी और अस्पताल पहुँचने से पहले उसने पेट में दर्द की शिक़ायत शुरू कर दी थी. इनके अलावा उसकी बाकी गतिविधियाँ सामान्य थीं और शारीरिक रूप से कोई अन्य परेशानी नहीं दिख रही थी."

लेकिन जब अस्पताल में अमन के पिता सूरज को डॉक्टरों ने बताया कि 'एक संक्रमण की वजह से उनके बेटे के हृदय के एक भाग में सूजन (इनफ़्लामेशन) आ गई है' तो वो हैरान रह गये.

डॉक्टरों ने कहा कि "अमन को एमआईएस-सी नामक समस्या है."

दुनिया के सबसे मशहूर मेडिकल जर्नलों में से एक 'द लैंसेट' के अनुसार, बच्चों में होने वाला 'मल्टीसिस्टम इनफ़्लामेट्री सिंड्रोम' यानी एमआईएस-सी एक ऐसा गंभीर रोग है जिसे फ़िलहाल कोविड-19 (सार्स-कोविड-2) से जोड़कर देखा जा रहा है.

पेशे से अध्यापक सूरज का पूरा परिवार अमन के बीमार पड़ने से पहले कोरोना वायरस से संक्रमित हुआ था. मई के दूसरे सप्ताह में ही पूरे परिवार ने इलाज के बाद अपना आइसोलेशन पूरा किया और सभी कोविड की जाँच में नेगेटिव आ गये. कोरोना संक्रमण के दौरान परिवार के बाकी सदस्यों से अलग, अमन को आँखों में इनफ़ेक्शन के अलावा कोई और गंभीर लक्षण नहीं था.

अमन की आरटी-पीसीआर रिपोर्ट नेगेटिव थी, लेकिन एंटीबॉडी टेस्ट में अमन के शरीर में पर्याप्त मात्रा में कोविड की एंटीबॉडी मिली थीं.

अमन का इलाज कर रहे नवजात एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अजीत कुमार ने बताया कि "अमन का ईसीजी ख़राब था. उनकी ईको (हृदय की जाँच) रिपोर्ट भी ठीक नहीं थी. कुछ अन्य हेल्थ मार्कर भी हिले हुए थे जिनका इस उम्र में अचानक गड़बड़ाना असामान्य बात है."

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पिछले कुछ दिनों में मामले बढ़े

डॉक्टर अजीत ने बताया, "जैसे-जैसे लोग कोरोना से ठीक हो रहे हैं, बच्चों में एमआईएस के केस बढ़े हैं. ये मुख्यत: कोरोना संक्रमण के बाद की परिस्थिति है. हालांकि, बच्चों में एमआईएस अभी रेयर है. लेकिन जिन बच्चों को ये हो रहा है, उसकी वजह का अब तक पता नहीं लगाया जा सका है. चूंकि इस बार की लहर में कोरोना संक्रमण का घनत्व काफ़ी ज़्यादा रहा, इसलिए बच्चों के मामले भी काफ़ी संख्या में आये हैं."

डॉक्टर अजीत कुमार के अस्पताल में बच्चों के छह आईसीयू बेड हैं और अधिकांश पर एमआईएस-सी के मरीज़ हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली राजधानी क्षेत्र में अब तक इस बीमारी के लगभग 200 मामले दर्ज किये गए हैं.

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, भारत के अलग-अलग राज्यों में बच्चों को हो रहे मल्टीसिस्टम इनफ़्लामेट्री सिंड्रोम को लेकर चिंता है. इस बारे में इंडियन अकेडमी ऑफ़ पीडिएट्रिक इंटेंसिव केयर ने बताया है कि पिछले कुछ दिनों में एमआईएस-सी के मामले बढ़े हैं.

संस्थान के मुताबिक़, एमआईएस-सी के मामलों में अचानक उछाल देखा गया है जिससे 4 से 18 साल के वो बच्चे प्रभावित हैं जिन्हें कोरोना हो चुका है. हालांकि, कुछ मामलों में छह महीने के बच्चों में भी इस बीमारी का असर देखा गया है.

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कैसे करें एमआईएस-सी की पहचान?

अमेरिकी संस्था सेंटर्स फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) मई 2020 से इस बीमारी का अध्ययन कर रही है.

सीडीसी के अनुसार, एमआईएस-सी एक रेयर (कम होने वाली), पर ख़तरनाक बीमारी है जिसे कोविड-19 से जोड़कर देखा जा रहा है.

