कोरोना वायरस- क्या स्वस्थ लोगों के लिए लॉकडाउन की सभी पाबंदियां हटा लेनी चाहिए?
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Author, निक ट्रिगल
पदनाम, स्वास्थ्य संवाददाता
कोरोना वायरस को लेकर बुरी ख़बरों का सिलसिला बना हुआ है.
इससे मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. प्रोटेक्टिव इक्वीपमेंट की कमी के चलते डॉक्टर और नर्स भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. इन सबके चलते आम लोगों में चिंता भी बढ़ती जा रही है.
ज़्यादातर लोगों को यह डर सताने लगा है कि वे वायरस की चपेट में आ सकते हैं. वैसे तो बुजुर्गों को इसकी चपेट में आने का ख़तरा सबसे ज़्यादा है लेकिन कम आयु वर्ग के अधिकांश लोगों का लगता है क उन्हें भी ख़तरा है.
लेकिन यह ख़तरा कितना अधिक है? मौजूद समय में किसी के कोरोना संक्रमित होने का जोख़िम वास्तव में कितना है?
अधिक उम्र वाले और पहले से ही स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना करने वाले लोगों को सबसे ज़्यादा ख़तरा है. कोरोना से होने वाली मौतों में सबसे ज़्यादा मौतें ऐसे ही लोगों की हुई है.
कोरोना से युवा लोग भी मर रहे हैं. ब्रिटेन में अप्रैल के आख़िरी दिनों में 45 साल से कम उम्र वाले 300 लोगों की मौत हुई है. इससे कहीं ज़्यादा बड़ी संख्या में लोग गंभीर रूप से बीमार भी हो रहे हैं, जिन्हें आने वाले समय में हफ्तों संघर्ष करना है.
ऐसे में इन सारी बातों के क्या मायने हैं? इन सबका लॉकडाउन के बाद के जीवन पर क्या असर होगा?
पब्लिक रिसर्च यूनिवर्सिटी के तौर पर काम करने वाली यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के डॉ. अमिताव बनर्जी मानते हैं कि हमारा सारा फोकस कोरोना महामारी के सबसे बुरे परिणाम पर ज़्यादा है, ऐसे में हम उन लोगों पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं जिनकी मौत नहीं होती है. उनके मुताबिक वायरस की चपेट में आकर बच गए लेकिन बीमार होने वाले लोगों पर ध्यान नहीं है.
क्लिनिकल डेटा साइंस के एक्सपर्ट बनर्जी के मुताबिक कोरोना वायरस से युवाओं की मौत पर कोई निष्कर्ष निकालने की जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए क्योंकि हो सकता है इन लोगों को स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलें रही हैं लेकिन उसका पता नहीं चला हो.
लेकिन उन्होंने यह स्वीकार किया है कि कोरोना वायरस से स्वस्थ्य लोगों की मौत भी हो रही है, हर्ट अटैक से लेकर फ़्लू तक की हर बीमारी में ऐसा देखने को मिलता है.
अमिताव बनर्जी के मुताबिक भविष्य में कोरोना वायरस को कहीं ज़्यादा व्यापक नज़रिए के साथ देखने की ज़रूरत है. उनके मुताबिक इस महामारी से बढ़ने वाले अप्रत्यक्ष ख़र्चे, लॉकडाउन के दौरान बढ़ती घरेलू हिंसा, मेंटल हेल्थ इश्यू और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, इन सब पर बात करने की ज़रूरत है.
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कुछ लोगों के लिए बुरे फ़्लू से ज्यादा नहीं कोविड-19
रविवार को ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन इंग्लैंड में पाबंदियों में ढील देने की घोषणाएं कर सकते हैं.
माना जा रहा है कि संक्रमण की दर को कम रखने के लिए यह राहत बहुत धीरे धीरे बढ़ाई जाएगी. हालांकि कईयों का मानना है कि इतना सख़्त होने की ज़रूरत नहीं है.
एडिनबरा यूनिवर्सिटी और लंदन स्थित कुछ विद्वानों ने इस सप्ताह एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया है. इस पेपर के मुताबिक जिन लोगों के कोरोना संक्रमण की चपेट में आने का ख़तरा ज़्यादा हो, उन्हें पूरी तरह सुरक्षित कर पाबंदियां हटाई जा सकती हैं.
रिसर्च पेपर की सलाह के मुताबिक कोरोना संक्रमित लोगों को पूरी तरह आइसोलेशन में रखा जाए और उनकी देखभाल करने वाली की नियमित तौर पर टेस्टिंग हो.
