रिलायंस जियो ग्लास में इस्तेमाल होने वाली मिक्स्ड रिएलिटी तकनीक क्या है?

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- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड ने बीते सप्ताह मिक्स्ड रिएलिटी जियो ग्लास लाने का एलान किया. कंपनी ने एक डेमो देकर बताया कि लोग कैसे इस नई तकनीक का इस्तेमाल कर पाएंगे.
कंपनी ने बताया कि कैसे ये तकनीक बच्चों की वर्चुअल क्लासरुम में पढ़ाई और वर्चुअल मीटिंग्स को आसान बनाएगी. इसके साथ क़रीब 25 मोबाइल एप्स को भी जोड़ने की बात कही गई है.
रिलायंस इडस्ट्रीज़ लिमिटेड के किरण थॉमस ने अपने बयान में कहा, "ये एक आधुनिक तकनीक है जो कि यूज़र्स को एक बेहतरीन मिक्स्ड रिएलिटी सर्विस और इमर्सिव एक्सपीरियंस देगी."
इमर्सिव एक्सपीरिंयस का मतलब होता है 3D का इस्तेमाल कर यूज़र को एक ऐसा अनुभव देना जिससे उसे लगे कि वो उनसे घिरा है, और उन्हीं चीज़ों के बीच मौजूद है.
मिक्सड रिएलिटी को समझने के लिए पहले वर्चुअल रिएलिटी और ऑग्मेंटेड रिएलिटी को समझना ज़रूरी है.
वर्चुअल रिएलिटी क्या है?

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शरतचंद ऐथल यूनिटी टेक्नॉलॉजी नाम की एक कंपनी के लिए काम करते हैं जो कि कई वर्चुअल और ऑग्मेंटेड रिएलिटी कंपनियों को प्लेटफ़ॉर्म देती है. वो कहते हैं, "आसान शब्दों में कहा जाए तो वर्चुअल रिएलिटी और ऑग्मेंटेड रिएलिटी को जोड़ दे, तो मिक्स्ड रिएलिटी बनता है."
किसी मॉल में या गेंमिंग स्टेशन पर आंखों में एक बड़ा चश्मा लगाए ख़ुद की दुनिया में खोए लोगों को आपने देखा होगा. ये लोग जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे होते हैं, उसे वर्चुअल रिएलिटी कहते हैं.
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एक बार आपने वर्चुअल रिएलिटी ग्लास लगा लिए, तो फिर आप अलग दुनिया में चले जाते हैं, आप ख़ुद को एक अलग माहौल में पाते हैं. आप नदी पर, पहाड़ों पर या किसी बड़ी बिल्डिंग की छत पर होने जैसा भी महसूस कर सकते हैं. आपके आसपास से कई चीज़ें ग़ुजर रही होती हैं, आप उन्हीं से इंटरैक्ट करते हैं. आपकी असल दुनिया यानि आपके आसपास क्या हो रहा है, इस दौरान आपको यह पता भी नहीं होता.
वर्चुअल रिएलिटी का चलन पिछले कुछ दिनों में काफ़ी बढ़ा है. गेमिंग इंडस्ट्री हो या शिक्षा से जुड़े एप, वर्चुअल रिएलिटी में कई तरह की कंपनियों ने निवेश किया है.

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कुछ दिनों पहले मैं एक ऐसी कंपनी से मिला जो वर्चुअल रिएलिटी की मदद से मशीनों के ट्यूटोरियल बनाती है. एक वॉशिंग मशीन कैसे काम करता है, ये दिखाने के लिए यह तकनीक आपको मशीन के अंदर ले जा सकती है और आप ख़ुद को धुलते हुए कपड़ों के बीच महसूस कर सकते हैं.
सेना के लिए ट्रेनिंग और दूसरी जटील मशीनों की ट्रेनिंग, डॉक्टरों को सर्जरी की ट्रेनिंग जैसे कई जटिल कामों के लिए वर्चुअल रिएलिटी का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.
आमतौर पर वर्जुअल रिएलिटी ग्लास के साथ एक मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल होता है जिसे हेडसेट से सामने लगाया जाता है.
ऑग्मेंटेड रिएलिटी कैसे है अलग?
अब बात करते हैं ऑग्मेंडेट रिएलिटी की.
ऑग्मेंटेड रिएलिटी को समझने का सबसे अच्छा उदाहरण है मशहूर गेम, पोकिमॉन गो. आपको याद होगा कैसे दुनियाभर के गेमर्स पोकिमॉन को खोजते-खोजते अलग अलग और ख़तरनाक जगहों पर जाने लगे थे. पोकिमॉन उन्हें उनके आसपास, किसी टेबल पर, किसी सड़क पर या किसी पहाड़ की चोटी पर नज़र आता था. ऑग्मेंटेड रिएलिटी वर्चुअल रिएलिटी से इसी मायने में अलग है.

