कोरोना: चीन की यूरोप के साथ कोविड-19 डिप्लोमेसी, निशाना कहीं और
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Author, ज़ुबैर अहमद
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल ही में ग्लोबल टाइम्स और शिन्हुआ न्यूज़ एजेंसी जैसी चीन की सरकारी मीडिया ने बड़े फ़ख़्र से एलान किया था कि चीन की एक मालगाड़ी, पिछले मंगलवार को फ़्रांस की राजधानी पेरिस पहुंच गई.
ये ट्रेन अपने साथ मेडिकल सामान लेकर फ़्रांस पहुंची.
चीन की मीडिया ने ये घोषणा भी कर दी कि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ युद्ध के लिए तमाम मेडिकल साज़-ओ-सामान लेकर ऐसी ही एक और ट्रेन जर्मनी के डुइसबर्ग और स्पेन की राजधानी मैड्रिड भी पहुंचने वाली है.
चीनी मीडिया के मुताबिक़, ये मालगाड़ियां चीन को वापसी के सफ़र में फ्रांस की वाइन, जर्मनी की मशीनें और स्पेन से ज़ैतून का तेल और पोर्क लेकर आएंगी. चीन की अंग्रेज़ी भाषा की मीडिया पर एक नज़र डालें, तो ऐसा लगता है कि चीन एक ख़ास मिशन पर है.
वो यूरोप को हर वो संसाधन उपलब्ध कराने में जुटा है, जो यूरोपीय देशों को कोविड-19 की महामारी से निपटने में मददगार हों.
चीन की मीडिया के अनुसार अकेले मई महीने में ही चीन की मालवाहक ट्रेनों ने यूरोपीय देशों के एक हज़ार से ज़्यादा फेरे लगाए हैं. चीन से यूरोप तक का ये सफ़र क़रीब 12 हज़ार किलोमीटर लंबा है.
चीन की मालगाड़ियों के यूरोप के सफ़र पर दुनिया की मीडिया की शायद नज़र नहीं है. लेकिन, ऐसा लगता है कि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ यूरोप की जंग में चीन की ये कार्गो ट्रेनें लाइफ़लाइन बन गई हैं.
ये रेलगाड़ियां जनवरी महीने से ही यूरोप की चीन से मेडिकल सामान की सप्लाई कर रही हैं. आप कहेंगे कि मुसीबत के वक़्त का साथी ही असली दोस्त होता है.
कोविड-19 की महामारी के इस दौर में चीन, यूरोप का सच्चा साथी बन कर सामने आया है. जो हर तरह से सहायता उपलब्ध करा रहा है.
दिल्ली में मौजूद फ़्रांस की एक राजनयिक इसका कारण बताती हैं.
वो कहती हैं, "तल्ख़ हक़ीक़त तो ये है कि चीन की अर्थव्यवस्था ही हमारी इकॉनमी को चला रही है. भले ही हम ये न चाहते हों. आने वाले लंबे समय तक हमारा भविष्य चीन के साथ ही जुड़ा हुआ है."
ये बात सौ फ़ीसद सच है. हो सकता है कि चीन ऐसा दोस्त न हो जिसकी यूरोपीय संघ को ख़्वाहिश थी.
मगर, आज हालात ऐसे हैं कि यूरोपीय देश, चीन की अर्थव्यवस्था से दूरी नहीं बना सकते. चीन और यूरोप के बीच व्यापार वर्ष 2019 में ही 560 अरब डॉलर का हो चुका था. और, ज़ाहिर है, कारोबार का ये पलड़ा चीन की तरफ़ ही झुका हुआ है.
यूरोप-चीन रेल कॉरिडोर का उद्घाटन वर्ष 2011 में हुआ था. इसके ज़रिए दो महाद्वीपों की अर्थव्यवस्थाओं के बीच सामान की आवाजाही हो रही है.
ये रेल कॉरिडोर छह देशों से होकर गुज़रता है. आने वाले समय में, जब यूरोप, कोविड-19 की महामारी के बाद दोबारा आर्थिक तरक़्क़ी की राह पर चलने की कोशिश कर रहा होगा, तो उसमें ये रेल कॉरिडोर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा.
