कोरोना अनलॉक: ये ग़लतियाँ दोहराईं, तो कौन करेगा भरपाई?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में लगातार कोरोना संक्रमण के नए मामलों में कमी देखने को मिल रही है. इसकी अहम वजह है अप्रैल और मई में बढ़ते मामलों के मद्देनज़र कई राज्य सरकारों की तरफ़ से लगाई गई पाबंदियाँ, जो बहुत हद तक लॉकडाउन जैसी थी.
लेकिन कम होते मामलों के बीच अब एक जून से मध्य प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र सहित कई राज्य अनलॉक की प्रक्रिया शुरू करने की बात कर रहे हैं.
वहीं झारखंड, पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्यों ने पाबंदियों की समयसीमा बढ़ा दी है.
"भारत में कोरोना संक्रमण की दूसरी घातक लहर इस बात का नतीजा है कि पहली लहर के बाद सरकार ने मान लिया था कि वो कोरोना से जीत चुके हैं. इस वजह से बिना सोचे समझे समय से पहले ही अनलॉक की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. लेकिन दूसरी लहर पहली लहर के मुक़ाबले ज़्यादा संक्रामक निकली."
मई के दूसरे हफ़्ते में अमेरिका के शीर्ष संक्रामक रोग विशेषज्ञ एंथनी फ़ाउची ने सीनेट की हेल्थ-एजुकेशन कमेटी के सामने दिए अपने बयान में ये बात कही थी.
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बदले हालात
ऐसे में इस बार भी पिछली बार वाली ग़लती ना दोहराई जाए, राज्य सरकारों को इसका बहुत ख़्याल रखना होगा. लेकिन ये भी सच है कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर पहली लहर से अलग है.
पहली लहर के बाद अनलॉक प्रक्रिया का असर कुछ महीनों तक रहा. फ़रवरी तक मामलों में कमी भी देखने को मिली.
अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर गौतम मेनन, डॉक्टर एंथनी फ़ाउची की बात से पूरी तरह इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "भारत में पहली लहर के बाद अनलॉक की प्रक्रिया पिछले साल जून-जुलाई में शुरू हुई थी. लेकिन कोरोना संक्रमण के मामलों में दोबारा तेज़ी फ़रवरी के बाद देखने को मिली. अगर भारत में नया वेरिएंट नहीं आता, तो स्थिति थोड़ी अलग होती. नया वेरिएंट इतना अधिक संक्रामक होगा, इसका अंदाज़ा किसी को नहीं थी."
हालाँकि ये बात भी सही है कि पिछली लहर की तुलना में इस बार परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं. इस बार राष्ट्रीय स्तर के लॉकडाउन की घोषणा नहीं हुई थी. राज्यों ने अपने स्तर पर स्थानीय हालात देखते हुए इसका एलान किया था. कुछ आर्थिक गतिविधियों को छूट के दायरे में रखा गया है और अब संक्रमण से लड़ने के लिए वैक्सीन जैसा हथियार भी है.

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पिछली बार की ग़लतियाँ
लेकिन क्या पिछली बार भारत सरकार और जनता से कोई चूक हुई थी?
मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की हेड डॉक्टर सुनीला गर्ग मानती हैं कि दोनों तरफ़ से ग़लतियाँ हुई थी, जिसे इस बार नहीं दोहराना चाहिए. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "सबसे पहली बात अनलॉक का मतलब मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और बार-बार हाथ धोने से छुट्टी क़त्तई ना समझे. जब तक वायरस है, तब तक इन नियमों का पालन करना है. ये बात जनता को याद रखना चाहिए. पहली लहर के बाद, लोगों ने अनलॉक का मतलब मास्क की छुट्टी समझ लिया था. सोशल डिस्टेंसिग को बाय-बाय कह दिया था."
इस बार राज्य सरकारों को इन नियमों को तोड़ने पर ज़्यादा जुर्माना और ठोस सज़ा का प्रावधान घोषित करना चाहिए, ताकि जनता इन्हें ना भूले. इनको सख़्ती से अमल में लाने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की रहनी चाहिए.
वो आगे कहती है, "बसों और सार्वजनिक परिवहन को अनलॉक करने पर उसमें पहली बार 30 फ़ीसद यात्रियों को ही आवाजाही की इजाज़त दी जाए. ऐसा ना करने पर जुर्माना या चालान और सज़ा हो. पिछली बार राज्य सरकारों ने अनलॉक के नियम बनाए तो थे, लेकिन उसे सही से लागू नहीं किया. इस बार वो भूल नहीं करनी चाहिए. उसी तरह से दफ़्तर भी ज़रूरत के हिसाब से खोले जाएँ. शुरुआत में 30 फ़ीसद स्टॉफ़ को ही आने के लिए कहा जाए. उसमें भी रोटेशन की गुंज़ाइश हो, तो वो की जाए. वहाँ थर्मल चेकिंग से अब काम नहीं चलेगा. अलग से दफ़्तर में मॉनिटरिंग प्रक्रिया अपनानी होगी. डबल मास्क पहनने की पहल शुरू करनी होगी."