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ऑग्मेंडेट रिएलिटी आपको किसी दूसरी दुनिया में नहीं ले जाती, ऑग्मेंटेड रिएलिटी से जुड़ी चीज़ें आपको अपने आसपास, जिस जगह पर आप हैं, वहां दिखती हैं. इस तकनीक का इस्तेमाल ऑग्मेंटेड रिएलिटी ग्लास पहन कर या अपने स्मार्टफ़ोन और टैबलेट पर किया जा सकता है.
कई शॉपिंग कंपनियां अपने ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल पर इसका इस्तेमाल करती हैं. इसकी मदद से आप किसी कंपनी के कपड़े, चश्मे या गहनों को ख़ुद के ऊपर वर्चुअली ट्राई कर सकते हैं.
अगर आपको अपने घर के लिए एक सोफ़ा लेना है तो फ़ोन के कैमरे को उस कोने में फ़ोकस करिये जहां सोफ़ा रखना है, फ़िर किसी सोफ़े को सेलेक्ट कर वर्चुअली वहां रख दीजिए. इससे ये समझ में आ जाएगा कि वो सोफ़ा उस जगह पर जंच रहा है या नहीं.
मिक्सड रिएलिटी कैसे अलग है?
मिक्सड रिएलिटी ऑग्मेंडेट रिएलिटी को अगले लेवल पर ले जाती है. मिक्स्ड रिएलिटी में ऑग्मेंटेड रिएलिटी की तरह ही चीज़ें आपके आसपास ही दिखती हैं लेकिन मिक्स्ड रिएलिटी में आप इन चीज़ों से बेहतर तरीके से इंटरैक्ट करते हैं.
ये चीज़ें आपके साथ वैसे पेश आएंगी कि जैसे आपके आसपास की दुनिया की असली चीज़ें. यह आपको जवाब देंगी और आपके एक्शन पर रिएक्ट करेंगी.
अगर आप अपने ऑफ़िस में बैठे हैं और किसी दूसरे ऑफ़िस में बैठे मित्र से मिक्सड रिएलिटी की मदद से बात कर रहे हैं, तो वह आपको अपने ऑफ़िस के बाकि दूसरे लोगों और चीज़ों से साथ सामने नज़र आएगा.
इसी तरह अगर आप किसी मिक्स्ड रिएलिटी चश्मा लगाकर कोई वीडियो देख रहे हैं, तो वीडियो देखते देखते आप खाना भी बना सकते हैं. आप दोनों ही चीज़ों को अपने सामने देख सकते हैं.

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शरतचंद ऐथल बताते हैं, "मिक्सड रिएलिटी की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि ऑग्मेंटेड रिएलिटी की तरह आपको किसी मोबाइल या टैबलेट का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता, आपको एक हैंडसेट की ज़रुरत नहीं है, आप उन चीज़ों को फ़ोन पर नहीं देख रहे होते हैं, अपने चश्मे में देखते हैं."
ऐथल आगे कहते हैं, "आप सुबह उठते हैं, अपने कुछ काम निपटाने के बाद मोबाइल फ़ोन चेक करते हैं, इस तकनीक की मदद से ये मुमकिन है कि अपने हाथों में मोबाइल न लें, इस चश्मे को लगाएं और आप अपने दिन के लिए तैयार हैं."
ऐसे ही दूसरे एप्स का इस्तेमाल भी आप मिक्सड रिएलिटी में कर सकते हैं, अपने दूसरे कामों के साथ साथ. इन एप्स को आप एक रिमोट से कंट्रोल से ऑपरेट कर सकते हैं या फिर सिर या हाथ हिलाने जैसे संकेतों की मदद से.
पहले से मौजूद हैं मिक्स्ड रिएलिटी तकनीक
माइक्रोसॉफ़्ट,ऑक्यूलस जैसी कई बड़ी कंपनियां पहले ही मिक्सड रिएलिटी तकनीक लेकर बाज़ार आ चुकी हैं, हालांकि ये तकनीक अभी आम लोगों के बीच उतनी लोकप्रिय नहीं है.

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ऐथल के मुताबिक, "माइक्रोसॉफ्ट का होलोलेंस एक बहुत आधुनिक तकनीक है, आप 3डी सैकेनिंक कर सकते हैं और हैंड ट्रैंकिंग जैसी तमाम दूसरी चीज़ें भी इसमें हैं."
आम लोगों तक ऐसी तकनीक से नहीं पहुचने का एक बड़ा कारण इनका महंगा होना है. जियो ने अभी तक इसकी क़ीमतों को लेकर ख़ुलासा नहीं किया है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि इसकी क़ीमत सस्ती होगी क्योंकि आमतौर ये कंपनी आम लोगों को टार्गेट करती है. लेकिन कम क़ीमत में क्या ये दूसरी कंपनियों की तरह सुविधाएं दे पाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा.
तो क्या आने वाले कुछ समय में मिक्स्ड रिएलिटी आपके और हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाएगा. जानकारों का मानना कि आने वाले कुछ सालों में ऐसी उम्मीद की जा सकती है.
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