मोदी सरकार के 'रिकॉर्ड टीकाकरण' की सच्चाई, संयोग या प्रयोग?

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

22 जून को ट्विटर पर बहुत सारे लोग 'थैंक यू मोदी जी' लिख रहे थे. वजह थी, वो रिकॉर्ड जो 21 जून को बना. सोमवार को भारत ने कोरोना के ख़िलाफ़ टीकाकरण अभियान में नया रिकॉर्ड बनाते हुए 88 लाख से ज़्यादा लोगों का टीका लगाया.

भारत में 16 जनवरी से शुरू हुए टीकाकरण अभियान में पिछले पाँच महीने में इतने टीके एक दिन में पहले कभी नहीं लगे.

चीन के अलावा किसी दूसरे देश ने ये मुकाम अभी तक हासिल नहीं किय़ा है.

इस वजह से ट्विटर पर ही नहीं, समाचार चैनलों में, अख़बारों में, हर जगह इस बात की चर्चा थी. इन गलियारों से चर्चा बढ़ते-बढ़ते स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी पहुँच गई.

एक पत्रकार ने बुधवार को संवाददाता सम्मेलन में पूछा, "18 से अधिक उम्र वालों के लिए टीकाकरण अभियान की शुरुआत 1 मई से हुई. लेकिन 21 जून को एक दिन में इतना ज़्यादा टीकाकरण कैसे हुआ? इससे पहले ये क्यों नहीं संभव हो पाया? जब केंद्र ने अपने हाथ में टीकाकरण की ज़िम्मेदारी ले ली, तो ही ऐसा कैसे संभव हो पाया? क्या 'थैंक यू मोदी जी' का मैसेज देने के लिए ये किया गया था?"

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जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने कहा, "ये अचानक नहीं हुआ है. ये बात महत्वपूर्ण है. मैं ये क्यों कह रहा हूँ इसके पीछे कारण है. अगर आप 1 जून से 21 जून तक औसतन प्रतिदिन लगी वैक्सीन डोज़ की संख्या देखें, तो लगभग 34 लाख 62 हज़ार लोगों को हर दिन वैक्सीन लगी है. ये राज्य और केंद्र सरकारों के बीच अच्छे तालमेल का नतीजा है. जब वैक्सीन उपलब्ध हो और उसके बारे में राज्यों को पहले से जानकारी हो, तो क्षमता बढ़ जाती है."

मतलब ये कि पहले भारत में 34 लाख वैक्सीन औसतन प्रतिदिन लग रही थी, जो 21 जून को 88 लाख तक पहुँच गई. यानी दोगुने से भी ज़्यादा.

इस रिकॉर्ड पर कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों पर 'जमाखोरी' का आरोप लगाते हुए तंज कसा. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "रविवार को वैक्सीन की जमाखोरी, सोमवार को वैक्सीन लगाएँ और मंगलवार को दोबारा से रफ़्तार धीमी कर लें. 'एक दिन' में 'रिकॉर्ड टीकाकरण' का यही सीक्रेट मंत्र है. मुझे उम्मीद है कि इस कारनामे को गिनीज़ बुक़ ऑफ़ रिकॉर्ड में ज़रूर जगह मिलेगी."

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सरकार की सफ़ाई और विपक्ष के आरोप की पड़ताल इसलिए भी ज़रूरी हो जाती है कि 88 लाख टीकाकरण का आँकड़ा अगले ही दिन 54 लाख के क़रीब पहुँच गया.

फिर एक दिन में टीकाकरण की रफ़्तार में ब्रेक क्यों लग गई? - इसका स्पष्टीकरण अभी आना बाक़ी है.

भारत सरकार के कोविन डेशबोर्ड पर उपलब्ध डेटा से ही इस सवाल का जवाब मिलता है. ज़रूरत है 21 जून को जिन राज्यों ने टीकाकरण में टॉप का स्थान हासिल किया, उनके आँकड़ों को ग़ौर से देखने की.

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इमेज कैप्शन, ये आँकड़े 07 जून से हैं, जिस दिन पीएम मोदी ने वैक्सीन पॉलिसी में बदलाव किया था.

बीजेपी शासित राज्यों का बेहतर प्रदर्शन

सबसे पहले बात मध्य प्रदेश की. मध्यप्रदेश में 21 जून को लगभग 17 लाख लोंगो का टीकाकरण हुआ. जबकि 20, 19, 18 जून को ये संख्या काफ़ी कम (कुछ हज़ार) थी. वही 22 जून को क़रीब पाँच हज़ार ही टीके लगे. यानी 21 जून के मुक़ाबले 99 फ़ीसद की कमी.