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टीकाकरण में तेज़ी
16 जनवरी से भारत में टीकाकरण की शुरुआत हुई. सबसे पहले डॉक्टरों को टीका लगाने में प्राथमिकता दी गई. लेकिन आज तक भारत में सभी डॉक्टरों को वैक्सीन की दोनों डोज़ नहीं लगी है.
जबकि दुनिया के दूसरे देशों में ऐसी स्थिति नहीं है.
डॉक्टर सुनीला कहती हैं, "राज्य सरकारों को केंद्र के साथ मिल कर अनलॉक प्रक्रिया के तहत ये सुनिश्चित करना है कि किन लोगों को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन लगाने की ज़रूरत है."
उदाहरण के तौर पर दिल्ली में अगर मेट्रो लाइफ़ लाइन है, तो उनके कर्मचारियों को टीकाकरण में प्राथमिकता दी जानी चाहिए. वैसे ही अगर मुंबई में कामकाज के लिहाज़ से मुंबई लोकल ज़रूरी है, तो वैक्सीनेशन में उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
अमेरिका में सीडीसी ने मास्क उतारने की गाइडलाइन तब जारी की, जब तक़रीबन 40 फ़ीसद आबादी को दोनों डोज़ लग चुकी है.
ब्रिटेन में भी तक़रीबन 35 फ़ीसद आबादी को टीके की दोनों डोज़ लग चुकी हैं. जबकि ब्रिटेन अब भी पूरी तरह अनलॉक नहीं है.
दूसरी तरफ़ भारत में केवल तीन फ़ीसद आबादी को ही दोनों डोज़ लगी है.
इस वजह से जानकार मानते हैं कि भारत के राज्यों को अनलॉक करने के पहले अब ज़्यादा सोचने की ज़रूरत है, क्योंकि नए वेरिएंट भी देखने को मिल रहे हैं, जो वैक्सीन की इम्यूनिटी को भी छका रहे हैं.

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दूसरे देशों ने कैसे किया अनलॉक
पुरानी कहावत है - दूसरों की ग़लतियों से सीखने वाला ज़्यादा बुद्धिमान होता है.
कई जानकार मानते हैं कि भारत को ब्रिटेन और ब्राज़ील की ग़लतियों से सबक़ लेना चाहिए.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के पूर्व मुख्य सलाहकार डोमिनिक कमिंग्स ने बीते दिनों स्वास्थ्य समिति के सामने पेश होकर कहा कि वहाँ के प्रधानमंत्री ने दूसरे लॉकडाउन की विशेषज्ञों की सलाह को पहले दरकिनार कर दिया था.
दि लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्राज़ील सरकार ने भी कोविड-19 महामारी को शुरुआत में गंभीरता से नहीं लिया था. जिसकी वजह से ज़्यादा लोगों ने जान गँवाई.
इस बार भारत में राष्ट्र स्तर पर पाबंदियाँ नहीं लगाई गईं. लेकिन जानकारों की मानें, तो संक्रमण दर में जो कमी आई है वो मुख्यत: राज्य सरकारों की पाबंदियों और सख़्ती की वजह से आई है. उनके हटते ही मामले एक बार फिर बढ़ सकते हैं.
अब भी कुछ राज्यों के मेट्रों शहरों में मामले घट रहे हैं, तो कई राज्यों में गाँवों में स्थिति अब भी नियंत्रण से बाहर है.
ऐसे में सबक़ किस देश से कितना लेना है, उसका सटीक फ़ॉर्मूला नहीं हो सकता.
लेकिन संक्रमण दर में कमी, रोज़ाना मौत के मामलों में कमी और स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव कम होना कुछ पैमाने हैं, जिनके आधार पर राज्य सरकारें अनलॉक का फ़ैसला कर सकती है.
प्रोफ़ेसर गौतम मेनन के मुताबिक़, "हर देश का अनुभव संक्रमण के मामले में अलग रहा है. जिन देशों ने इस पर जीत हासिल की है, वो छोटे देश हैं, आबादी भारत के मुक़ाबले बहुत कम है, इनमें से ज़्यादातर छोटे द्वीप हैं. वहाँ लॉक-अनलॉक की प्रक्रिया आसान भी है क्योंकि दूसरे देश से लोगों के आने का रास्ता या एंट्री प्वाइंट एक ही है. जहाँ भी भारत जैसे कई एंट्री प्वाइंट हैं, उन देशों में रह रह कर लॉकडाउन लगाने की कितनी बार नौबत आई, ये हम सब जानते हैं.
अनलॉक के साथ लोग मास्क पहनने को आदत में शुमार कर ले, बंद जगहों पर जमा होने की आदत को बदलें और अपनी बारी आने पर टीका लगवाएँ, तो बहुत हद तक अनलॉक किया जा सकता है."

