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विकास से दूर, पर चुनाव में भाग लेंगे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आंध्र प्रदेश के आदिवासी बहुल विशाखापट्टनम, श्रीकाकुलम और खम्मा ज़िले आधुनिक चमक- दमक और विकास से दूर हैं पर लोग लोकतंत्र के महापर्व में भाग लेने को तैयार हैं. छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सीमाओं पर स्थित जंगलों के बीच आबाद इन इलाक़ों में नक्सलियों का ख़ासा प्रभाव है. यहाँ के दूर-दराज़ इलाक़ों में अर्ध-नग्न कपड़े पहने, ग़रीब और कुपोषण के शिकार आदिवासी अपनी शर्तों पर ज़िंदगी बसर करते हैं. सरकार का दावा है कि विकास और ख़ुशहाली को पूरे राज्य में हासिल कर लिया गया है, लेकिन यहाँ इसका नामो-निशान नहीं दिखता. आम लोग अब भी बुनियादी सुविधाओं जैसे स्कूल और अस्पताल से दूर हैं. अदिवासी युवक विभिन्न तरह के नशों के आदी बन चुके हैं. इन लोगों की जीविका जानवरों का शिकार करके चलती है जबकि कुछ लोग खेती-बाड़ी भी करते हैं. 'बाहरी दुनिया मतलब सड़क' उनके लिए बाहर की दुनिया का मतलब सिर्फ़ सड़क है और सड़कें ऐसी हैं कि सिर्फ़ 15 किलोमीटर के सफ़र में एक घंटा लग जाता है. ऐसे में ये समझने में परेशानी नहीं होती कि क्यों इस इलाक़े में पिछले चार दशक से नक्सली सक्रिय हैं और सरकारी तंत्र और पुलिस के लोगों को अपने हमलों का निशाना बनाते हैं. सच्चाई यह है कि सिलेरू इस इलाक़े में अकेला ऐसा शहर है जिसके बारे में दावा किया जा सकता है कि वहाँ जीवन शांति से गुज़रता है, जो शहर बड़ी पनबिजली परियोजनाओं के लिए जाना जाता है. यहाँ के आदिवासी इतने बेख़बर हैं कि वे आज भी सामानों के आदान प्रदान के ज़रिए काम करते हैं. उनकी इस बेख़बरी का फ़ायदा कभी-कभी बाहरी लोग भी उठाते हैं. जब एक व्यक्ति ने चने के लिए 20 रुपए का नोट देना चाहा तो एक आदिवासी बूढ़िया ने उसे लेने से इनकार कर दिया कि पता नहीं ये नोट असली है या नहीं. हालत यह है कि भीख माँगने वाली महिलाएँ भी नोट के बजाए सिक्का लेना पसंद करती हैं. शक की निगाह सिलेरू से नारसीपटनम जाते समय हमारी मुलाक़ात शिकार के लिए जा रहे एक मामा और भाँजे से हुई. लेकिन उनसे बात शुरू करना आसान नहीं था क्योंकि वो बाहरी लोगों को शक़ की निगाह से देखते हैं. नवयुवक श्रीनु कहते हैं, "हम लोग ख़रगोश के साथ साथ दूसरे जानवरों की तलाश कर रहे हैं, क्योंकि इस समय यहाँ कोई काम नहीं है." जब चुनाव की बात शुरु हुई तो उनकी आँखें चमक उठीं, दूसरे व्यक्ति सुरी कहते हैं, "हम लोग उसको वोट करेंगे जिसके बारे में हमारे बड़े कहेंगे. हम लोग उस पार्टी को पंसद करते हैं जिसके बारे में वो कहते हैं, हम लोग उसी को वोट देंगे." जब मैंने सुरी से पुछा कि यहाँ की समस्याएँ क्या हैं, तो उनका कहना था, " यहाँ पानी नहीं है, बोरवेल नहीं है और घर नहीं है. सिर्फ़ एक व्यक्ति को सरकार की तरफ़ से घर दिया गया है, लेकिन वो भी पूरा नहीं है और सरकार उन्हें पैसा नहीं दे रही है इसलिए अब वो अपने पैसे से घर पूरा करने में लगे हुए हैं." जब अस्पताल और स्कूल की बात की तो श्रीनु का कहना था, "हम लोगों को सात किलोमीटर का सफ़र तय करके अस्पताल जाना पड़ता है लेकिन यहाँ कोई स्कूल नहीं है. गाँव वालों ने ख़ुद का एक स्कूल शुरू किया है." कैसा विकास परंपरागत आदिवासी वस्त्र पहने 55 वर्षीया कुंजा देवी उस प्रकार का विकास नहीं चाहती हैं जैसा लोग वहाँ देखना चाहते हैं. वह कहती हैं, "विकास का मतलब क्या है? लोग यहाँ चुनाव के समय आते हैं, बातें करते हैं और चले जाते हैं. हम लोग जैसे हैं-वैसे ही ख़ुश हैं. हमें हमारे घरों और हमारी ज़मीनों से मत निकालो." श्रीनु से जब सरकारी स्कीमों से फ़ायदे के बारे में पूछा तो उनका जवाब हाँ में था, "हाँ दो रुपए के बजाए तीन रुपए किलोग्राम चावल मिलता है, जब इसके बारे में हम स्थानीय दुकानदार से पूछते हैं तो वह मुँह बंद रखने की बात कहता है." लेकिन श्रीनु का कोई अपना सपना नहीं है? वह बड़े शहरों में या शहरों की तर्ज़ पर ज़िंदगी बसर करना नहीं चाहते. वह कहते हैं, " मैं अपनी ज़िंदगी जीना चाहता हूँ. शहर वाले अपनी ज़िंदगी अपनी तरह से गुज़ारें. " क्या आप सरकार से खुश हैं, तो उनका कहना है, " सरकार की नीयत सही है लेकिन बीच के लोग फ़ायदे को हम लोगों तक नहीं पहुँचने देना चाहते, वे हर चीज़ के लिए घूस माँगते हैं." |
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