इसके रिसर्चरों के मुताबिक अगर कोरोना संक्रमित लोगों की देखभाल करने वाले लोगों को प्रोटेक्टिव इक्वीपमेंट मुहैया कराने के साथ साथ उनकी क्विक टेस्टिंग की अच्छी सुविधा उपलब्ध करा दी जाए तो कई पाबंदियों को हटाना संभव होगा.
अच्छी तरह हाथ धोना, कोरोना के लक्षण सामने आने पर खुद को आइसोलेट करना और स्वयं से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना- इन तीन बातों को भी अपनाने की ज़रूरत होगी. लेकिन कुछ महीनों में लोग अपने काम और स्कूलों में लौट सकेंगे. समाज के ज़्यादातर लोग रेस्टोरेंट में खाना खा सकेंगे और सिनेमा भी देख पाएंगे.
रिसर्च दल के प्रमुख और संक्रामक बीमारियों के एक्सपर्ट प्रोफेसर मार्क वुलहाउस के मुताबिक जिन लोगों में ख़तरा कम है, उनके लिए कोरोना वायरस एक दुष्ट फ़्लू से ज़्यादा ख़तरनाक नहीं है.
उन्होंने बताया, "जिन लोगों में संक्रमण का ख़तरा ज़्यादा होता है, उनके लिए कई गंभीर बीमारियों का ख़तरा कोरोना वायरस उत्पन्न कर सकता है. इसलिए हमलोगों ने इतन कड़े प्रावधान किए हैं और देश में लॉकडाउन लागू है."
"अगर हम संक्रमण के चपेट में आने वाले कमजोर लोगों का बचाव बेहतर ढंग से कर पाएं तो दूसरे लोगों के लिए पाबंदियों को हटाना चाहिए. नहीं हटाने की कोई वजह नहीं है. लॉकडाउन के चलते आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफ़ी नुकसान उठाना पड़ रहा है."
मार्क वुलहाउस के मुताबिक जोख़िम के साथ सही ढंग से संतुलन साधने की ज़रूरत है.
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ख़तरे के साथ जीवन
कुछ दूसरे एक्सपर्टों ने भी ऐसी राय दी है. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में सांख्यिकी के प्रोफेसर सर डेविड स्पीजेहाल्टर ने सबूतों के साथ बताया कि 20 साल के अधिक उम्र में आम दिनों में लोगों की मौत का ख़तरा उतना ही है जितना कि कोरोना वायरस से मौजूदा समय मौत का ख़तरा है.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वयस्कों के लिए जो ख़तरा पूरे साल में होता था वह कोरोना वायरस के समय में कुछ ही दिनों के अंदर हो रहा है. लेकिन कम उम्र वाले लोगों के लिए ख़तरा कम है.
ज़ाहिर है कि कोरोना वायरस से बच्चों को बेहद कम ख़तरा है, इतना कम कि हमें उनके लिए दूसरी चीजों की चिंता करनी चाहिए. एक साल की उम्र के बाद मौत की सबसे बड़ी वजहें कैंसर, एक्सीडेंट और आत्महत्या है.
अमरीका के स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर भी कोरोना वायरस से मौत के ख़तरे की तुलना ड्राइविंग करने के दौरान होने वाली मौत से कर रहे हैं.
ब्रिटेन में, इन लोगों के आकलन के मुताबिक 65 साल से कम उम्र के आदमी को कोरोना वायरस से मौत का उतना ही ख़तरा है जितना कि एक दिन में 185 किलोमीटर की ड्राइविंग के दौरान एक्सीडेंट से होने वाली मौत का ख़तरा है.अगर 65 साल से कम उम्र के स्वास्थ्य संबंधी मुश्किल का सामना कर रहे लोगों (ब्रिटेन में प्रति 16 लोगों में एक शख़्स ) को अलग कर लिया जाए तो इस आयु वर्ग में कोरोना वायरस से मौत का ख़तरा और भी कम हो जाता है.
अमरीकी रिसर्चरों के मुताबिक कोरोना वायरस से होने वाली मौत के ख़तरे का आकलन नीति निर्धारकों के साथ आम लोगों के लिए भी ज़रूरी है.
अगर हम ख़तरे का आकलन करते हैं तो कोरोना वायरस के साथ रहना सीख सकते हैं. हमें यह करना होगा.
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.