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बंद कमरों में सावधानी
प्रोफ़ेसर गौतम मानते हैं कि अनलॉक करते समय राज्य सरकारों को वेंटिलेशन पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए.
जिन इलाक़ों में संक्रमण की रफ़्तार कम है और क़ाबू में है, वहाँ खुले में हो रही आर्थिक गतिविधियों को बंद रखने का कोई औचित्य नहीं हैं. इसके पीछे दलील है कि चूंकि ये ड्रापलेट से फैलने वाली बीमारी है, बंद कमरों में तेज़ी से फैल सकती है.
मतलब ये कि बंद जगहों पर होने वाली गतिविधियाँ जैसे पार्लर, जिम, रेस्तरां इन सबको अनलॉक का फ़रमान बाद में जारी किया जाना चाहिए. डॉक्टर सुनीला गर्ग भी इससे इत्तेफ़ाक़ रखती हैं.
उनके मुताबिक़ शॉपिंग मॉल, सिनेमा हॉल जैसी चीज़े रोज़मर्रा की ज़रूरत नहीं हैं. जान बचेगी, तो इनका लुत्फ़ हम आगे भी उठा पाएँगे. रेस्तरां, शॉपिंग मॉल, सिनेमा हॉल हर हाल में सबसे अंत में खोले जाने चाहिए, क्योंकि वहाँ मॉनिटरिंग मुश्किल होगी.

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राशन ख़रीदने की समयसीमा
लेकिन सब्ज़ी और राशन की दुकानों को तीन घंटे या कम अवधि के लिए खोले जाने को लेकर दोनों जानकारों की राय अलग है.
प्रोफ़ेसर गौतम कहते हैं, "तीन घंटे के लिए ऐसी दुकानों को खोलने का मतलब है, एक जगह भीड़ को दावत देना. इस समय सीमा को बढ़ाना चाहिए ताकि लोगों का जमावड़ा ना हो."
जबकि डॉक्टर सुनीला कहती है कि तीन घंटे तक इन दुकानों को खुला रखने से मॉनिटरिंग आसान है. किसने दो गज़ की दूरी रखी है या नहीं, किसने मास्क पहना है या नहीं, कहाँ भीड़ जमा हो रही है? ये देखना प्रशासन के लिए आसान है. उनका सुझाव है, अलग-अलग मोहल्ले में अलग-अलग समय पर दुकानें खोलने देने की इजाज़त देना एक उपाय हो सकता है.

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ज़िला स्तर पर बने रणनीति
लेकिन पूरे राज्य में एक अनलॉक नीति कारगर नहीं होगी. इसलिए डॉक्टर सुनीला 'स्मार्ट अनलॉक' की प्रक्रिया की बात करती हैं.
महाराष्ट्र का उदाहरण देकर वो समझाती हैं, मुबंई में मामले कम सामने आ रहे हैं, लेकिन पूरे महाराष्ट्र में पॉज़िटिविटी रेट अब भी ज़्यादा है. इसलिए मुंबई के लिए अनलॉक अलग तरह से होगा, बाक़ी दूसरे ज़िले के लिए अलग. वैसे ही दिल्ली को भी करना होगा.
एक महत्वपूर्ण आधार ये हो सकता है कि जिन ज़िलों में पिछले 14 दिनों में एक भी नए मामले सामने ना आए हों, उन्हें पहले अनलॉक करें. दो दिन पहले भारत में कुल 180 ज़िले ऐसे थे.
लेकिन उन ज़िलों में सब कुछ ना खोलें. शादी में शामिल होने वालों पर पाबंदी बनाए रखें, एक जगह लोगों के जमावड़े की इजाज़त अब भी नहीं देनी है, कुछ मेडिकल सुविधाओं को और बढ़ाएँ, मार्केट खोलने के लिए रोटेशन का फ़ॉर्मूला तय कर सकते हैं.

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टेस्टिंग
डॉक्टर सुनीला अनलॉक के लिए MTV फ़ॉर्मूले को आधार बनाने की बात करती हैं. M- मास्किंग, T- टेस्टिंग, ट्रैकिंग और ट्रेसिंग, V - वैक्सीनेशन. उनका कहना हैं, जहाँ ये सब ठीक से संभव हैं, वहाँ अनलॉक किया जा सकता है.
ब्रिटेन में अब जगह-जगह टेस्टिंग कैम्प लगा कर लोगों की रैंडम जाँच की जा रही है. कई जगह स्कूलों में टीचर्स को सीमित संख्या में टेस्टिंग किट दी गई है.
प्रोफ़ेसर गौतम कहते हैं ये बहुत ही अच्छा तरीक़ा है.
टेस्टिंग की सुविधा किसी भी इंसान के लिए जितनी बार चाहें उतनी बार उपलब्ध होनी चाहिए. इससे आइसोलेट करने में आसानी होती है.
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