भारत ने चेचक और पोलियो के ख़िलाफ़ जंग की अगुवाई कैसे की थी?

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- Author, ब्रजेश मिश्र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस संक्रमण के तेज़ी से बढ़ते मामलों के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस महामारी को रोकने के भारत के प्रयासों की सराहना की है.
डब्लूएचओ के कार्यकारी निदेशक डॉ. माइकल रेयान ने कहा कि भारत ने चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों से लड़ने में भी दुनिया को राह दिखाई है.
डॉक्टर माइकल रेयान ने कहा, "चीन की तरह भारत भी एक बड़ी आबादी वाला देश है. इस महामारी का भविष्य इस बात से तय होगा कि बड़ी और घनी आबादी वाले देशों में क्या कुछ होता है. इसलिए यह ज़रूरी है कि भारत जनस्वास्थ्य के स्तर पर बड़े और सख़्त कदम उठाए और सोसाइटी के स्तर पर इसे रोकने, नियंत्रित करने की कोशिशों से ज़िंदगियां बचाए."
उन्होंने कहा, "भारत ने दो गंभीर बीमारियों, चेचक और पोलियो से लड़ने में भी दुनिया को राह दिखाई थी. चेचक वो गंभीर बीमारी थी जिसकी वजह से जो मौतें हुईं वो दुनिया की सारी लड़ाइयों में हुई मौतों से भी ज़्यादा थीं."
डॉक्टर माइकल रेयान ने कहा कि भारत ने जनस्वास्थ्य पर ध्यान दिया और बीमारी का अंत करके दुनिया को एक बेहतरीन तोहफ़ा दिया.
पोलियो को भी हराया
भारत ने पोलियो को भी हराया. सर्विलांस के ज़रिए लोगों को ढूंढ़ा, मामलों की पड़ताल की और टीकाकरण शुरू किया. भारत ने वो हर चीज़ की जिसकी ज़रूरत इस बीमारी से निपटने के लिए थी.
भारत के पास बेहतरीन क्षमता है… जब समुदायों को लामबंद किया जाता है, सिविल सोसाइटी सक्रिय होती हैं, जब महानिदेशक कुछ कहते हैं राज्यों के प्रमुख और सरकारें समाज तक वो सब पहुंचाती हैं और एक्शन लेती हैं.
जब तक हम दूसरे समाधान तलाश रहे हैं तब तक जो सावधानियां बरत सकते हैं वो बरतें.
यह बेहद महत्वपूर्ण है कि भारत जैसे देशों ने राह दिखाई है और दुनिया को दिखाया है कि क्या किया जा सकता है. जैसे कि उन्होंने पहले किया और राज्य के प्रमुख बेहद आक्रामक रुख अपनाकर जनस्वास्थ्य की दिशा में कदम उठाएं तो समाज के लोगों पर असर होगा और महामारी से निजात मिलेगी.
भारत ने चेचक और पोलियो से लड़ने को लेकर जो मुहिम शुरू की थी उसकी तारीफ़ दुनियाभर में हुई.

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चेचक के ख़िलाफ़ अभियान
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, चेचक की बीमारी करीब 3000 सालों तक इंसानों के लिए मुसीबत बनी रही और इसकी वजह से सिर्फ़ 20वीं सदी में करीब 30 करोड़ लोगों की मौत हुई.
हालांकि दुनियाभर के देशों ने इस बीमारी से निपटने के लिए प्रयास किए और साल 1977 में चेचक का आखिरी ज्ञात मामला सोमालिया में सामने आया.
चेचक के ख़िलाफ़ लड़ाई का ऐतिहासिक पल तब आया जब डब्ल्यूएचओ ने दिसंबर 1979 में इसके अंत की पुष्टि की. इसके पांच महीने बाद मई 1980 में 33वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में इस बात की आधिकारिक घोषणा की गई कि ''दुनिया के सभी देशों और इसके लोगों को चेचक से आज़ादी मिल गई है.''
आज़ादी के वक्त भारत में चेचक के सबसे अधिक मामले सामने आ रहे थे. मई 1948 में भारत सरकार ने इस बीमारी से निपटने को लेकर आधिकारिक बयान जारी किया और चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) के किंग्स इंस्टीट्यूट में बीसीजी टीका बनाने की लैब शुरू की गई.
