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बुधवार, 15 अप्रैल, 2009 को 05:56 GMT तक के समाचार
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नीतीश की रैली और लोगों की राय

नीतीश
नीतीश के समर्थक उनकी 'विकास पुरुष' की छवि को पुख़्ता करने में जुटे हैं लेकिन कई निराश हैं
नीतीश कुमार का उड़नखटोला आसमान में मंडरा रहा है. नीचे जनता और कार्यकर्ता उनके आने के इंतज़ार में हैं लेकिन कार्यकर्ताओं में थोड़ी बेचैनी भी है. कारण - मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के मनियारी गाँव में जमा भीड़ की संख्या को लेकर पार्टी उम्मीदवार ख़ुश नहीं हैं.

मुज़फ़्फ़रपुर में चुनावी जंग जनता दल (यूनाइटेड) के जयनारायण निषाद, कांग्रेस की विनीता विजय, बहुजन समाज पार्टी के समीर कुमार, लोक जनशक्ति पार्टी के भगवान लाल सहनी और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस और विजेंद्र चौधरी के बीच है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मनियारी गाँव में पार्टी उम्मीदवार निषाद के लिए जनसभा संबोधित करने आए थे. उनके वहाँ पहुँचने से पहले हमने वहाँ मौजूद लोगों से पूछा कि वे नीतीश के भाषण से क्या उम्मीदें रखते हैं, तो कई लोगों ने स्थानीय माँगें गिनवाईं और उम्मीद जताई कि उनकी उम्मीदें पूरी होंगी.

ख़ैर, मुख्यमंत्री और जदयू और भाजपा गठबंधन के स्टार प्रचारक नीतीश कुमार ने भाषण शुरु किया और वही सब कहा जो आजकल हर जगह कह रहे हैं.

उनके समर्थक उनकी 'विकास पुरुष' की छवि को पुख़्ता करने में जुटे हैं और नीतीश भी इसके अनुरुप बुनियादी संरचना के विकास से लेकर औद्योगिकीकरण तक की कोशिशों का ख़ाका पेश कर रहे हैं.

 भाषण रहने दीजिए, ऊपरी काम से कुछ नहीं होता, मेरे गाँव में आइए और देखिए दशा. बीपीएल (ग़रीबी रेखा के नीचे) और एपीएल (ग़रीबी रेखा से ऊपर) का खेल. आप समझ जाएँगे कि किस तरह से उपेक्षा हो रही है एक वर्ग की..
दलित वर्ग के रवींद्र

इस बीच तालियाँ भी बजीं, लेकिन उपलब्धियों के आँकड़ों पर नहीं बल्कि उन चुटकियों पर जो नीतीश ने लालू और उनके साले साधु यादव के संबंधों पर या अपने ऊपर राबड़ी देवी के बयानों पर की.

बदहाली के आरोप

जब नीतीश वापस हेलिकॉप्टर से रवाना हुए, तो मैंने फिर वहाँ के लोगों से जानना चाहा कि मुख्यमंत्री ने जो कुछ कहा वे उससे कितने संतुष्ट हैं और उपलब्धियाँ गिनाने के उनके दावों में कितना दम है?

प्रतिक्रिया मिश्रित थी लेकिन उसमें जातीय समिकरणों का प्रभाव, जनता की उम्मीदें, पूरे न हुए वादे....सभी की झलक थी.

 हम तो ख़ुश हैं, सड़कें बन रही हैं. रात-बेरात कहीं आने-जाने में डर नहीं लगता है
हरिंदर साहनी

दलित वर्ग की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए रवींद्र पासवान ने कहा, "भाषण रहने दीजिए, ऊपरी काम से कुछ नहीं होता, मेरे गाँव में आइए और देखिए दशा. बीपीएल (ग़रीबी रेखा के नीचे) और एपीएल (ग़रीबी रेखा से ऊपर) का खेल. आप समझ जाएँगे कि किस तरह से उपेक्षा हो रही है एक वर्ग की..."

दूसरी ओर हरिंदर साहनी बोले - "हम तो ख़ुश हैं, सड़कें बन रही हैं. रात-बेरात कहीं आने-जाने में डर नहीं लगता है."

उम्मीदें और निराशा

मनीष कुमार उस स्कूल में छात्र हैं जहाँ मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार की तारीफ़ों के पुल बांधे थे. वो कहते हैं, "ये जो कह गए हैं कि स्कूल में लड़कियों को साइकल और पैसे दिए जा रहे हैं, वो पूरी तरह सच नहीं है. हमारे स्कूल में कुछ लड़कियों को ही ये फ़ायदा मिला है."

लेकिन एक महिला ग़ुस्से से तमतमाई हुई हमारी ओर आईं और मुख्यमंत्री के बारे में अपनी भड़ास निकालने लगीं. वे बोलीं - "ये सरकार निकम्मी है. तीन बेटा बेरोज़गार बैठा हुआ है. सतुआ बेच कर गुज़ारा कर रहे हैं. इन्होंने किया क्या है हमारे लिए?"

 ये सरकार निकम्मी है. तीन बेटा बेरोज़गार बैठा हुआ है. सतुआ बेच कर गुज़ारा कर रहे हैं. इन्होंने किया क्या है हमारे लिए?
एक वृद्ध महिला

सबसे ज़्यादा लोग इस बात से नाराज़ दिखे कि बीपीएल परिवारों के लिए घोषित अनाज उन्हें पिछले 11 महीनों से नहीं मिल पा रहा है.

रामसेवक राय के मुताबिक़, "हम लोगों को लग रहा है कि नीतीश प्रशासन अच्छे फ़ैसले ले रहा है लेकिन स्थानीय प्रतिनिधि के स्तर पर हालात ठीक नहीं है."

जब मैंने पूछा कि क्या इसका असर चुनावों पर भी पड़ेगा तो बूढ़ी महिला सरिता देवी ने बड़ी होशियारी से जवाब दिया, "जो ग़रीबों का हित देखेगा हम उसे अपने सर पर बिठाएंगे. मुख्यमंत्री जो बोले वो तो बहुत अच्छा लगा लेकिन कथनी और करनी ज़मीन पर परखी जाती है."

 जो ग़रीबों का हित देखेगा हम उसे अपने सर पर बिठाएंगे. मुख्यमंत्री जो बोले वो तो बहुत अच्छा लगा लेकिन कथनी और करनी ज़मीन पर परखी जाती है
सरिता देवी

सभास्थल से थोड़ी ही दूर पर एक दुकान के पास खड़े निर्मल सिंह मिले. वो जनसभा में नहीं गए थे. मैंने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा, "लोगों को अपने काम से फ़ुरसत नहीं है. किसान इस समय खेतों में हैं और नौकरी करने वाले काम पर... इन नेताओं के लिए समय कहाँ है? जहाँ तक वोट देने की बात रही, तो भाषण सुनने का कोई असर नहीं पड़ेगा. उसे ही वोट डालेंगे जिसे वोट देने का मन बना चुके हैं."

कुल मिलाकर ये तो साफ़ है कि इस चुनाव में किसी के पक्ष या विरोध में लहर जैसी बात नहीं है और जनता ने नेताओं को 'सस्पेंस' में डाल रखा है.

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