अमेरिकी संस्था के अनुसार, इस बीमारी से बच्चों के हृदय, फ़ेफ़ड़े, गुर्दे, आँतें, मस्तिष्क और आँखों पर असर हो सकता है.

अमेरिकी शोधकर्ताओं के मुताबिक़, एमआईएस-सी होने पर कुछ बच्चों में गर्दन के दर्द, शरीर पर दाने होना, आँखों का सुर्ख होना और लगातार थकान रहने जैसी शिकायतें भी देखी गई हैं.

संस्था के अनुसार, इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि सभी बच्चों में एमआईएस-सी के लक्षण एक जैसे हों, यह ज़रूरी नहीं. अमेरिका में जून 2020 से इस बीमारी के कई मामले सामने आ चुके हैं.

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'शुरुआत छोटे-छोटे लक्षणों से होती है'

दुनिया के सबसे नामी मेडिकल जर्नल द लैंसेट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, "शोधकर्ताओं ने पाया कि इस बीमारी के बाद अस्पताल में रहने का औसत समय 7 से 8 दिन रहा. सभी बच्चों को बुखार था. क़रीब 73 प्रतिशत बच्चों को पेट दर्द या डायरिया की शिकायत थी और 68 प्रतिशत बच्चों को उल्टियाँ भी हो रही थीं."

दुनिया के अन्य बड़े संस्थानों द्वारा बताये गए लक्षणों के अलावा, ब्रिटेन के मशहूर मेडिकल जर्नल द बीएमजे ने कंजंक्टिवाइटिस यानी आँखों के संक्रमण को भी एमआईएस-सी का एक प्रमुख लक्षण माना है.

द बीएमजे - दुनिया के सबसे पुराने मेडिकल जर्नलों में से एक है. उसकी रिपोर्ट के मुताबिक़, कई बार एमआईएस-सी के लक्षण कावासाकी डिज़ीज़ से मिलते-जुलते होने की वजह से इन दोनों बीमारियों को जोड़कर भी देखा जा रहा है. लेकिन एमआईएस-सी एक अलग ही तरह का रोग है. एमआईएस-सी के रोगियों में हृदय और आँतों से जुड़ी परेशानियाँ देखी जा रही हैं जो कावासाकी डिज़ीज़ के लक्षणों से अलग हैं.

शोधकर्ताओं के अनुसार, एमआईएस-सी एक प्रोग्रेसिव (लगातार बढ़ने वाली) बीमारी है जिसकी शुरुआत छोटे-छोटे लक्षणों से होती है, पर बिना इलाज के यह बहुत तेज़ी से बढ़ती है और कुछ ही दिन में इससे कई अंग प्रभावित होकर एक साथ काम करना बंद कर सकते हैं.

वीडियो कैप्शन, कोरोना की तीसरी लहर आई तो बच्चों को कितना ख़तरा?

बच्चों पर इस बीमारी का कितना प्रभाव?

अमेरिकी संस्था सीडीसी के शोधकर्ता अब तक इसकी जानकारी नहीं जुटा पाये हैं कि किन बच्चों में ये बीमारी ज़्यादा हो रही है और क्यों हो रही है.

हालांकि, जिन बच्चों में एमआईएस-सी के लक्षण पाये गए, वो या तो कभी कोविड-19 से प्रभावित थे या फिर किसी ऐसे के संपर्क में थे जिन्हें कोविड-19 हुआ था.

सीडीसी के शोधकर्ताओं ने कहा है कि "अभी ये नहीं बताया जा सकता कि किस पूर्व-बीमारी वाले बच्चे को इससे ज़्यादा ख़तरा हो सकता है, किस तरह की सेहत वाले बच्चों को इससे ज़्यादा ख़तरा है और किन्हें एमआईएस-सी होने पर पहले उपचार दिया जाना चाहिए या किस पर ज़्यादा ग़ौर किये जाने की ज़रूरत है."

हालांकि, लैंसेट के शोधकर्ताओं ने एमआईएस-सी से पीड़ित कुछ बच्चों का अध्ययन कर यह बताने की कोशिश ज़रूर की है कि ये बीमारी आख़िर किस तरह से असर कर रही है.

लैंसेट द्वारा किये गए शोध में पाया गया कि इस बीमारी का शिकार हुए सभी बच्चों की सीआरपी और ईएसआर जैसी ख़ून की कुछ बुनियादी जाँचों के नतीजे ख़राब आये थे. इनके अलावा काफ़ी बच्चों की डी-डाइमर (ख़ून में थक्के जमने की जाँच) और हृदय से संबंधित जाँचों के नतीजे भी ख़राब पाये गए.