साल 1949 में भारत में स्कूल के स्तर पर सभी राज्यों में बीसीजी टीकाकरण की शुरुआत की गई. और साल 1951 में इसे बड़े स्तर पर देश भर में लागू किया गया.
महामारी की जांच
वर्ल्ड हेल्थ असेंबली ने साल 1958 चेचक को जड़ से ख़त्म करने को लेकर एक रेजोल्यूशन पास किया, जिसके बाद आने वाले सालों में दुनियाभर में इसे लेकर स्वास्थ्य कार्यक्रमों में बड़ा बदलाव दिखा. भारत ने साल 1962 में राष्ट्रीय चेचक उन्मूलन कार्यक्रम (NSEP) की शुरुआत की, जिसका लक्ष्य तीन सालों में पूरी आबादी को चेचक के टीके देना था.
साल 1967-68 में चेचक उन्मूलन कार्यक्रम में कुछ बदलाव किए गए और फिर निगरानी, महामारी की जांच की कोशिशें भी शुरू हुईं.
साल 1973 के मध्य तक भारत में अधिकतर राज्यों में ये प्रयास काम आए और चेचक सिर्फ़ उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में ही दिखा. इसके बाद इसी साल सभी राज्यों में बड़े स्तर पर अभियान चलाकर घर-घर जाकर चेचक के मामले पकड़ने की कोशिश की गई. साल 1974 में सरकार के प्रयासों से चेचक के 188000 मामले सामने आए. हालांकि इस दौरान 31000 लोगों की मौत भी चेचक की वजह से हुई.
सरकार ने मामलों को ट्रेस करने और टीकाकरण के अभियान में तेज़ी दिखाई. साल 1975 में भारत में चेचक का आखिरी मामला सामने आया. हालांकि इसके बाद भी इस बीमारी को लेकर निगरानी जारी रही.
साल 1977 को भारत को चेचक मुक्त घोषित किया. चेचक जैसी महामारी से पूरी तरह छुटकारा पाने में आज़ाद भारत को तीन दशक से भी अधिक वक़्त लगा.
पल्स पोलियो अभियान
पोलियो एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसने एक वक़्त में दुनियाभर के लिए डर की स्थिति पैदा कर दी थी. तेज़ी से फैलने वाली इस बीमारी की चपेट में आकर ज़्यादातर बच्चे विकलांग हो रहे थे.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इससे निपटने के लिए ग्लोबल पोलियो इरैडिक्शन इनीशिएटिव (GPEI) की शुरुआत की. स्वास्थ्य के लिए यह सबसे बड़ी निजी-सरकारी पार्टनरशिप थी जिसकी वजह से पोलियो के मामले 99 फ़ीसदी तक कम हुए.
फिलहाल पोलियो दुनिया के उन देशों में ही बचा है जहां गरीबी अधिक है.
जिस वक़्त जीपीईआई की शुरुआत की गई तब एक साल में दुनियाभर में 3.50 लाख लोग पोलियो से ग्रस्त थे. पोलियो को लेकर शुरू किए गए टीकाकरण अभियान की वजह से करीब 1.6 करोड़ लोगों को विकलांग होने से बचाया जा सका.
ओरल पोलियो वैक्सीन
जब भारत में पोलियो का संक्रमण चरम पर था तब यहां 6.4 लाख पोलियो बूथ बनाए गए थे. पोलियो उन्मूलन अभियान में करीब 23 लाख लोग काम कर रहे थे. पल्स पोलियो दिवस के एक राउंड में भारत में करीब दो करोड़ वैक्सीन, 63 लाख आइस पैकेट इस्तेमाल होते थे और इस दौरान 19.1 करोड़ घरों में कर्मचारी गए और करीब 17.2 करोड़ बच्चों को पोलियो ड्रॉप दी गई.
साल 1970 में पैस्टर इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने पहली बार ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) बनाई.
साल 1988 में वर्ल्ड हेल्थ असेंबली ने पोलियो उन्मूलन को लेकर एक रेजोल्यूशन पास किया और तय किया कि साल 2000 तक पोलियो ख़त्म हो जाएगा. भारत में पोलियो उन्मूलन के लिए राज्य स्तर पर प्रयास शुरू किए गए.
तमिलनाडु ने रोटरी के सहयोग से पोलियो प्लस अभियान की शुरुआत साल 1985 में की.