21 जून को तेज़ टीकाकरण करने वाले राज्य में दूसरे नंबर पर कर्नाटक राज्य था. योग दिवस के दिन कर्नाटक में 11 लाख टीके लगे. 20 जून को 68 हज़ार, 19 जून को 2 लाख 66 हज़ार और 18 जून को 1 लाख 92 हज़ार टीके लगे.

रिकॉर्ड बनाने के अगले ही दिन वहाँ टीकाकरण की रफ़्तार 11 लाख से घट कर 3 लाख 92 हज़ार पर आ गई. यानी 70 फ़ीसदी की कमी.

उत्तर प्रदेश में पिछले पाँच दिन की बात करें, तो कमोबेश 4-5 लाख टीके रोज़ लग रहे थे. 21 जून को ये बढ़ कर सवा 7 लाख हो गया था. और 22 जून को बढ़ कर 7 लाख 92 हज़ार हो गया. यानी उत्तर प्रदेश में 21 जून की रफ़्तार 22 जून को और तेज़ हुई.

बिहार का हाल बाक़ी राज्यों से थोड़ा बेहतर पहले भी था. 21 जून को 5 लाख से ज़्यादा टीके लगे. इससे पहले 16 जून को भी तक़रीबन इतने ही टीके लगे थे.

गुजरात में 2-3 लाख टीके पिछले पाँच दिन से लग रहे थे, सोमवार को ये 5 लाख पहुँच गया और 22 जून को सवा 4 लाख लोगों को टीका लगा.

लेकिन हरियाणा का मामला मध्यप्रदेश जैसा ही था. 18, 19, 20 जून को वहाँ महज़ कुछ हज़ार लोगों को टीके लग रहे थे, जो अचानक 21 जून को 5 लाख पहुँच गया. और 22 जून को दोबारा महज़ 75 हज़ार पर जा पहुँचा.

ग़ौरतलब है कि ये राज्य, 21 जून के रिकॉर्ड टीकाकरण में टॉप के छह राज्य थे. ये संयोग हो सकता है कि सभी राज्यों में बीजेपी सत्ता में है या भागीदार है.

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वैक्सीन की रिकॉर्ड मात्रा में उपलब्धता

यहाँ एक और संयोग है कि इन राज्यों में इतनी ज़्यादा मात्रा में टीके की उपलब्धता भी थी.

देश के जाने माने जन-नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ डॉक्टर चंद्रकांत लहरिया कहते हैं कि रिकॉर्ड बनाने की होड़ में कई राज्यों ने अपने पूरे महीने के वैक्सीन स्टॉक में से 50-70 फ़ीसदी एक ही दिन में ख़र्च कर दिया.

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दूसरी तरफ़ दिल्ली जैसा राज्य भी है, जहाँ राज्य की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने केंद्र पर 21 जून के लिए वैक्सीन उपलब्ध नहीं कराने का आरोप लगाया.

आरोप-प्रत्यारोप का दौर ऐसा चला कि भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन से लेकर शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी तक इसमें क़ूद पड़े. राज्य सरकार ने भी अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोड़ी. मोर्चे पर उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और उनकी साथी आतिशी ने भी बयान दिए.

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दिल्ली सरकार का आरोप था कि 21 जून के लिए केंद्र ने वैक्सीन नहीं दी थी. जो वैक्सीन उनके पास 21 जून को थी, वो 45 साल से ऊपर के लोगों के लिए थी और 18-44 साल वालों के लिए नहीं थी. उन्होंने केंद्र सरकार से 45 साल वालों के लिए मौजूद वैक्सीन को 18-44 साल वालों के लिए इस्तेमाल करने की इजाज़त माँगी, लेकिन नहीं मिली.

दूसरी तरफ़ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने आरोप लगाया कि दिल्ली के पास 21 जून को तक़रीबन 11 लाख वैक्सीन मौजूद थी, और दिल्ली ने उस दिन केवल 76 हज़ार लोगों का टीकाकरण किया.

एक तथ्य यह भी है कि 21 जून को जब बीजेपी शासित राज्यों में टीकाकरण के नए रिकॉर्ड बने, उस दिन दिल्ली 21वें स्थान पर रहा.

