भारत-चीन सीमा विवाद: क्या 5जी स्पेक्ट्रम सिर्फ देशी कंपनियों को मिलना चाहिए?

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) के अध्यक्ष पीएस राघवन का कहना है कि भारत को मोबाइल तकनीक और अन्य क्षेत्रों में सिर्फ़ स्वदेशी कंपनियों पर भरोसा करना चाहिए और ज़रूरत पड़ने सिर्फ़ 'भरोसेमंद' विदेशी कंपनियों को ही कारोबार की इजाज़त देनी चाहिए.
राघवन का इशारा उन प्रमुख चीनी कंपनियों की ओर था भारत में 5जी स्पेक्ट्रम का कारोबार बढ़ाना चाहती हैं. एनएसएबी प्रमुख ने ये बातें बीबीसी को दिए एक एक्सक्लूज़िव इंटरव्यू में कहीं.
उन्होंने कहा, "5जी के मसले पर हमारा रुख़ हमेशा से यही रहा है कि भारत को इसके लिए स्वदेशी रास्ते अपनाने चाहिए. हम सभी विदेशी कंपनियों पर बराबर भरोसा नहीं सकते. तो हम हमेशा उन्हीं देशों से आयात करेंगे जिन पर हमारा पूरा भरोसा हो. अब ख़्वावे और ज़ेडटीई जैसे चीनी कंपनियां आपके भरोसे के दायरे में फ़िट बैठती हैं या नहीं, ये आपको तय करना होगा."
पिछले साल दिसंबर में भारत सरकार ने 'सभी कंपनियों' में 5जी स्पेक्ट्रम का वितरण किया था. हालांकि ये सिर्फ़ ट्रायल के स्तर पर था.
वहीं मंगलवार को 'अमरीकी सरकार की स्वतंत्र एजेंसी' फ़ेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (एफ़सीसी) ने ख़्वावे और ज़ेडटीई को अमरीका के कम्युनिकेशन नेटवर्क के लिए ख़तरनाक करार दिया था.
एफ़सीसी अमरीका के सभी 50 राज्यों में रेडियो, टीवी, सैटेलाइट और केबल के ज़रिए होने वाले हर तरह के विदेशी संचार का नियमन करती है. कमीशन के अध्यक्ष अजीत पाई के मुताबिक़ ख़्वावे और ज़ेडटीई जैसी चीनी कंपनियों के उत्पादों को अमरीकी सुरक्षा के लिए ख़तरनाक पाया गया है.
उन्होंने कहा, "इन दोनों कंपनियों के चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और सेना के साथ सांठगांठ है. दोनों ही कंपनियां चीनी क़ानून के मुताबिक़ वहां की ख़ुफ़िया एजेंसियों का सहयोग करने के लिए बाध्य हैं. हमने अमरीकी संसद, एग्ज़िक्युटिव ब्रांच, ख़ुफ़िया विभाग, अपने सहयोगियों और अन्य देशों जन संचार सुविधाएं देने वाली कंपनियों से मिली जानकारी पर भी ग़ौर किया है. इन सबके बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं."
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सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बनना होगा?
इधर, एनएसएबी अध्यक्ष और रूस में भारत के राजदूत रहे राघवन कहते हैं, "चीन ने टेलिकॉम को रणनीतिक सेक्टर बना लिया है और उसके यहां किसी विदेशी कंपनी को टेलिकॉम सेक्टर में घुसने की इजाज़त नहीं है. भारत ने ऐसा नहीं किया है. क्यों? 5जी में डेटा आदान-प्रदान होने की स्पीड कई गुना तेज़ होती है. ये उस स्पीड से भी तेज़ होती है जिससे आप अपने स्मार्टफ़ोन पर कोई फ़िल्म डाउनलोड करते हैं. ऐसे में ये बेहद महत्वपूर्ण है कि हमारे हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर दोनों, सुरक्षा और भरोसे के पैमाने पर पूरी तरह से खरे उतरें. हम काफ़ी वक़्त से ज़ोर देकर कह रहे हैं कि हमें स्वदेशी क्षमता विकसित करनी चाहिए और ऐसे सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाने चाहिए जिससे विदेशी कंपनियों पर कड़ाई से नज़र रखी जा सके."
बीबीसी ने ये इंटरव्यू एफ़सीसी के बयान और भारत सरकार के 59 चीनी मूल के ऐप्स पर पाबंदी लगाने के फ़ैसले से पहले किया था. इसलिए पीएस राघवन की ये टिप्पणी और महत्वपूर्ण हो जाती है.
उन्होंने कहा, "चीन के साथ मौजूदा सीमा विवाद शुरू होने से पहले से ही हम भारत सरकार को यही सलाह देते आ रहे हैं. एनएसएबी पिछले छह महीने से यही कह रहा है."
तो क्या इसका मतलब है कि भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड की सलाह के ख़िलाफ़ फ़ैसले लिए? क्या सरकार ने 5जी ट्रायल के लिए सभी कंपनियों को आमंत्रित करके एनएसएबी की हिदायतों को अनदेखा किया?