चीन का आक्रामक प्रचार अभियान
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चीन एक तरफ़ तो भारत के साथ सीमा पर संघर्ष में उलझा हुआ है. वहीं, दूसरी तरफ़ उसके और अमरीका के बीच भयंकर व्यापार युद्ध भी छिड़ा हुआ है.
पश्चिम के कई विश्लेषक मानते हैं कि इस दौरान चीन की कम्युनिस्ट सरकार का जनसंपर्क और प्रचार तंत्र दिन रात काम में जुटा हुआ है. पिछले ही हफ़्ते चीन ने बांग्लादेश से होने वाले 97 प्रतिशत आयात पर एक जुलाई से बिल्कुल भी टैक्स न लगाने का प्रस्ताव रखा.
चीन को कपड़ों के निर्यात में बांग्लादेश, भारत का प्रतिद्वंदी है. अब अगर, चीन उसके यहां से बिना टैक्स लगाए सामान लेगा, तो ज़ाहिर है कि चीन के आयातक, भारत के बजाय बांग्लादेश से टेक्सटाइल ख़रीदना बेहतर समझेंगे.
चीन, अफ़्रीकी देशों के साथ भी लगातार व्यापारिक संबंध बढ़ा रहा है. चीन ने वर्ष 2018 में ही अफ़्रीका में विकास कार्यों में 60 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश का वादा किया था. इसका एलान ख़ुद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने, बीजिंग में फ़ोरम ऑन चाइना-अफ़्रीका को-ऑपरेशन (FOCAC) की बैठक के दौरान किया था.
लैटिन अमरीकी देशों के साथ भी चीन का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है.
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चीन का पड़ोसी देश, वियतनाम उसका पुराना दुश्मन है.
दोनों देशों के बीच दक्षिणी चीन सागर में चीन के दावे को लेकर विवाद चल रहा है. लेकिन, वियतनाम और चीन के बीच प्रगाढ़ व्यापारिक संबंध हैं. वियतनाम में चीन के बढ़ते निवेश से दोनों देशों के कारोबारी संबंध और मज़बूत हो रहे हैं.
चीन ने अपने पुराने साथी, पाकिस्तान में भी 30 अरब डॉलर का निवेश किया है. पाकिस्तान में चीन अपनी बेहद महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड इनिशियेटिव योजना (BRI) के तहत, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बना रहा है. बीआरआई को ऐतिहासिक सिल्क रोड का आधुनिक स्वरूप बताया जा रहा है.
ज़ाहिर है, जैसे-जैसे चीन की अर्थव्यवस्था का विकास हुआ. दुनिया से उसका व्यापार बढ़ा, वैसे-वैसे उसका आत्मविश्वास भी बढ़ा है. आज से कुछ बरस पहले ही चीन, अमरीका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है.
विश्त शांति और विकास में चीन का रोल?
चीन की इसी उपलब्धि के बाद, उसके विदेश मंत्री वैंग यी को ये कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि, "अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से बिल्कुल अलग, चीन पूरे आत्मविश्वास और खुलेपन के साथ, धीरे-धीर विश्व मंच का केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है. अपने विकास के लिए बाहरी दुनिया में उचित माहौल बनाने के साथ-साथ चीन विश्व की शांति और विकास में भी अहम योगदान दे रहा है. साथ ही साथ चीन पूरी मानवता की समृद्धि और तरक़्क़ी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है."
ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रड, चीन के मामलों के विशेषज्ञ हैं. उन्होंने एक बार बीबीसी न्यूज़ से कहा था कि, "हम दुनिया के आर्थिक इतिहास को पढ़ने पर ये देखते हैं, कि किसी देश की राजनीतिक शक्ति उसकी आर्थिक ताक़त से तय होती है. और आगे चल कर ये आर्थिक शक्ति ही उस देश की विदेश और सुरक्षा नीति भी तय करती है."
चीन के इतनी तेज़ी से दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनने के बारे में केविन रड ने कहा था कि, "चीन का ये अनवरत विकास केवल चीन ही नहीं बाक़ी दुनिया के लिए भी ये चुनौती पेश करेगा कि चीन और बाक़ी देशों के बीच संबंधों का प्रबंधन कैसे हो."