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ग़ैर बीजेपी शसित राज्य की कहानी

21 जून के रिकॉर्ड टीकाकरण की सूची में 20वें स्थान पर छत्तीसगढ़ का नंबर है. जहाँ कांग्रेस की सरकार है.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव ने बीबीसी से बातचीत कहा, "छत्तीसगढ़ को 21 जून के लिए कोई नया स्टॉक नहीं मिला था. देश में वैक्सीन का उत्पादन ही सीमित है, एक दिन 30 लाख से ज़्यादा वैक्सीन बन ही नहीं रही है. हमारे पास 45 साल से अधिक उम्र वालों के लिए 18 लाख वैक्सीन का स्टॉक था. 18 प्लस कैटेगरी के लिए राज्य सरकार ने जो वैक्सीन ख़रीदी थी, उनमें से 1-2 लाख वैक्सीन बची थी. दोनों मिला कर हम अपना टीकाकरण अभियान चला रहे हैं. नया स्टॉक अभी आना बाक़ी है."

तो फिर राज्य सरकार 21 जून को 'रिकॉर्ड' टीकाकरण अभियान में क्यों पिछड़ गई? इस पर उन्होंने कहा, "मध्यप्रदेश ने योग दिवस के दिन योग शिविरों में आए लोगों को 14 हज़ार वैक्सीनेशन साइट बना कर पूरा अभियान चलाया. ऐसी जानकारी मुझे मिली है. एक दिन में मध्यप्रदेश में 17 लाख वैक्सीन लग सकता है, ये ज़रूर दिखा, लेकिन हर रोज़ वो लगा सकें ये हो नहीं सकता. ये भी सच है क्योंकि उत्पादन सीमित है. हम ऐसा कुछ नहीं करना चाहते थे. हम जल्दबाज़ी में नहीं है. हमारा मानना है कि धीरे-धीरे ही सही हर दिन वैक्सीन लगनी चाहिए. हमने 4 लाख डोज़ प्रतिदिन का टारगेट ख़ुद के लिए रखा है. 18 लाख वैक्सीन हमारे पास अभी है. यानी अगले पाँच दिन का स्टॉक हमारे पास है."

छत्तीसगढ़ में 21 जून को तक़रीबन 83 हज़ार वैक्सीन की डोज़ लगी थी.

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यही हाल ग़ैर बीजेपी शासित राज्य झारखंड का भी है. प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग से बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक़ 21 जून को उनके पास क़रीब 4 लाख वैक्सीन का स्टॉक बचा था. जिसमें से सोमवार को लगभग 98 हज़ार वैक्सीन डोज़ इस्तेमाल की गई. अब जून के बाक़ी के दिनों के लिए उनके पास पर्याप्त डोज़ भी नहीं बची है.

यहाँ ग़ौर करने वाली बात ये है कि दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य 45 साल के ऊपर वाले ज़्यादातर लोगों को पहली डोज़ लगा चुके हैं, कुछ लोग दो टीके का अंतर बढ़ाए जाने की वजह से इंतजार कर रहे हैं, कुछ लोगों को कोरोना होने की वजह से 3 महीने बाद वैक्सीन लगेगी और कुछ वैक्सीन लगाने को लेकर अब भी हिचक रहे हैं. इस वजह से दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के पास 45 साल वालों के लिए रखा गया स्टॉक बचा हुआ है.

राजस्थान में भी कांग्रेस की सरकार है. 21 जून को टीकाकरण में गै़र बीजेपी शासित राज्यों में सबसे अच्छा प्रदर्शन राजस्थान का रहा है. कुल मिला कर उसका स्थान 7वां था. 21 जून को वहाँ साढ़े 4 लाख वैक्सीन की डोज़ लगी थे. लेकिन जुलाई में वैक्सीन की कमी की चिंता राज्य के स्वास्थ्य मंत्री को अभी से सता रही है. इस बावत उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को चिट्ठी लिख कर पहले से ही ज़्यादा वैक्सीन उपलब्ध करने की माँग की है.

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प्राइवेट अस्पतालों का हाल

21 जून के रिकॉर्ड टीकाकरण में एक नेरेटिव जिस पर ध्यान नहीं जा रहा है वो है प्राइवेट अस्पतालों की भागीदारी.

प्रधानमंत्री मोदी की ओर से वैक्सीन पॉलिसी में बदलाव के बाद 75 फ़ीसदी टीका केंद्र सरकार ख़रीद रही है और 25 फ़ीसदी टीका प्राइवेट अस्पतालों के लिए उपलब्ध है.

कोविन पर उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक़ बुधवार को लगभग 50 हज़ार साइट पर टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है, जिनमें से 1600 साइट ही प्राइवेट हैं. पिछले दो-तीन दिन से ये आँकड़ा इसी के आस-पास है. यानी जितनी संख्या में उनकी भागीदारी होनी चाहिए, वो नहीं हो पा रही है.

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