वर्ल्ड हेल्थ असेंबली के रेजोल्यूशन को अपनाते हुए तमिलनाडु और केरल में साल 1993-94 में बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान शुरू किया गया.
भारत सरकार
दिल्ली में अक्टूबर 1994 में पहली बार पूरे राज्य में पोलियो टीकाकरण अभियान की शुरुआत की गई और दूसरा चरण दिसंबर में शुरू किया गया.
साल 1994 में डॉक्टर हर्षवर्धन दिल्ली सरकार में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री थे. उन्होंने दिल्ली में तीन साल तक की उम्र के बच्चों के लिए पोलियो ड्रॉप अभियान बड़े स्तर पर शुरू किया और इसमें काफ़ी सफलता मिली.
साल 1995 के दिसंबर महीने में भारत सरकार ने इस मुहिम को अपनाया और देशभर में लागू किया और तीन साल तक की उम्र के बच्चों को पोलियो टीकाकरण अभियान के दायरे में लाया गया और एक साल में करीब 8.7 करोड़ बच्चे टीकाकरण अभियान के अंतरगत आए. एक साल बाद उम्र सीमा पांच साल बढ़ा दी गई और इस दौरान करीब 12.5 करोड़ बच्चों का टीकाकरण किया गया.
सरकार को पोलियो उन्मूलन में अभियान में कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और एजेंसियों की मदद भी मिली जिनके जरिए लोगों के बीच जागरूकता फैलाई गई.
साल 1997 में नेशनल पोलियो सर्विलांस प्रोजेक्ट (NPSP) की शुरुआत हुई. यह भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन का साझा कार्यक्रम था.
पोलियो का आखिरी मामला
अक्टूबर 1999 में भारत में टाइप टू पोलियो वायरस का मामला सामने आया जिसे पहले ही ख़त्म घोषित किया जा चुका था.
साल 2005 में पोलियो संक्रमण के करीब दो हज़ार मामले सामने आए. इनमें से अधिकतर मामले भारत और नाइजीरिया में थे.
जनवरी 2011 में पश्चिम बंगाल के हावड़ा ज़िले में पोलियो का टाइप-1 मामला सामने आया. भारत में पोलियो का यह आखिरी मामला था.
साल 2014 के मार्च महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो मुक्त घोषित कर दिया क्योंकि तीन साल से भारत में पोलियो का एक भी मामला सामने नहीं आया था.
यह इत्तेफ़ाक ही है कि डॉ. हर्षवर्धन भारत के मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री हैं जिन्होंने पोलियो उन्मूलन अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अब कोरोना वायरस की मुसीबत से निपटने में भी उनकी तरफ उम्मीद भरी नज़रें उठ रही हैं.
कोरोना वायरस
कोरोना वायरस के मामले भारत में बढ़ रहे हैं. फिलहाल संक्रमण अभी दूसरे स्तर पर है और इसे कम्युनिटी ट्रांसमिशन से रोकने के लिए सरकार हर संभव कदम उठा रही है.
दक्षिण एशिया में विश्व स्वास्थ्य संगठन के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. रॉडेरिको ऑफ्रिन ने कोरोना वायरस संक्रमण रोकने के भारत के प्रयासों की तारीफ़ की है.
उन्होंने कहा, 'कोविड-19 के संक्रमण को रोकने के लिए भारत ने बेहतर कदम उठाए हैं. भारत सरकार ने हाल ही में कोरोना वायरस संक्रमण के मरीज मिलने वाले 75 ज़िलों को पूरी तरह लॉकडाउन करने के साथ ही बस, मेट्रो और रेल सेवाएं भी बंद करके वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने की दिशा में बेहतर कदम उठाए हैं.''
स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक भारत में अब तक कोरोना वायरस संक्रमण के 451 पॉजिटिव मामले सामने आ चुके हैं और नौ लोगों की मौत हो चुकी है. अब तक 37 लोगों का इलाज किया जा चुका है या इलाज के बाद डिस्चार्ज भी कर दिया गया है. भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के सबसे अधिक मामले केरल और महाराष्ट्र में सामने आए हैं.
कोरोना वायरस के संक्रमण को आइसोलेशन, टेस्ट, ट्रीटमेंट और ट्रेसिंग के जरिए फैलने से रोका जा सकता है.

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