चीन का ये 'निरंतर और निर्मम विकास' बहुत से देशों के लिए ईर्ष्या का विषय है. और इस कारण से चीन पर दादागीर करने या अहंकारी होने के आरोप भी लगे हैं.
चीन ने कनाडा, स्वीडन और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों के साथ बौद्धिक संपदा, साइबर युद्ध और मानवाधिकार के मसलों पर संघर्ष छेड़ा हुआ है.
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स्वीडन की उप्पासला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर अशोक स्वैन कहते हैं, "चीन इन टकरावों को लेकर क़त्तई चिंतित नहीं है. चीन को पता है कि इस वक़्त पूरी दुनिया में उसके ख़िलाफ़ माहौल बना हुआ है, ख़ास तौर से पश्चिमी देशों में. लेकिन, चीन को ये भी मालूम है कि पश्चिमी ताक़तें उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएं चीन पर बुरी तरह निर्भर हैं."
प्रोफ़ेसर राना मित्तर, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के चाइना सेंटर के निदेशक हैं. वो कहते हैं, "इस वक़्त चीन की कूटनीति बैकफुट पर है. इसकी बड़ी वजह कोविड-19 की महामारी है. चीन ने पहले तो इससे निपटने में गड़बड़ियां कीं. उसके बाद जब ये महामारी पूरी दुनिया में फैल गई, तो अपनी कमियों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए कभी चीन मेडिकल उपकरण की खेप अन्य देशों को भेज रहा है, तो कभी इस महामारी के फैलने का आरोप लगने पर लड़ने पर उतारूहो जा रहा है."
चीन पर बहुत सी किताबें लिखने वाले प्रोफ़ेसर राना मित्तर कहते हैं कि चीन ये मानता है कि वो इस मुश्किल दौर से बिना एक भी खरोंच लगे निकल जाएगा.
चीन की चुनौतियां
चीन की नज़र में सबसे बड़े 'विलेन' हैं अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप.
ट्रंप ने ही चीन की तरक़्क़ी की गाड़ी में ब्रेक लगाने शुरू किए. पहले तो वर्ष 2018 में ट्रंप ने चीन से अमरीका को होने वाले आयात पर भारी व्यापार कर लगा दिया. लेकिन वो यहीं पर नहीं रुके. ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के अन्य नेताओं ने चीन के ऊपर आरोपों की बौछार करनी शुरू कर दी. वो चीन पर बौद्धिक संपदा चुराने, साइबर युद्ध छेड़ने और कोरोना वायरस फैलाने जैसे इल्ज़ाम लगा रहे हैं.
ऑस्ट्रेलियाई मीडिया के मुताबिक़, डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीका के मित्रदेशों जैसे कि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देशों को इस बात के लिए मजबूर किया है कि वो चीन की कंपनी हुवावे को अपने यहां 5G तकनीक के ढांचे का विस्तार न करने दे. क्योंकि इससे उनके डेटा की चोरी हो सकती है और सुरक्षा में सेंध लग सकती है. हुवावे वैसे तो एक निजी चीनी कंपनी है. लेकिन, पश्चिमी देश मानते हैं कि चीन में प्राइवेट कंपनियां भी चीन की कम्युनिस्ट सरकार के नियंत्रण में हैं.
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कोविड-19 की महामारी ने चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की राह में और बाधाएं खड़ी कर दी हैं.
क्योंकि, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की अगुवाई में दुनिया के कई देश, चीन से ये सवाल पूछ रहे हैं कि वो इस वायरस का प्रकोप अपनी सीमाओं के भीतर सीमित रखने में क्यों असफल रहा. ऑस्ट्रेलिया ने तो आगे बढ़ कर ये माँग कर डाली है कि दुनिया में कोरोना वायरस का प्रकोप फैलने की स्वतंत्र रूप से जाँच हो. ऑस्ट्रेलिया की इस माँग पर चीन भड़क उठा है. इससे चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच संबंध काफ़ी बिगड़ गए हैं.
ऑस्ट्रेलिया के थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट ने पिछले ही हफ़्ते एक सर्वे के नतीजे जारी किए हैं. इससे पता चलता है कि ऑस्ट्रेलिया में बड़ी तेज़ी से चीन के ख़िलाफ़ माहौल बन रहा है.