इस अध्य्यन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि लगभग 54 प्रतिशत बच्चों की ईसीजी (हृदय की जाँच) रिपोर्ट भी ठीक नहीं थी.

लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार, एमआईएस-सी का शिकार हुए 22 प्रतिशत बच्चों को वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ी और जिन बच्चों में एमआईएस-सी की पुष्टि हुई, उनमें से 71 प्रतिशत को इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती करवाना पड़ा. वहीं एमआईएस-सी का शिकार हुए बच्चों में से 1.7 प्रतिशत की मौत हो गई.

लैंसेट के मुताबिक़, एमआईएस-सी संभावित रूप से एक घातक बीमारी है, लेकिन समय पर पहचान और सही उपचार के ज़रिये अधिकांश बच्चों को बचाया जा सकता है. हालांकि, इस बीमारी के दीर्घकालिक परिणाम अभी ज्ञात नहीं हैं.

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एमआईएस-सी के जोखिम को कैसे कम करें?

इंडियन अकेडमी ऑफ़ पीडिएट्रिक इंटेंसिव केयर का भी मानना है कि सही समय पर बीमारी की रिपोर्टिंग और वक़्त रहते उपचार मिल जाने से एमआईएस-सी के जोखिम को काफ़ी घटाया जा सकता है.

मेडिकल जर्नल 'द बीएमजे' के अनुसार, एमआईएस-सी से पीड़ित ज़्यादातर बच्चों का इलाज 'इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोब्यूलिन' और स्टेरॉयड्स के ज़रिये किया जाता है. हालांकि, इस उपचार का बच्चों पर अनुकूल प्रभाव कितना है, इस बारे में अभी बहुत जानकारी उपलब्ध नहीं है.

लेकिन इस समस्या में लक्षणों की सही पहचान का महत्व समझाते हुए इंडियन अकेडमी ऑफ़ पीडिएट्रिक इंटेंसिव केयर ने कहा है कि जो माँ-बाप, ख़ासतौर पर कोरोना संक्रमित हो चुके परिवार, अपने बच्चों में एमआईएस-सी जैसे लक्षण पायें तो उन्हें डॉक्टर से इस बारे में बात ज़रूर करनी चाहिए.

संस्थान के अनुसार, कम क़ीमत पर होने वाली ख़ून की जाँचों, जैसे सीवीसी, ईएसआर और सीआरपी के ज़रिये भी इसका पता लगाया जा सकता है. ग़रीब परिवार सीआरपी जैसे तुलनात्मक रूप से सस्ते टेस्ट की मदद से इसका पता लगा सकते हैं.

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बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अजीत कुमार के मुताबिक़, अब अमन पूरी तरह ख़तरे से बाहर है. उसे अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी है. हालांकि, उसे कुछ वक्त के लिए दवाओं पर रहना होगा. लेकिन अमन के मामले में डॉक्टरों की बड़ी चिंता अब ख़त्म हो गई है.

डॉक्टर अजीत कुमार कहते हैं कि "अमन का सही समय पर अस्पताल पहुँचना, उनके लिए फ़ायदेमंद रहा. वरना बाद की स्थिति में अंगों में ख़ून जमने की शिकायत होने लगती जिससे लड़ना और मुश्किल होता है. ऐसा देखा गया है कि उस स्थिति में हम 100 में से किसी एक बच्चे को खो देते हैं."

इंडियन अकेडमी ऑफ़ पीडिएट्रिक इंटेंसिव केयर के अनुसार, भारत में 26 प्रतिशत आबादी 14 साल की उम्र से कम है और इसमें से आधी आबादी की उम्र पाँच साल से कम है.

कुछ विशेषज्ञों ने ऐसा कहा है कि भारत में कोरोना की तीसरी लहर संभावित रूप से इस वर्ग (बच्चों) को ज़्यादा परेशान कर सकती है. ऐसे में बाल रोग विशेषज्ञ बच्चों के लक्षणों पर ख़ास ध्यान देने को बहुत ज़रूरी मान रहे हैं.

(यहाँ अमन एक बदला हुआ नाम है. परिवार की गुज़ारिश पर इस रिपोर्ट में उनकी गोपनीयता बनाये रखी गई है.)

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