इन सवालों के जवाब में राघवन कहते हैं, "सरकार को कई पहलू ध्यान में रखने होते हैं. मुझे ऐसा नहीं लगता कि सरकार ने हमारी सलाहों को अनदेखा किया या उन्हें ठुकरा दिया. इसके अलावा हमारी सलाहों पर ध्यान देने का वक़्त अब भी हैं क्योंकि स्पेक्ट्रम किसी को आवंटित नहीं किए गए हैं. 5जी तकनीक की क्षमता और असर को ध्यान में रखा जाए तो इसके ग़लत हाथों में जाने पर किसी देश को घुटने तक टेकने पड़ सकते हैं."
बीबीसी को अब तक मिली जानकारी के अनुसार इस साल के लिए निर्धारित 5जी नीलामी को फ़िलहाल स्थगित कर दिया गया है.

चीन के ख़िलाफ़ भारत के पास क्या विकल्प हैं?
लेकिन क्या भारत के पास अभी के लिए चीन के ख़िलाफ़ कोई विकल्प है?
इस सवाल के जवाब में राघवन कहते हैं, "आम तौर पर रणनीतिक मुद्दों के तत्कालिक समाधान नहीं होते. किसी भी लोकतांत्रिक देश में आर्थिक मसलों का महत्व रणनीतिक मुद्दों से कहीं ज़्यादा होता है. अच्छा आर्थिक कदम चुनाव में आपकी जीत या हार तय कर सकता है, वहीं अच्छा रणनीतिक कदम आपके उत्तराधिकारी को फ़ायदा पहुंचाता है. चीन से सीमा विवाद के मसले पर काबू पाने को लंबे वक़्त के लिए 'सरकार की संपूर्ण नीति' की ज़रूरत होगी. इसमें राजनीतिक संवाद और अलग-अलग क्षेत्रों में आर्थिक साझेदारी को ध्यान में रखने की ज़रूरत होगी. हमने इस सम्बन्ध में पिछले कुछ वर्षों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है."
राघवन का मानना है कि हर संकट समाज को चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है. लेकिन साथ ही वो अति-उत्साह से भी बचने की सलाह देते हैं. वो कहते हैं, "हमें सतर्कता से सोचना होगा ताकि हम चीन को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश में अपना नुक़सान न कर बैठें. इसे ज़्यादा विचारपूर्ण और सावधानी भरे तरीके से करना होगा."
भारत को चीन के साथ मंच साझा करना चाहिए?
क्या भारत को ब्रिक्स और एससीओ (शांघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन) जैसे बहुपक्षीय संगठनों में चीन के साथ मंच साझा करना चाहिए? इस बारे में राघवन का मानना है कि ऐसा करने से भारत ख़ुद को ही बहुपक्षीय संगठनों से दूर कर लेगा.
उन्होंने कहा, "बहुपक्षीय संगठनों में ऐसे देश भी शामिल होते हैं जिनके एक-दूसरे के साथ अच्छे सम्बन्ध नहीं होते. इसमें कोई नई बात नहीं है कि भारत और चीन दोनों ही कई बहुपक्षीय संगठनों के सदस्य हैं. कोई भी देश ऐसे संगठनों का हिस्सा इसलिए बनते हैं ताकि वो साझा हितों को बढ़ावा दे सकें. अगर भारत कहे कि वो उस संगठन का सदस्य नहीं रहेगा जिसमें चीन शामिल है तो ये बिल्कुल असंभव है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समेत ऐसे कई संगठन हैं जिनमें भारत और चीन साथ-साथ शामिल हैं."
चीन या भारत? किसका साथी है रूस?
पिछले दिनों भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा सचिव डॉक्टर अजय कुमार दोनों ही रूस के दौरे पर गए थे. दोनों ने सोवियत संघ के नाज़ी जर्मनी को हराने की 75वीं सालगिरह के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था. राजनाथ सिंह ने रूस के उप प्रधानमंत्री से भी मुलाकात की थी और भारत ने दोनों की बातचीत को 'बहुत सकारात्मक' बताया था.
ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में रूस और भारत के मज़बूत साझा हित और सम्बन्ध हैं. दूसरी तरफ़ रूस के चीन के साथ भी बहुत मज़बूत सम्बन्ध हैं जो सिर्फ़ रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं. ऐसी स्थिति रूस अपने हित कहां साध रहा है?
इस बारे में राघवन कहते हैं, "रूस और भारत का रिश्ता बहुत पुराना है जबकि चीन और रूस के मामले में ऐसा नहीं है. वहां युद्ध और क्षेत्रीय विवाद हुए हैं. चीन के रूस के ख़िलाफ़ जाने की जितना आशंका है उतनी भारत की रूस के ख़िलाफ़ जाने की नहीं. दुनिया के बाकी देशों ने रूस को जिस तरह अलग-थलग कर दिया उससे रूस को चीन के इतने करीब जाना पड़ा जितना वो शायद नहीं चाहता था. रूस की सुपरपावर बनने की महत्वाकांक्षा थी और वो इसे किसी और का सहयोगी बनकर पूरा नहीं कर सकता. अगर पश्चिमी देश रूस से इसी तरह दूरी बनाए रहेंगे तो वो चीन के और करीब आ जाएगा जो कि भारत के हित में नहीं है."
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