इस सर्वे के मुताबिक़, आज ऑस्ट्रेलिया में केवल 23 फ़ीसद लोग ये मानते हैं कि इस महामारी के दौरान चीन का रवैया ज़िम्मेदारी भरा रहा. जबकि पिछले साल के अंत में ऐसा मानने वालों की तादाद 43 प्रतिशत थी.
लोवी इंस्टीट्यूट में इस सर्वे की प्रमुख रहीं नताशा क़स्साम कहती हैं, ''अभी हाल के दिनों तक ऑस्ट्रेलिया के ज़्यादातर लोग चीन को एक ऐसे देश के तौर पर देखते थे, जहां आर्थिक तरक़्क़ी के अवसर हैं. लेकिन, अब ज़्यादातर ऑस्ट्रेलियाई, चीन को ख़तरे की नज़र से देखने लगे हैं."
चीन का आरोप
चीन को शिकायत है कि पूरी दुनिया केवल उसे ही हर परेशानी के लिए ज़िम्मेदार ठहराती है.
चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के क़रीबी माना जाने वाला ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि, ''ऑस्ट्रेलिया के अलावा, कई पश्चिमी देश जैसे कि कनाडा और स्वीडन में भी चीन के प्रति नकारात्मक सोच बढ़ गई है. कोविड-19 की महामारी फैलने के बाद पश्चिमी देशों के कई राजनेता और मीडिया लगातार इसका ठीकरा चीन पर फोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वो ऐसा इसलिए कररहे हैं क्योंकि ये देश अपने यहां इस महामारी से अच्छे से निपटने में नाकाम रहे हैं और आलोचना से बचने के लिए चीन का सहारा ले रहे हैं. इसी का नतीजा है कि ये देश, चीन के कोविड-19 से प्रभावी तरीक़े से निपटने के प्रयासों पर निरपेक्ष भाव से कुछ भी कह पाने में असफल रहे हैं.''
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'कमज़ोर' होता अमरीका
अमरीका स्थित वैश्विक सुरक्षा सलाहकार कंपनी, पॉलिटैक्ट ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि कोविड-19 के फैलने की ज़िम्मेदारी को लेकर जो आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, उनसे चीन और अन्य देशों के बीच तनाव बढ़ गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि, ''एशिया प्रशांत क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ रहे तनाव की वजह, कोविड-19 महामारी को लेकर, इस इलाक़े के तमाम देशों द्वारा रक्षा और सुरक्षा की परिस्थितियों का फिर से आकलन करना है. इन देशों में ये सोच बन रही है कि चीन ने दुनिया को कोविड-19 महामारी का अभिशाप दिया और ख़ुद इस चुनौती से आसानी से उबरने में सफल रहा. ऐसे में जब तमाम देश इस महामारी की चुनौती में उलझे हैं. तो बदली हुई भौगोलिक-सामरिक परिस्थितियों में चीन का बेदाग़ निकलना इस सोच को और बढ़ा रहा है."
इसी रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि, "अमरीका इस महामारी से निपटने में अनाड़ी साबित हुआ. साथ ही साथ महामारी के बीच में ही वहां नस्लवादी दंगे भड़क उठे. ऐसे में दुनिया भर में अमरीका के बारे में ये राय बन रही है कि वो अपने अंतर्विरोधों की वजह से बिखर रहा है. और अब वो दुनिया की इकलौती महाशक्ति नहीं रह गया है. और इसीलिए आज अमरीका के सहयोगी देश अपने-अपने दांव की समीक्षा कर रहे हैं. ताकि बदले हुए हालात में अपने आपको बचा सकें. वहीं, दुनिया के अन्य देश ये अंदाज़ा लगाने में जुटे हैं कि अमरीका अगर सुपरपावर नहीं रहा, तो दुनिया पर इसका क्या असर होगा. नई विश्वव्यवस्था का स्वरूप क्या होगा."
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर राना मित्तर कहते हैं कि चीन चाहता है कि दुनिया उसे और तवज्जो दे.
प्रोफ़ेसर मित्तर कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस समय चीन का ये मानना बिल्कुल ठीक है कि पूरी दुनिया उसे निशाना बना रही है, और मुजरिम ठहरा रही है. चीन को हमेशा इस बात की शिकायत रही है कि उसकी बहुत सी उपलब्धियों की दुनिया उतनी तारीफ़ नहीं करती, जितनी उसे करनी चाहिए. जैसे कि 1980 के दशक की शुरुआत से चीन ने अब तक करोड़ों लोगों को ग़रीबी रेखा से उबारा है. या फिर आज वो दुनिया की बेहतरीन तकनीकों का उत्पादन कर रहा है. मुझे लगता है कि चीन को अपनी उपलब्धियों के मान-सम्मान की दरकार है."
लेकिन, प्रोफ़ेसर मित्तर ये भी कहते हैं कि, "चीन लोगों को अपनी नापसंद के मुद्दों पर चर्चा करने से रोकने में भी काफ़ी ज़ोर लगाता है. जैसे कि मानवाधिकारों का मुद्दा."
प्रोफ़ेसर अशोक स्वैन तर्क देते हैं कि पश्चिमी देशों के बीच इस बात को लेकर दुविधा है कि चीन से कैसा बर्ताव किया जाए.
प्रोफ़ेसर स्वैन के मुताबिक़, "दिक़्क़त ये है कि चीन को मानवाधिकारों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों, अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंत्र के मुद्दों पर घेरने के बजाय, पश्चिम की राष्ट्रवादी सरकारें उन मुद्दों पर चीन को निशाना बना रही हैं, जिन क्षेत्रों में वो शक्तिशाली है, जैसे कि-अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश और कामगारों की पूंजी."
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हालांकि, अमरीका ने अब चीन को उसके मानवाधिकारों के कथित तौर पर बेहद ख़राब रिकॉर्ड को लेकर ख़ास तौर से निशाना बनाना शुरू कर दिया है. और अब इसके लिए खोखली बयानबाज़ी के बजाय अमरीका, एक्शन पर ज़्यादा ज़ोर दे रहा है.
हाल ही में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक क़ानून पर दस्तख़त किए हैं, जो चीन के पश्चिमी सूबे शिन्जियांग में वीगर मुसलमानों को भारी तादाद में नज़रबंद करने और उनकी निगरानी करने वाले चीन के अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाएगा.
अमरीका के इस नए क़ानून ने पहले से ही मुश्किलों में घिरे चीन के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. इसके अंतर्गत चीन के उन नेताओं को दंड दिया जा सकेगा, जो अपने यहां के जातीय अल्पसंख्यों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं.
क्या चीन चिंतित है?
चीन से हमदर्दी रखने वाले पश्चिम के कई विशेषज्ञ ये मानते हैं कि चीन को अपने यहां मानवाधिकारों का रिकॉर्ड सुधारने की ज़रूरत है. साथ ही साथ बाक़ी दुनिया के साथ अपने संबंधों में चीन को पूरी तरह से पारदर्शिता लानी होगी.
चीन का मानवाधिकारों से जुड़ा रिकॉर्ड और विरोध के स्वरों को दबाने की उसकी नीति को लेकर पश्चिमी देश हमेशा से ही चिंतित रहे हैं.
बीसवीं सदी के आख़िरी दशक के आते-आते ही चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुका था. हालांकि, उस वक़्त चीन दुनिया में कुछ हद तक अलग-थलग पड़ा हुआ था. अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने विश्व व्यापार संगठन में चीन के प्रवेश की खुल कर वकालत की थी.
विश्व व्यापार संगठन 164 देशों का संगठन है, जो विश्व व्यापार की दशा, दिशा और नीतियां निर्धारित करता है.
चीन, वर्ष 2001 में विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना था. उस समय अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ये मानते थे कि बाक़ी दुनिया के साथ क़रीब से जुड़ने पर चीन आख़िर में राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की दिशा में और आगे बढ़ेगा.
राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने ये भी कहा था कि 'चीन ऐसे राष्ट्रों के समूह का सदस्य बनेगा, जो लोकतांत्रिक हैं और वर्ष 2015 तक चीन की प्रति व्यक्ति आय सात हज़ार डॉलर हो जाएगी.'
चीन ने सात हज़ार डॉलर की प्रति व्यक्ति आय का लक्ष्य तो 2015 के अनुमान से दो साल पहले ही हासिल कर लिया था, लेकिन, वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी. चीन में कोई राजनीतिक सुधार नहीं शुरू किए गए.
उसके उलटे, टिप्पणीकार ये मानते हैं कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन और भी तानाशाही राष्ट्र बन गया है.
हालांकि, वर्ष 2012 में शी जिनपिंग के सत्ता संभालने से पहले इस बात की थोड़ी बहुत उम्मीदें लगाई जा रही थीं कि चीन में कुछ राजनीतिक बदलाव देखने को मिलेंगे.
प्रोफ़ेसर अशोक स्वैन कहते हैं, "जब हू जिंताओ चीन के राष्ट्रपति थे (2002-2012), तब चीन में बहुदलीय व्यवस्था की शुरुआत की प्रक्रिया लागू की जा रही थी. यहां तक कि चीन, मानवाधिकारों के मसले पर भी सक्रिय दिख रहा था. लेकिन, शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद से (2012-) चीन में मानवाधिकारों की आवाज़ उठाने वालों को बड़ी सख़्ती से कुचला जा रहा है. वहां की शासन व्यवस्था पर कम्युनिस्ट पार्टी का शिकंजा और कस गया है."
प्रोफ़ेसर राना मित्तर चेतावनी देते हैं कि हमें चीन के दुनिया पर पलटवार करने की ताक़त को कम करके नहीं आंकना चाहिए.
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उनके मुताबिक़, "हमें कम अवधि और लंबी अवधि की नीतियों में ख़ास तौर से फ़र्क़ करके देखना होगा. इस समय हम ये कह सकते हैं कि चीन की सरकार बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रही है. बहुत से लोग ये मान रहे हैं कि इस वक़्त चीन और अमरीका के बीच शीत युद्ध शुरू हो चुका है."
लेकिन, प्रोफ़ेसर मित्तर आगे ये भी जोड़ते हैं कि, "इन हालात में भी हमें इस बात पर से ध्यान नहीं हटाना चाहिए कि आगे चल कर चीन के राजनियक प्रयास किस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बढ़ रहे हैं. और मुझे लगता है कि इस बात का जवाब हमें एक विशेष क्षेत्र पर नज़र डालने से मिल सकता है और वो है तकनीक का विस्तार. 5G तकनीक से लैस बेहद कार्यकुशल ब्रॉडबैंड तकनीक के क्षेत्र में आज भी चीन, बाक़ी दुनिया से बहुत आगे है. चीन इस तकनीकी बढ़त का इस्तेमाल करके अपने यहां एक वैज्ञानिक उद्योग की स्थापना की तरफ़ बढ़ रहा है, जिसकी मदद से हुवावे जैसी कंपनियों का विकास होगा. जो आगे चल कर बेहद सस्ती दरों पर नई-नई तकनीक का उत्पादनकर सकेंगी. ये तकनीकें बेहद असरदार होंगी और अन्य देशों में बेहद सस्ती दरों पर आसानी से इन तकनीकों का विस्तार हो सकेगा. और इसका मतलब ये है कि अगर हम मध्यम अवधि की बात करें, तो दक्षिणी अमरीका, अफ़्रीका के सहारा देशों, दक्षिणी पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया और दुनिया के कई अन्य क्षेत्र ऐसे होंगे, जहां चीन अपनी सस्ती तकनीकी बढ़त की मदद से पांव जमाएगा और अपने राजनियक और आर्थिक हित साधने की कोशिश करेगा."
प्रोफ़ेसर राना मित्तर आख़िर में कहते हैं, "चीन आज विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी बन चुका है. ऐसा न केवल नई तकनीकी खोज के क्षेत्र में है, बल्कि चीन अपनी उत्पादन क्षमता के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. ऐसे में चीन को विश्व की अर्थव्यवस्था से अलग कर पाना कम से कम अगले कुछ वर्षों तक व्यवहारिक नहीं होगा. बल्कि यूं कहें कि कई देश तो ऐसा करना ठीक भी नहीं समझेंगे."
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
बाीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
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हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
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अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.